Article - 370 (Part - 01) - अनुच्छेद - 370 (भाग - 01)
लेख की शुरुआत से पहले 3 महत्वपूर्ण Notes पर ज़रूर नज़र रखे ।
Notes – 01-मैं इस पूरे मामले को संवैधानिक नज़र से देखते हर बिंदु पर संवैधानिक टिप्पणी करने का प्रयास कर रहा हूँ । इस लेख को किसी भी जाति, धर्म या राजनैतिक पार्टी या नेता से प्रभावित हो कर या उसके पक्ष/विपक्ष में नही लिखा गया है ।
Notes – 02: -अगर आपको लेख पसंद आए तो कृपया मेरे इस प्रयास को अन्य लोगों तक साझा करें मुझे उत्साह मिलेगा और देश में करोड़ों लोगों को ‘Article-370’ की संवैधानिक जानकारी मिलेगी ।
Notes – 03:- लेखक (मैंने) भविष्य के अनुमान अपने अनुभव के आधार पर किए है । भविष्य से सम्बंधित मुद्दों पर आपकी सहमति और असहमति दोनो स्वीकार्य है मुझे ।
प्रारम्भ
तो, बात शुरू करते हैं, देश के एक ऐसे मुद्दे पर, जिसके बीज से ही भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई और संघर्ष की कोपलें फूट गयी । जी हाँ, भारत और पाकिस्तान के बीच पहली लड़ाई सन 1947 (22 Oct 1947)में जम्मू और कश्मीर को लेकर ही हुई थी और यह सिलसिला आज भी 73 वर्षों से चलता आ रहा है ।
इस ऐतिहासिक मामले को समझने के लिए इतिहास के पन्ने को पलटना आवश्यक है । अतः आपको ले कर चलता हूँ - उस काल-खंड में जहाँ -- भारत और पाकिस्तान के बीच Rad Cliff Line(भारत और पाकिस्तान के बीच की बॉर्डर लाइन) खींचने की प्रक्रिया का आग़ाज़ होने वाला था ।
अंग्रेज़ों ने भारत पर हुकूमत करते वक़्त विभिन्न राजाओं के रिसायतों को क़ब्ज़ा किया था, अतः उन्होंने अपनी ईमानदारी (या कहें चालाकी)दिखाते हुए विभाजित-भारत को आज़ादी तो दे दिया पर स्पष्ट शब्दों में यह एलान कर दिया कि - “राजाओं और रजवाड़ों को खुली छूट है कि - वो भारत के साथ मिलें, पाकिस्तान के साथ जुड़ जाएँ या स्वतंत्र रूप से अपनी रियासत को बरक़रार रखें ।
यहीं से शुरू होता है - “विभाजित-भारत” को “अखंड-भारत” बनाने का कार्यक्रम । इस चुनौतिपूर्ण कार्य को पूरे करने की ज़िम्मेदारी लेतें हैं -- भारत के “लौह- पुरुष’ मननीय “सरदार पटेल” । सरदार पटेल टुकड़ों में बटें हुए भारत को स्वीकार करने के लिए बिलकुल भी तय्यार नही थे । अतः वे सभी रियासतों के राजाओं और रजवाड़ों को भारत से जुड़ने का सलाह, आग्रह, चुनौती, धमकी, प्रेम और लालचदेते हुए हर सम्भव प्रयास करते । ठीक यही कोशिश नव-निर्मित पाकिस्तान के क़ायदे-आज़म “मोहम्मद अली जिन्ना”भी अपनी टीम के साथ मिल कर कर रहे होते हैं ।
निसंदेह,भारत की सेना, सामर्थ्य, प्रस्ताव, आग्रह, एकजुटता, सरदार पटेल का विशवास और प्रीवी-पर्स(Privy Purse)जैसे लालच ने अधिकांश रियासतों को भारत के पक्ष में झुकने पर मजबूर किया या प्रेरित किया । कुछ रियासत अभी भी दुविधा की स्थिति में थी और अब भी फ़ैसला नही कर पा रही थी । एक स्थिति ऐसी भी बन रही थी कि - जिस रियासत में ज़्यादा मुसलमान की आबादी है “मोहम्मद अली जिन्ना”उसे अपनी तरफ़ करने का लगातार प्रयास कर रहे थे । और हिन्दू जनसंख्या वाली रियासत का झुकाव भारत की तरफ़ था ।
