Article - 371 (370 - 2nd part )
“Article-371” (Article - 370 – 2ndPart )
सभी पाठक साथियों को मेरा प्यार भरा सलाम !!!
मुझेभरोसा है कि - आप “Article-370” से जुड़े अगले आलेख का प्रतीक्षा कर रहें थे, तो मैं इस प्रतीक्षा पर ग्रहण लगाते हुए आप सबको एक सीढ़ी ऊपर लिए चलता हूँ ।
आइए, शुरू करते है - “Article-370” और उससे जुड़े विमर्श के आगे की कहानी । जो साथी पहला भाग पढ़ने से वंचित रह गए हैं या जो फिर से पहला भाग पढ़ना चाहते है उनसे निवेदन है कि - वो मेरे पहले लेख को पढ़ ले (ज़्यादा समझ सकेंगे सरलता से) । फिर आज की कहानी शुरू करें ।
सच कहें तो आज इस दूसरे अंक में हम - “Article-370” नही बल्कि “Article-371” पर चर्चा करेंगे । इस चर्चा को समझने के बाद शायद आप सभी पाठक ये बेहतर समझ सकेंगे कि - भारत सरकार ने “Article-370” को कश्मीर से हटा कर सही किया या ग़लत? ये फ़ैसला मैं आप पर छोड़ कर अपनी बात शुरू करने जा रहा हूँ ।
बात की शुरुआत भ्रांतियो (Misconception) से करते हैं । भारतीय संविधान से “Article-370” को हटाए जाने को लेकर जो मुख्य बातें भारत सरकार ने जनता के सामने कहा,भारतीय मीडिया ने उन बातों को जनता के सामने कैसे परोसाऔर जतना ने इन बातों को किस तरफ़ पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैलाया। (दिखिए जनाब, सबसे पहले इसपर बात होगी )
1.देश की वर्तमान सरकार ने जनता से क्या कहा ?
Ø“Article-370” के बने रहने से कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नही रहेगा, अतः इसे हटा देने से कश्मीर पर पूरा स्वामित्व हासिल कर सकेंगे ।
Øअभी कश्मीर में वहाँ का अपना “संविधान” है, जिस वजह से हम वहाँ का और वहाँ के लोगों का विकास ठीक ढंग से नही कर पा रहे हैं, अतः “Article-370” को हटा देने से हम अच्छे से विकास कर सकेंगे ।
Øराजा हरि-सिंह और जवाहर लाल नेहरू जी के साथ हुए संधि के कारण हम कश्मीर के केवल 3 मामलों में ही हस्तक्षेप कर पा रहें है अतः वहाँ आतंकवाद बढ़ रहा है, अतः आतंकवाद को रोकने के लिए “Article-370” हटाना होगा ।
Øकश्मीर का पूरे भारत से जुड़ाव और पूरे भारत का कश्मीर से जुड़ाव के लिए “Article-370” हटाना होगा । “Article-370” हटा कर कश्मीर और भारत को इस तरह जोड़ देंगे की कश्मीर में विकास आ जाएगा ।
Øइसके अतिरिक्त और भी बातें है जिसे आप लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए सरकारी पक्ष के भाषण में सुन सकते हैं ।
2.भारतीय मीडिया ने जनता के सामने इसे कैसे परोसा :-
(इसे थोड़ा Headlines के अन्दाज़ में पढ़े, अच्छा लगेगा)
· कश्मीरअबहोगयाहमारा, पाकिस्तानी हाथ मसलते रह गए ।
· अब कश्मीर में भी चलेगा भारत का क़ानून ।
· नही होगा 2 संविधान ।
· आतंकवाद का होगा ख़ात्मा ।
· सरकार ने किया बड़ा सर्जिकल स्ट्राइक ।
· इसके अतरिक्त जांनने के लिए सरकारी पक्ष वाले चैनल देख लें ।
3. जनतानेइससंदेशकोकैसेएक- दूसरेतकपहुँचाया :-
v अरे, येतोअच्छाहोगया, अब हम भी कश्मीर में जा कर ज़मीन ख़रीद सकते हैं । ये भी कोई बात हुई कि - पूरे देश में कहीं भी ज़मीन ख़रीद सकतें है बस कश्मीर में नही ? क्या कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा था ?अच्छा हुआ सरकार ने ऐसा क़दम लिया ।