Article 370 को ध्यान में रखते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते हुए “जम्मू-कश्मीर और “जूनागढ़”(गुजरात)रियासत की बात करते हैं । ये दोनो रियासतों का मामला गम्भीर होता दिखलाई पड़ रहा था । इसका साफ़ कारण यह था कि - जूनागढ़ के राजा - (‘महाबत खानIII')‘मुसलमान’ थे और वहाँ की जनसंख्या में हिन्दू का %(87.39) बहुत ज़्यादा था । “मोहम्मद अली जिन्ना”ने जूनागढ़ के राजा -को अपनी तरफ़ झुका लिया था परंतु वहाँ की जनता का झुकाव भारत की तरफ़ था । जूनागढ़ के राजा, सरदार पटेल की बात से सहमत नही हो रहे थे । ऐसे में सरदार पटेल ने - “जनमत-संग्रह”(जनता की राय)की तरकीब निकाली और फ़ैसला जनता के हाथ में सौंप दिया । उन्हें पता था कि - जनता का झुकाव -“हिंदुस्तान” की तरफ़ होने वाला है । अंत में वही हुआ - जनता ने हिंदुस्तान को चुना । इसी के साथ जूनागढ़ रियासतभारत का अभिन्न-हिस्सा बन गया ।
परंतु कश्मीर में पेंच फँस गया, क्यूँकि - जम्मू-कश्मीर के राजा - “हरि सिंह”(हिन्दू) थे और वहाँ की जनता में मुसलमानो की जनसंख्या का % (75.94)स्वभाविक रूप से ज़्यादा था । सरदार पटेल को पता था कि - यहाँ “जनमत-संग्रह”के प्रयोग करने पर “जम्मू-कश्मीर”सीधे तौर पर भारत के हाथ से निकल जाएगा । अतः जम्मू-कश्मीर में इस प्रक्रिया को नही अपनाया गया । राजा ‘हरि सिंह’जम्मू-कश्मीर को ‘स्वतंत्र’रूप से रखना चाहते थे । वे इसे भारत से जोड़ने के पक्ष में बिलकुल भी नही थे । चूँकि उन्हें यह छूट थी कि - वो भारत सरकार की बात माने, पाकिस्तान की बात स्वीकार करे या स्वतंत्र रहे । उन्होंने कश्मीर के लिए स्वतंत्रता को चुना। यही कारण है कि - आज भी कश्मीरी - “आज़ादी- आज़ादी” का गीत पुकारते रहते हैं ।
आगे की कहानी ॰॰॰॰॰॰॰॰॰
यह तय हो गया कि - जम्मू-कश्मीर स्वतंत्र रूप से अपनी रियासत बनाए रखेगा । परंतु आज़ादी के मात्र 2 महीनेबाद ही पाकिस्तान ने अपने नापाक इरादे के साथ कश्मीर पर हमला बोल दिया (पाकिस्तान को लगा कश्मीर स्वतंत्र है तो क्यू ना इस पर क़ब्ज़ा करके इसे अपने साथ मिला लिया जाए) । राजा ‘हरि सिंह’ को पता था कि - “पाकिस्तानी फ़ौज को वो ज़्यादा देर तक रोक नही सकेंगे”।अतः उन्होंने भारत सरकार से मदद माँगा ।
यही से शुरू हुआ - “Instrument of Accession”और “धारा-370”की कहानी ।
भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर के राजा ‘हरि-सिंह’को मदद के बदले में जम्मू-कश्मीर को भारत से जोड़ने का प्रस्ताव रख दिया । निसंदेह, यह कार्य उस वक़्त के भारत के ‘प्रधान-मंत्री’ ने ही किया होगा (इस लेख में नेता/पार्टीके नाम से बचने का प्रयास किया गया है) । पहले तो ‘हरि-सिंह’इस प्रस्ताव पर राज़ी नही हुए क्यूँकि - वो निजी स्तर पर जम्मू-कश्मीर को भारत से मिलाने के पक्ष में नही थे । अतः उन्होंने कुछ समय लिया । इस बीच पाकिस्तान की फ़ौज धीरे- धीरे आगे बढ़ रही थी । इसी वक़्त के चक्कर में पाकिस्तान की फ़ौज कश्मीर के कुछ हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा चुकी थी । फिर ‘हरि-सिंह’ने जम्मू- कश्मीर को भारत से जोड़ने का मन बना लिया परंतु उनके कुछ शर्त थे । उनके शर्त सुनने के बाद कुछ शर्त भारत सरकार की तरफ़ से भी थे । अतः यहीं निर्माण हुआ - “Instrument of Accession”का । एक