vअरे, ये तो अच्छा हुआ, अब हम कश्मीरी लड़कियों से शादी कर लेंगे, पहले तो कश्मीरी लड़की को कश्मीर से बाहर शादी करने की इजाज़त उसका संविधान देता ही नही था, क्यूँकि वहाँ तो उनका अलग संविधान था ना । सरकार ने ये अच्छा क़दम उठाया है ।
vअरे, अब तो सरकार अम्बानी, अडानी, बिरला जैसी कम्पनी को बोलकर कश्मीरी में भी बड़े उद्योग धंधे लगवा देगी, जिससे गरीब कश्मीरियो को नौकरी मिल जाएगी और वो आतंकवाद से नही जुड़ेंगे ।
vइस तरह की और बातें के लिए आप सब लोग अपने whatsApp यूनिवर्सिटी की मदद ले सकतें हैं ।
अबमैंआपसबके “Article-371” की चर्चा करने वाला हूँ, इसे पढ़ कर आप ख़ुद फ़ैसला कर लेंगे कि - ऊपर लिखी सरकार की बात, मीडिया की वाणी और मासूम जनता के ‘शब्द’ भ्रांति थे या सत्य थे ।
शुरू करते है - “Article – 371”
सबसे पहले एक ताज़ा ख़बर बता देता हूँ कि - “ भारत के गृह मंत्री ने “Article-370” के हटाने के तुरंत बाद सदन से लेकर सड़क तक ये ऐलान कर दिया कि -- “ आप सब लोग बिलकुल भी मत घबराएँ, किसी भी हालत और किसी भी परिस्थिति में देश और देश की सरकार संविधान से Article – 371 को नही हटाएगी । “Article-371” यथावत बना रहेगा ।” “Article-370” के हटाने के बाद कुछ लोगों के मन में यह आशंका हो रही थी कि - सरकार कहीं “Article-371” को भी न हटा दें । पर सरकार ने मजबूती से कहा है कि - ऐसा हरगिज़ नही होगा ।
मुझे पता है कि - गृह-मंत्री के इस बयान के बाद आप सभी पाठकों के दिल में “Article-371” को समझने की उत्सुकता बढ़ गयी होगी । आइए, इसे शांत करते है ।
“Article-370” और “Article-371” दोनो भारतीय संविधान के भाग 21 का हिस्सा है । दोनो में एक मूल अंतर यह है कि - “Article-370” में लिखा है कि - यह “अस्थायी” है और “Article-371” वाले पन्ने पर “अस्थाई और “स्थायी” कुछ भी नही लिखा है । यहाँ पाठकों को यह बता दें कि - कुछ भी लिखा नही होना “ख़तरनाक” हो सकता है । जिस तरह “Article-370” को हटाते वक़्त सरकार ने यह भी एक तर्क दिया था कि - “संविधान में ही जब इसे “अस्थायी” लिखा है तो एक न एक दिन तो इसे हटना ही था । शायद कल सरकार “Article-371” को हटाते वक़्त यह बोल दे कि - इसमें तो - “ स्थायी” शब्द नही लिखा था तो हमने इसे हटा दिया और यह संवैधानिक रूप से बिलकुल भी ग़लत नही होगा । फ़िलहाल अपने गृह-मंत्री जी की बात को याद करते हुए यह मान ले कि - “Article-371” अभी हटने वाला नही है ।
“Article-371” में 371 के अतरिक्त और 10 हिस्से हैं । अर्थात् कुल 11 हिस्से हैं । और इन 11 हिस्सों को आप ये मान ले देश के 11 राज्य के विशेष प्रावधान का ज़िक्र है । जैसे कश्मीर के लिए “Article-370” के अंतर्गत विशेष प्रावधान का ज़िक्र था । जिसे अब हटा दिया गया है ।
सबसे पहले “Article-371” के 11 हिस्से से जुड़े 11 राज्य का नाम जान लें, फिर विस्तृत चर्चा करेंगे जैसे - परीक्षा में “उत्तर” लिखते वक़्त किया जाता है ।
“Article-371” :- महाराष्ट्र और गुजरात के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (A) - नागालैंड के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (B) - असम के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (C) - मणिपुर के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (D) - आंध्रा प्रदेश के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (E) - आंध्रा प्रदेश के लिए विशेष प्रावधान । (शिक्षा)
“Article-371” (F) - सिक्किम के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (G) - मिज़ोरम के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (H) - अरुणाचल प्रदेश के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (I) - गोवा के लिए विशेष प्रावधान ।
“Article-371” (J) - कर्नाटक के लिए विशेष प्रावधान ।
अर्थात्, “Article-371” के ज़रिए महाराष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्रा प्रदेश, सिक्किम, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, और कर्नाटक समेत देश के कुल 11 राज्यों को विशेष अधिकार मिले हुए हैं । देश के गृह-मंत्री पूरे देश को संदेश दे रहें है कि - ये 11 राज्य को जो “विशेष-अधिकार” मिला हुआ है उसे कोई हाथ नही लगा सकता है । अतः मंत्री साहब के अनुसार इन 11 राज्यों के “विशेष-अधिकार” से इन राज्यों का विकास हो रहा है अतः इनमे कोई बदलाव नही होगा, बस कश्मीर के ‘विशेष- अधिकार” से कश्मीर की स्थिति चिंताजनक हो रही थी ।
ख़ैर, अब विस्तार से इन 11 राज्यों को मिलने वाले विशेष अधिकार को समझतें है फिर किसी निष्कर्ष पर आते हैं ।
1. “Article-371”
महाराष्ट्र और गुजरात के लिए विशेष प्रावधान ।
महराष्ट्र के विदर्भ और मराठवड़ा गुजरात के स्वराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में अलग से राष्ट्रपति द्वारा संचालित विकास बोर्ड बनाने का विशेष प्रावधान ।
पैसे के आबँटन में विशेष छूट :- तकनीकी शिक्षा और व्यवसायिक प्रशिक्षण के लिए
राज्य के अधीन कोई संस्था है तो राज्यपाल अपनी तरफ़ से उसे कई तरह के आर्थिक छूट दे सकता है ।
2. “Article-371” (A)
नागालैंड के लिए विशेष उपबन्ध ।
काम की बात :- 1960 में “केंद्र-सरकार”और “नागा पीपल्स कन्वेंशन”के बीच 16 सूत्री कार्यक्रम/ प्रस्तावपर सहमति बनी तब 1963 में नागालैंड राज्य अस्तित्व में आया ।
आधार :-1962 में 13व संशोधन के द्वारा “Article-371” (A) को जोड़ गया ।
अधिकार :-इस क़ानून के अनुसार, नागालैंड राज्य में 4 मामलों में भारत के संसद द्वारा बनाया गया क़ानून तब तक लागू नही होगा जब तक नागालैंड के विधान- सभा उसे अपनी मंज़ूरी नही दे दे ।
ये चार मामले हैं :-
(a) नागाओ के धार्मिक और सामाजिक मान्यताएँ ।
(b) नागाओ के पारम्परिक क़ानून और उसकी प्रक्रियाएँ ।
(c) नागाओ से जुड़े दीवानी और फ़ौजदारी क़ानून ।
(d) इन क्षेत्रों के ज़मीन के स्वामित्व और उसके ट्रान्स्फ़र को लेकर ।
“Article-371” (B) पर जाने से पहले थोड़ा देर यहाँ रुकना पड़ेगा क्यूँकि - यहाँ पर “सारा गुड़-गोबर” हो गया । देखें कैसे हुआ यह ??