संधि का । तय्यार हुआ एक मसौदा, एक प्रस्ताव जिसमें - मुख्यतः - 9 बिंदुओंको शामिल किया किया । भारत सरकार ने कश्मीर की शर्त को स्वीकार किया और कश्मीर ने भारत सरकार की शर्तों को स्वीकार किया । भारत सरकार किसी भी हालत में कश्मीर को अपने हाथ से जाने नही देना चाहता था इसलिए, प्रस्ताव में - रक्षा (Defence),विदेशी मामले (ExternalAffairs)और संचार (Communications)जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को शर्त में दर्शाते हुए यह कहा कि - ये सब मामले में कश्मीर भारत सरकार के अधीन रहेगा और जी हाँ, आज़ादी से आज तक भारत सरकार इन मामलों के आधार पर विषम से विषम परिस्थिति में भी कश्मीर को अपने साथ जोड़ कर रखी हुई है ।
राजा- हरि सिंह भारत के कुछ शर्तों से ख़ुश नही था इसलिए वे इस - “Instrument of Accession”पर हस्ताक्षर करने में भी वक़्त लगा रहे थे । इस बीच पाकिस्तान की सेना लगातार जम्मू-कश्मीर की तरफ़ बढ़ती जा रही थी । ये हरि सिंह के वक़्त का ही परिणाम है कि - पाकिस्तान ने कश्मीर के कुछ हिस्से पर मज़बूती से अपना क़ब्ज़ा जमा लिया । इसी क़ब्ज़े वाले कश्मीर को आज हम POK (पाक अधिकृत कश्मीर) के नाम से जानते और नक़्शे पर देखते हैं ।
पाकिस्तान की बढ़ती फ़ौज को देख कर हरि-सिंह को हस्ताक्षर करने पड़े और इस तरह जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया । अरे, एक मिनट रुकिए, रकिए ----- और इस तरह जम्मू कश्मीर अपनी शर्तों परभारत देश का हिस्सा बन गया । जी हाँ अपनी शर्तों के साथ। हमें यह समझना होगा कि - भारत के अन्य रियासतों का जुड़ाव भारत के शर्तों पर हुआ था पर जम्मू कश्मीर का जुड़ाव -- भारत और जम्मू कश्मीर दोनो के साझा शर्तों पर हुआ था ।
इन्ही साझा शर्तों को संवैधानिक रूप से बनाए रखने, दिल्ली और जम्मू कश्मीर के बीच के रिश्तों को सुविधाजनक तरीक़े से चलाने के लिए और भारत सरकार की पकड़ ‘जम्मू-कश्मीर’ पर बनी रहे इसलिए - भारत के संविधान में ‘धारा 370’को जोड़ा गया । साथ ही आपको यह भी बता दूँ कि - जम्मू-कश्मीर और दिल्ली सरकार के बीच के सम्पर्क मज़बूती से बनाए रखने के लिए धारा 370 के अतरिक्त 35 A, धारा 367, धारा 01 और धारा 238 की भी चर्चा भारत के संविधान में है ।
मैं जब आगे - सविधान के नज़र से चर्चा करूँगा तो आपको यह जान कर हैरानी हो जाएगी कि -- धारा 370जम्मू-कश्मीर का नही बल्कि भारत सरकार का एक अस्त्र था (एक हथियार था), जिस अस्त्र से भारत सरकार जम्मू कश्मीर पर अपनी पैनी नज़रऔर अपनी मज़बूत पकड़बनाए रखे हुए था और तमाम विषम-परिस्थि में भी उसे भारत का हिस्सा बने रहने पर मजबूर किए हुए था, चाहे वहाँ की राज्य-सरकारइससे सहमत हो या न हो, चाहे वहाँ की जनताइससे सहमत हो या न हो, चाहे वहाँ के हुर्रियत के नेतासहमत हो या नही हो ।
दिल्ली सरकार या जम्मू-कश्मीरी दोनो की परिस्थितियाँ कैसे भी हो जाए पर 73साल से जम्मू कश्मीर पर भारत सरकार की पकड़ बनी हुई थी । इस पकड़ का आधार धारा-370 था । पर आगे चीज़ें कैसे बदल सकती है, इसकी चर्चा लेख के अंतिम हिस्से में किया जाएगा । पाठक धेर्य बनाए रखें ।
एक सामान्य तर्क देता हूँ :- (धारा 370 किसके लिए बेहतर था ?)