अब हम रूक कर, ठहर कर नागालैंड के इस क़ानून को कश्मीर के धारा 370 से जोड़ कर देखेंगे ।
पहला मतलबकि, “Article-371” (B) के अनुसार - नागालैंड के कुछ क्षेत्र में कोई भी बाहरी आदमी ज़मीन नही ख़रीद सकता है, सिर्फ़ नागा-आदिवासी ही ज़मीन ख़रीद सकता है । पर पूरे देश को खलबली मची थी कि - कैसे - धारा 370 हटे और हम कश्मीर के “डल-झील” को पानी समेत ख़रीद ले । अरे, देशवासियों नाग़लंद में भी अच्छी-अच्छी झील है उसे कौन “डोनालड-ट्रम्प” ख़रीदेगा ।
दूसरा मतलबहै कि, “Article-371” (B) के अनुसार - उदाहरण के रूप में --- यदि “सुप्रीम-कोर्ट” ने यह कह दिया कि - पूरे देश से गाय(माता) की हत्या पर पर प्रतिबंध या सुअर की हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाए । परंतु मान ले कि - सुप्रीम कोर्ट की यह बात नागालैंड के धार्मिक और सामाजिक मान्यता {Point (a)} के ख़िलाफ़ हो तो नागालैंड की विधान-सभा इसे नही मानेगी और सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला वहाँ zero/सन्नाटाहो जाएगा । इसके अतरिक्त भी 3 मामले पर सुप्रीम कोर्ट या देश की संसद से बनाया गया क़ानून को नागवासी मानने से मना कर सकते हैं और जब तक “Article-371” रहेगा कोई उनका कुछ नही बिगाड़ सकता है ।
तो, साथियों आगे बढ़ने से पहले यहाँ गुरु-ज्ञान लेते जाएँ कि - “सिर्फ़ कश्मीर ही नही देश के विभिन्न राज्य में अलग-अलग नियम माने जा भी सकते हैं और नही भी, और ऐसा करने का हक़ उस राज्य को हमारे ही देश का संविधान देता है । फिर भी पूरा भारत एक है । लेकिन कुछ लोगों के अनुसार “कश्मीर को भारत से जोड़ देने और “Article-370” को हटा देने से ही देश एक हो गया ।”
(यही तो हमारे देश का अर्ध-संघवादी प्रणाली है जिस पर अंत में बात करेंगे)
अभी आगे-आगे देखते जाए, अन्य राज्यों को क्या-क्या छूट और क्या क्या अधिकार मिले हैं “Article-371” से । अभी निष्कर्ष पर नही आना है कि - “Article-370” का हटा देना सही है या साज़िश । अभी दिल्ली दूर है॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
3. “Article-371” (B)
असम के लिए
आधार :- 1969 में 22वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-राष्ट्रपति चाहे तो राज्य की विधान-सभा में एक “समिति” का निर्माण कर सकते हैं, जिसमें असम के जनजाति इलाक़े से चुने गए लोग ही शामिल होंगे । इस समिति को विधान-सभा में कार्य करने के लिए विशेष प्रावधान मिलेंगे ।
4. “Article-371” (C)
मणिपुर के लिए
आधार :- 1971 में 27वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि - मणिपुर राज्य के विधान-सभा में मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाले सदस्यों को मिला कर एक विशेष “समिति” का गठन कर सकते हैं । यह समिति मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए विशेष ध्यान देगा और राज्यपाल इसकी पूरी सूचना राष्ट्रपति तक पहुँचाएँगे ।
5. “Article-371”(D)
आंध्रा प्रदेश (तेलंगान) के लिए विशेष प्रावधान ।