ऊपर आपने समझा कि - राजा ‘हरि-सिंह’ जम्मू- कश्मीर को भारत से जोड़ना नही चाहता थे, परंतु पाकिस्तानी फ़ौज के डर से उन्हें भारत सरकार के आगे झुकना पड़ा । स्वभाविक सी बात है - जब कोई आपके सामने झुकेगा तो आप ऐसे शर्त रखना चाहोगे जिसमें - आपका फ़ायदा होगा, क्यूँकि वो झुक रहा है आप नही झुक रहे । तो भारत सरकार ने भी - “Instrument of Accession”के ज़रिए अपनी बात पर ज़ोर दिया और उसी के आधार पर भारतीय संविधान की धारा 370 की रूप-रेखा तय किया । हम इतना भी नही समझ पा रहे हैं कि - धारा 370कश्मीर के संविधान का या पाकिस्तान के संविधान का हिस्सा नही है, यह भारतीय संविधान का हिस्सा है । इसे भारतीय संविधान निर्माताओ ने बनाया है । संविधान के अन्य हिस्सों की तरह इसे भी बाबा साहब अम्बेदकर और भारत के प्रथम राष्ट्रपति “राजेंद्र प्रसाद जी” के मार्गदर्शन में तय्यार किया गया है । धारा 370 की हक़ीक़त को समझे बिना - इस धारा से नफ़रत करना, संविधान निर्माताओ के योग्यता पर प्रशनचिन्ह खड़ा नही करता है क्या ??
अतः पहले तो इस बात को समझना होगा कि - धारा 370 भारत सरकार द्वारा बनाया गया एक ऐसा हथियार था जिससे दिल्ली सरकार को फ़ायदा था, जिससे पूरे देश को फ़ायदा था । चूँकि - इस धारा की मदद से दिल्ली सरकार बहुत सारे मुद्दे को लेकर कश्मीर को ख़ुद में बाँध सकती थी । कश्मीर पर अपनी नज़र, अपनी सेना, अपनी ताक़त, अपनी संचारको बरकरार रख सकती थी और कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाए रखने में तो सफल थी ही ।
बेशक, धारा 370 में कुछ ऐसे बिंदु थे जो कश्मीर के पक्ष में नज़र आते हैं । चूँकि - “Instrument of Accession”पर राजा ‘हरि-सिंह’ के भी शर्त को स्वीकार किया गया था, अतः स्वभाविक है कि - धारा 370 को पढ़ने के बाद आपको ऐसा लगेगा कि - कश्मीर और दिल्ली का सम्बंध,बिहार और दिल्ली जैसा नही है या उत्तर-प्रदेश और दिल्ली जैसा नही है । हम यह क्यूँ भूल जाते हैं कि - बिहार और दिल्ली के बीच या UP और दिल्ली के बीच - “Instrument of Accession”पर हस्ताक्षर नही हुए थे ।
बेशक दिल्ली सरकार और कश्मीर के रिश्तों में कुछ ऐसी बात है जो दिल्ली सरकार और अन्य राज्यों के बीच नज़र नही आएगी । पर आपको शायद् पता होगा कि - दिल्ली सरकार यानी ‘केंद्र’और नागालैंडके बीच, दिल्ली सरकार और उत्तर-पूर्वके कई राज्यों के बीच भी वैसे सम्बंध नही है जो सामान्य राज्यों के लिए होना चाहिए । पर इसपर देश में किसी को कोई दिक्कत नही है और सरकार भी इस पर ख़ामोश है ।
आपको बता दें कि - भारत की और भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी ख़ासियत है - “विवधता”अर्थात् - DIVERSITY. थोड़ा सी चर्चा इस शब्द पर कर लेते हैं ।
इंसानो के बीच जो विभिन्नताएँ है, रिश्तों के बीच जो विभिनताएँ है, खान-पान, भाषा, रहन-सहन, पहनावे, इत्यादि में जो अंतर है यही तो - विविधता है । आप क्या चाहते है - पूरा देश सर मुंडवा ले, कैसा लगेगा ? आप क्या चाहते है - पूरा देश - सफ़ेद कुर्ता पहने और चश्मा लगा के घूमे, कैसा लगेगा ? आप जिधर जाएँ उधर आपको एक ही रंग दिखलाई दे,कैसा लगेगा आपको ? हम और आप देश की विविधता को समझ ही नही पा रहे हैं और ज़बरदस्ती - एक कपड़ा, एक समाज,एक धर्म, एक खाना, एक बोली के माध्यम से देश को एक बनाने की ज़िद पर लगे हुए हैं । आपके इस ज़बरदस्ती प्रयास से हो सकता है ---“देश एक ज़रूर हो जाए पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ - वैसे एक रंगीय देश, एक पक्षीय देश से आप ख़ुद नफ़रत करने लगेंगे ।अतः इस देश की विविधता का सम्मान ज़रूरी है ।
यही विविधता, तो देश और राज्य के सम्बंध में भी है । हम ज़बरदस्ती सभी राज्यों को देश के साथ ऐसे जोड़ रहे है कि - उस राज्य की मौलिकता(Orignaility) ही ख़त्म होती जा रही है और जनता में असंतोष पैदा होने की सम्भावना उत्पन्न हो रही है । राज्य की जनता ही देश की जनता है ।
जैसे हर व्यक्ति को अलग ‘रंग’का शौक़ है और सबकी परिस्थितियाँ अलग है उसी तरह देश के तमाम राज्य की आंतरिक स्थित और वहाँ के जनता की परिस्थिति अलग है । यही कारण है कि - देश में केंद्र सरकार चलने के लिए प्रधान-मंत्री और मंत्रिमंडल होने के बावजूद राज्य में मुख्य-मंत्री और उनके मंत्रिमंडल है । इतना ही नही ‘ज़िला’और ‘पंचायत-स्तर’पर भी सरकार का गठन किया जाता है । हम देश को एक धागे में तो बाँध सकते है पर सभी मोती एक जैसे हो यह कोशिश महा-मूर्खता है ।
विभिन्न राज्यों की भौगौलिक, सामजिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए देश के कुछ राज्यों को “विशेष-राज्य”का दर्जा प्राप्त है । ऐसे राज्य सामन्य राज्य से अलग हैं । ‘झारखंड’और वैसे तमाम राज्य जहाँ “आदिवासी”जनसंख्या अधिक मात्रा में निवास करती है, उस राज्य में बाहरी लोगों को ज़मीन ख़रीदने का अलग ही प्रावधान है जो देश के अन्य राज्यों से अलग है । आदिवासी साथियों के संरक्षण को देखते हुए ऐसी चीज़ें क़ानून में लायी गयी है ।
बात का सार यह है कि - देश के किसी राज्य का अन्य राज्यों से अलग होना कोई विवादास्पद विषय नही है । या किसी राज्य के पास शक्तियाँ होना कोई नकारात्मक बात नही है । आपको बता दें कि - भारत सरकार(केंद्र) किसी क़ानून को पारित करने के बाद भी वो क़ानून (नागालैंड) में तभी लागू हो सकता है जब वहाँ की विधान-सभा से सहमति मिल जाए ।
साथियों, इस तरह की विशेष परस्थिति देश के अलग- अलग कोने में है । हर राज्य अपने यहाँ नौकरियों में अपने राज्य के व्यक्ति को कुछ प्रतिशत प्राथमिकता देता है, तो इसका यह मतलब नही कि - वो अन्य राज्य से आए हुए प्रतिभागी का ‘शोषण’कर रहा है या उसे ‘अपमानित’कर रहा है । एक नज़र से देखें तो - पूरा देश एक है, हम सब भारतीय है तो किसी अन्य राज्य की नौकरी में किसी अन्य राज्य के प्रतिभागी के साथ ऐसा व्यवहार क्यूँ ?
इसे समझना है तो - भारत के स्वरूप को समझना होगा । तीन तरह के स्वरूप् है । (संक्षेप में समझते हैं)
1. एकात्मक :- जहाँ सारी ताक़त केंद्र के पास हो, राज्य गौण हो ।
2. संघात्मक :- अधिक से अधिक ताक़त राज्य के पास हो, केंद्र नाम
के लिए हो ।
3. अर्ध-संघात्मक :- शक्ति (ताक़त) केंद्र और राज्य दोनो के बीच बंटी
हो । दोनो अपनी शक्ति का प्रयोग कर सके और
दोनो के बीच एक लय बना हो
बतलाने की ज़रूरत नही है कि - भारत का लोकतांत्रिक और जनतांत्रिक स्वरूप तीसरे नम्बरजैसा है (अर्ध-संघात्मक)है । ऐसे में राज्यों के पास भी अपनी शक्ति होगी ।
वापस लौटते है कश्मीर मुद्दे पर :-
यही कारण है कि - देश के बेहतरीन प्रधानमंत्री और कवि रह चुके - “स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपायी” जी कश्मीर मुद्दे पर हमेशा कहते थे -
इंसानियत - जम्हूरियत - कश्मीरियत
उनके इन शब्दों से उनकी वैचारिक गम्भीरता का पता आसानी से लगाया जा सकता है ।
साथियों, अब बात करते हैं कि - वर्तमान सरकार ने “धारा-370” हटाया कैसे और जम्मू-कश्मीरी को दो राज्यों में बाँट कर उसे UT (Union Territory) बनाया कैसे ?