आधार :- 1973 में 32वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-राष्ट्रपति दोनो राज्य की जनता के नौकरी और शिक्षा के अवसर को बढ़ाने के लिए विशेष प्रबंध कर सकता है । इसे ऐसे समझे कि - इन दोनो राज्यों की स्थायी नागरिकों को समान अवसर देने के लिए केंद्र की नौकरी, राज्य की नौकरी, और शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दे सकतें है । राष्ट्रपति इन राज्यों को अतरिक्त नौकरी और शिक्षण संस्थाओ में पद बढ़ाने का सीधे निर्देश दे सकता है ।
6. “Article-371” (E)
आंध्रा-प्रदेश के शिक्षा लिए विशेष प्रावधान ।
अधिकार :-इसके अनुसार संसद सीधे क़ानून बना कर आन्ध्र-प्रदेश में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना कर सकता है ।
7. “Article-371” (F)
सिक्किम राज्य के शिक्षा लिए विशेष प्रावधान ।
आधार :- 1975 में 36वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-इसके अनुसार यह तय हुआ कि - सिक्किम विधान-सभा में 30 सदस्य होंगे, इस राज्य से एक सांसद होगा । भारत का संसद सीधे तौर पर सिक्किम के विधानसभा सीटों का परिसीमन कर सकता है ताकि सिक्किम के सभी इलाक़ों एवं जाति- जनजाति का विधान-सभा में प्रतिनिधित्व हो सके ।
राष्ट्रपति महोदय सिक्किम के किसी भी क़ानून में यदि कोई बदलाव करते हैं तो देश के किसी भी न्यायालय में उसे चुनौती नही दे सकते हैं ।
8. “Article-371” (G)
मिज़ोरम राज्य के शिक्षा लिए विशेष प्रावधान ।
आधार :- 1986 में 53वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-मिज़ोरम के 4 मुद्दों पर देश की संसद का क़ानून लागू नही होगा ।
जी हाँ, आपने सही सुना । संसद (लोकसभा+राज्यसभा+राष्ट्रपति) जिस क़ानून को पूरे देश के लिए बनाएँगे वो मिज़ोरम में लागू नही होगा ।
ऐसे 4 मामले हैं :-
(a) मिजो लोगों के धार्मिक और सामाजिक प्रथाएँ ।
(b) मिजो लोगों के पुराना क़ानून ।
(c) मिजो लोगों से जुड़े दीवानी और फ़ौजदारी क़ानून ।
(d) राज्य के कुछ क्षेत्रों के ज़मीन के ख़रीद-बिक्री का नियम केंद्र का
नही चलेगा ।
मतलब,यहाँ भी ज़मीन का पेंच फँस गया, वही कश्मीर वाला। यहाँ के लोग किसी भी बाहरी को ज़मीन नही बेच सकते हैं । न आमिर खान को और न ही बच्चन साहब को । हाँ, राज्य सरकार के अधीन जो ज़मीन है वहाँ पर निजी उद्दयोग लगा सकते हैं ।
9. “Article-371” (H)
अरुणाचल प्रदेश के लिए विशेष प्रावधान ।
आधार :- 1986 में 55वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-इसके धारा के अनुसार “अरुणाचल-प्रदेश” के क़ानून-व्यवस्था का ज़िम्मा वहाँ के “राज्यपाल” के पास होगा । राज्यपाल महोदय राज्य के मंत्री-परिषद के साथ मिल कर राज्य के लिए फ़ैसले ले सकता है और हाँ, यदि - राज्यपाल ने अपने स्तर पर भी कोई फ़ैसला ले लिए तो देश के किसी भी कोर्ट में चुनौती नही दिया जा सकता है ।
तो, आपको अरुणाचल-प्रदेश के “राज्यपाल” की शक्ति का अंदाज़ा लग ही गया होगा । यह ताक़त उन्हें हमारे भारत का संविधान देता है ।
10. “Article-371” (I)
गोवा के लिए विशेष प्रावधान ।
अधिकार :-इस धारा के अनुसार गोवा राज्य में विधान-सभा के 30 सदस्य से कम नही हो सकते हैं ।
11. “Article-371” (J)
कर्नाटक के लिए विशेष प्रावधान ।
आधार :- 2012 में 98वे संविधान संशोधन के आधार पर इसे संविधान में शामिल किया गया था ।