इस पूरी प्रक्रिया को संविधान की नज़र से देखते हुए, इस पर बिंदुवार चर्चा करना ज़रूरी है :-
1. Innovative Re-enterptation :- (सरकारका बेहतरीन तेज़ दिमाग़ )
सबसे पहले आपका भ्रम दूर कर दूँ कि - सरकार ने संविधान से ‘धारा-370’नही हटाया है । भारतीय संविधान में आज भी “धारा 370” है । परंतु सरकार ने ‘धारा-370’को बनाए रखते हुए अपने उद्देश्य को पूरा कर लिया ।
‘धारा 370’ को ख़त्म नही किया गया है, बल्कि इसे D-operationalizedकिया गया है ।
कैसे ?
जवाब :- भारतीयसंविधानका‘Article 370’भारतकेराष्ट्रपतिकोयहइजाज़त देताहैकि- राष्ट्रपति- 370 केआधार का प्रयोग कर - जम्मू कश्मीर के मामले से जुड़े दूसरे किसी भी Article (367) में किसी प्रकार का बदलाव या सुधार कर सकता है ।सरकार ने यही किया । सरकार ने अपनी मंशा को पूरा करने के लिए, इस शक्ति का प्रयोग कर article 367 में कुछ बदलाव कर के Article – 370 को प्रभावित किया ।
ये बदलाव निम्न है :- (ध्यान से समझें)
Ø Constituent Assembly of Jammu & Kashmir को Legislative assembaly समझा जाए ।
Ø govornament of State अब Governor acting on the advice of councile of Minister समझा जाए ।
इस बदलाव से क्या हुआ ?
जवाब :-
इस बदलाव के आधार पर ही सरकार ने Article-370 में बिना बदलाव किए उसमें मौजूद शब्दों के अर्थ और मायने बदल दिए । इसी बदलाव ने - Article-370 को D-operationalizedकर दिया । एक एक Point को समझता हूँ :-
पहला बदलाव करने से :-
Constituent Assembly को Constituent Body भी कहते है । यही कसी राज्य या देश के लिए क़ानून बनता है और इसे क़ानून में सुधार या जोड़-घटाव करने की भी शक्ति है । उदाहरण के लिए constituent Assembly of Indiaका निर्माण 1946 में हुआ था जिसने देश के क़ानून को बनाया था ।
परंतु "Legislative assembaly”क़ानून में किसी भी प्रकार का सुधार या बदलाव करने की क्षमता नही रखती है ।
दूसरा बदलाव करने से :-
दूसराबदलावकरनेसेgovernment of state शून्यहोगयाऔरशक्ति Governor के पास चली गयी । हम सब जानते है कि - Governor केंद्र को प्रतिनिधित्व करता है । और कश्मीर में अभी विधान-सभा भंग है अतः-सारी शक्ति गवर्नर के पास है ।
ध्यान दें :-
प्रशन :- क्या संविधान के “Article 370” में बदलाव किया जा सकता है ?
जवाब:- नही, क्यूँकि - संविधान के “Article 370” में जो साफ़ शब्द में लिखा है - “370 से जुड़े दूसरे Provisions में बदलाव सम्भव है पर 370 में बदलाव सम्भव नही है ।(जैसे - Article - 01, और 238 में बदलाव सम्भव है) अतः - संविधान के “Article 370” में बदलाव नही होगा ।
पहला निष्कर्ष :-
अतः वर्तमान सरकार ने - अपने बेहतरीन दिमाग़ का प्रयोग कर “धारा 370” को बनाए रखा और “धारा367” के आधार पर “धारा 370” में Innovative Re-enterptation कर दिया ।
2. जम्मू-कश्मीर को 2 भाग में बाँट कर (UT)बनाया कैसे गया ?
(विस्तार से पहले समझें कि संविधान का नियम क्या है ):-
सरकार ने जम्मू-कश्मीर को 2 भाग में बाँट दिया, और दोनो भाग को UT घोषित कर दिया है । भारतीय संविधान कहता है कि - दिल्ली सरकार, ऐसा निर्णय लेने से पहले हर हाल मेंजम्मू कश्मीर की state asembaly से राय- मशवरा और बात-चीत करेगी (हर हाल में - शब्द पर ग़ौर करें)
परंतु दिल्ली सरकार ने, जम्मू कश्मीर की state asembaly से राय- मशवरा लिए बिना ही ऐसा निर्णय ले लिया ।
ऐसा करने के लिए दिल्ली सरकार का तर्क - “ चूँकि जम्मू कश्मीर की state asembaly भंग है वहाँ राष्ट्रपति साशान लागू है, ऐसी स्थिति में state asembaly की सारी ताक़त पार्लमेंट के पास चली जाती है । अतः हमने state asembaly की जगह पार्लमेंट से राय-मशवरा कर लिया ।
अब इसमें छिपा हुआ खेल समझिए :-
संविधान के नज़र से :-
· संविधान कहता है कि - दिल्ली सरकार (parliament) किसी भी राज्य के सीमा- निर्धारण या उसके सीमा को बढ़ाने-कम करने के लिए उस राज्य की विधान-सभा के views को जानना आवश्यक है । (हर हाल में - चाहे कोई भी राज्य हो )
· किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन होने पर उस राज्य के legislative assembaly की शक्ति का प्रयोग दिल्ली सरकार / (parliament) कर सकती है ( जो parliamentने किया) पर parliamentउस राज्य के legislative assembaly के views को कैसे सामने रख सकती है । legislative assembaly के views तो वहाँ के चुने हुए MLA ही बता सकतें है, जो जनता के प्रतिनिधि होते हैं ।
· परंतु कश्मीर को दो भाग करने और UTबनाने में parliamentने अपना शक्ति तो दिखला दिया (यह कहते हुए कि - वहाँ अभी राष्ट्रपति शासन है ) पर विधान-सभा के views नही ले सकी क्यूँकि विधान-सभा तो भंग है ।
तर्क:-
राष्ट्रपति साशान के वक़्त, किसी भी राज्य के विधान-सभा की शक्ति तो पार्लमेंट (दिल्ली सरकार) ले सकता है पर उस राज्य के विधान-सभा के views और opinion कैसे ले सकता है, और जब संविधान यह कहता है कि - किसी भी राज्य के सीमा का निर्धारण के लिए उस राज्य के विधान-सभा के views और opinion ज़रूरी है तो दिल्ली सरकार इसका उल्लंघन कैसे कर सकती है । कश्मीर के मामले में दिल्ली सरकार ने संविधान के इस नियम का पालन नही किया ।
दूसरा निषकर्ष :-
अतः - यह जम्मू कश्मीर को दो भाग में विभाजन करना और UT बनाना संवेधानिक दृष्टि से सही नही है ।
ध्यान दें:-
इससे पहले आगे बढ़े एक और ज़रूरी बात समझ ले :- संविधान की Article 19 जो हम देश के सभी नागरिको को “Freedom of speech” देता है, परंतु उसमें यह कहा गया है कि - विषम परिस्थितियों में नागरिक के Freedom of speech को रोका जा सकता है बाधित किया जा सकता है । परंतु परलियमाएंट और aseembly के “privilege to speech” को किसी भी परिस्थिति में रोका नही जा सकता है (ये विशेष अधिकार है) परंतु जम्मू-कश्मीर को दो भाग में बाँटते वक़्त जम्मू कश्मीर के aseembly के इस privilege to speechको कचरे के डब्बे में डाल दिया दिल्ली सरकार ने ।
ख़तरा !!! ख़तरा !!! ख़तरा !!! DANGER –
अन्य राज्य के लिए होने वाले ख़तरे को नही समझना चाहते है आप, कृपया इसे भी समझ लीजिए ।
· अब दिल्ली सरकार (किसी की भी सरकार हो) वो जब चाहेगी किसी भी राज्य को UT बना सकती है या उसे दो भाग में बाँट सकती है ।
इसका बहुत आसान रेसिपी (recipe) है :-
पहला काम:- उस राज्य के विधान सभा को भाग कर दें
दूसरा काम:- वहाँ राष्ट्रपति शाशान लगा दें ।
तीसरा काम:- सारी शक्ति परलियमेंट (दिल्ली सरकार के पास ले ले )
चतुर्थ कार्य :- बिना विधान-सभा के मशवरा के उस राज्य को दो भाग में बाँट दे या
उसे UT घोषित कर दें जैसे दिल्ली सरकार ने जम्मू-कश्मीर में किया ।
सरकार ये भूल गयी कि - हमारे देश का स्वरूप अर्ध-संघात्मक है । मतलब - यहाँ केंद्र के पास अपनी शक्ति है और राज्य के पास भी कुछ शक्ति है पर केंद्र जिस तरह से चाल-चल रहा है तो ऐसा लगता है देश का स्वरूप अर्ध-संघात्मक से बदल कर एकत्मक होने वाला है जहाँ राज्य के मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार की ग़ुलामी करते नज़र आएँगे । (इसकी चर्चा ऊपर किया जा चुका है )
To be continue…………….
क़िस्सा अभी जारी है, संविधान के नज़रिए से कुछ और बिंदुओ पर आपसी चर्चा करना अभी बांकी है । जिस तरह कट्टपा ने बाहुबली को क्यू माराये जानने के लिए आपने प्रतीक्षा किया था वैसे ही थोड़ा प्रतीक्षा करें - यह जानने के लिए कि -
vभारत सरकार ने और किस तरीक़े का प्रयोग करके धारा 370 में बदलाव किए ?
vइससे कश्मीर की राजनैतिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
vकश्मीर की जनता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?
vदेश अर्थात् दिल्ली सरकार पर इसका क्या असर पड़ सकता है ?
vदेश के अन्य राज्य इस मामले को कैसे देखती है ?
vसरकार ने जो कहा है की - कश्मीर में हुआ इस बदलाव से कश्मीर की हालत सुधरेगी वो कितना सही है ?
vकश्मीर की हालत ‘धारा 370’ रहने पर कैसे थी और उसके बिना कैसे होगी ?
vकश्मीर के UT बनने से और उसके विशेष राज्य के दर्जे को छीन लेने से क्या प्रभाव पड़ेगा ?
इन सब बातों पर अपनी समझ बनाने के लिए “लेख”के दूसरे और “अंतिम-भाग”की प्रतीक्षा करें ।
अगले भाग की एक झलकी देख लें :-
हम सबको पता है कि - Article-370 और कश्मीर मुद्दे को लेकर सरकार ने जो क़दम उठाया है, इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में उठाया जाएगा परंतु सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर क्या प्रतिक्रिया दे सकती है - आइए इसे समझतें है ।
अब क्या होगा :-
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला उठाया जाएगा तो क्या हो सकता :-
· तर्क और संविधान के नज़र से देखें तो मामला सरकार के ख़िलाफ़ जा सकता है, परंतु यह इस बात पर निर्भर करता है कि - इसे मामले को उच्य न्यायालय में किस तरह से रखा जा रहा है ।
अनुभव क्या कहता है :-
· अनुभव यह कहता है कि -Majority सरकार में सुप्रीम कोर्ट इस तरह के राजनैतिक मामले के नतीजे से ख़ुद को दूर रखती है । अतः मुझे ऐसा लगता है कि - सुप्रीम कोर्ट इस मामले को संवैधानिक पीठ (Constitutional Bench) के पास भेज सकती है और मामला 3 या 4 साल के लिए अटक सकता है क्यूँकि - संवैधानिक पीठ अभी दूसरे महत्वपूर्ण मामले पर कार्य कर रहा है ।
· 3- या 4 साल बाद यह मामला देश के लिए मुद्दा नही रहेगा अतः - इस पर ज़्यादा विवाद की सम्भावना नही रहेगा चाहे फ़ैसला जिस भी पक्ष की तरफ़ हो ।
एक और सम्भावना (अगर हो जाए तो :-)
( जैसे - इंदिरा गांधी जिस समय पूर्ण बहुमत से सरकार बना कर ख़ुद देश की प्रधानमंत्री थी उस वक़्त भी इलाहाबाद कोर्ट ने उन्हें कटघड़े में खड़ा करवा दिया था और उनके चुनाव-जीत को संवैधानिक तरीक़े से ग़लत ठहरा दिया था । आज अगर, कोई ऐसा न्यायधीश मामले को देखे तो सरकार की मुश्किल बढ़ सकती है । सरकार ने जो Article 370 को लागू करने में जो हेरा-फेरी और पेंच लगाया है उसे सबके सामने जग-ज़ाहिर कर सकती है । )
आशा है आपको लेख और मेरी मेहनत पसंद आया होगा । अगर आपकी समझ बनी हो तो - कृपया कर के - इसे देश के अन्य साथियों तक साझा करें ।
अगर कोई प्रशन है या किसी तरह की चीज़ नही समझ में आयी तो कृपया करके मेरे Email पर अपना प्रशन करें । आपके email की प्रतीक्षा रहेगी ।
Dr.Mohammad Ali
Assistant Professor
Patliputra Unversity, Patna.
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आपका सुझाव रहेगा तो इस मुद्दे पर मैं VEDIO भी बना सकता हूँ । कृपया सुझाव दें ।
टंकण संबंधी त्रुटि के लिए क्षमा
आपका बहुत बहुत धन्यवाद
प्रतीक्षा करें !!!



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