अधिकार :-इस धारा के अनुसार राष्ट्रपति महोदय यहाँ के राज्यपाल को निर्देश दे सकते हैं कि - कर्नाटक- हैदराबद क्षेत्र के लिए एक “विशेष विकास बोर्ड” का निर्माण किया जाए और इसकी पूरी रिपोर्ट राज्य के विधान-सभा में प्रस्तुत किया जाए ।
हैदराबद-कर्नाटक क्षेत्र के लोगों के लिए सरकारी नौकरी, शिक्षा और व्यवसायिक प्रशिक्षण की विशेष सुविधा का प्रावधान इस धारा द्वारा किया जा सकता है । इसे क्षेत्र के विकास के लिए विशेष पैसे के इंतेजाम का भी प्रावधान है ।
सबसे अहम बात यहाँ से शुरू होती है :-
जानकारी ख़त्म और वैचारिक चर्चा शुरू
इन 11 बिंदुओ ने आपके दिमाग़ में जानकारी का सैलाब ला दिया होगा, ऐसा लग रहा होगा, अरे, भाई बस करो । अब तो बाउंसर आने लगा । अतः अब आप लोग धोनी की तरह “डक” करने की ज़रूरत नही क्यूँकि, मैं किसी स्पिनर गेंदबाद की तरह आपसे पेश आऊँगा । और भारत के लोग शुरू से स्पिनर को पसंद करते तो आए थोड़ी चर्चा स्पिन-स्पिन के अन्दाज़ में करते हैं ।
मोटा- माटी बात यह है कि - आपको पता चल चुका होगा कि - हमारा देश तो “एक” है पर देश के विभिन्न राज्यों के लिए विभिन्न प्रावधान दिए गए हैं । यहाँ तक कि - अलग- अलग प्रदेश में क़ानून को स्वीकारने और न स्वीकारने की भी छूट दे दी गयी है ।
प्रशन :- दिमाग़ में यह नही आता है कि - ऐसा क्यू ?
उत्तर :- इसका जवाब मैंने पिछले अंक में भी दिया था । “यही तो हमारे देश की विविधता है , यही तो हमारे देश की ख़ूबसूरती है ।
देश का न्याय-व्यवस्था यह कहता है कि- “लाख मुजरिम छूट जाए पर एक निर्दोष को सज़ा नही हो”
देश की विधायिका यह कहती है :- हम सबके लिए एक जैसा क़ानून बनाएँगे पर सबको धर्म, भाषा, रीति, रिवाज, समाज और प्रथा की भी इज़्ज़त करेंगे । कोई भी जाति या धर्म या समुदाय या संप्रदाय को यह न लगे कि - उनके आत्म-सम्मान के साथ ग़लत हुआ है ।
उदाहरण :- सामन्य व्यक्ति “कटार” लेकर नही चल सकता है पर सिख धर्म के लोग यह रख कर सड़क पर चल सकते हैं क्यूँकि - यह उनके आत्म-सम्मान, गरिमा और धार्मिक आस्था का प्रशन है । हाँ, उसका ग़लत प्रयोग नही कर सकते हैं
देश की कार्यपालिका यह संदेश देती है :-हम सबके साथ समान व्यवहार करेंगे । सबके साथ एक जैसी नीतियाँ लागू करेंगे, पर हमारा मक़सद समाज में समानता लाना है और इसके लिए जो कमज़ोर है उसे नीतियों का अधिक लाभ देना होगा ताकि हाशिए पर का समुदाय मुख्य-धारा से जुड़ सके और समाज में समरसता आ सके । इस तरह के कार्य को भेद-भाव नही कहा जा सकता है बल्कि - “समाज में समता लाना ही संविधान का मक़सद है”
और, समाज का चतुर्थ स्तम्भ- “मीडिया” की क्या भूमिका होनी चाहिए ये बतलाने की आवश्यकता नही है मुझे ।
मैंने कही पर यह पंक्ति लिखा था आपको याद होगा :-
(यही तो हमारे देश का अर्ध-संघवादी प्रणाली है जिस पर अंत में बात करेंगे)
हमारे देश में राज्य और देश के बीच जो संबंध है वो भी बड़ा निराला है । हमारा देश भारत न तो “संयुक्त राज्य अमरीका” की तरह “संघवाद” को अपनाता है और न ही “कनाडा” की तरह “एकवाद” को अपनाता है ।
इस मामले में हम “महात्मा बुद्ध” को अपनाते है । बुद्ध ने कहा था - “माध्यम मार्ग” अपनाओ अर्थात हमने तो तो पूर्ण रूप से “संघवाद” को अपनाया और न ही पूर्ण रूप से “एकवाद” को । हम इन दोनो के बीच के “अर्ध-संघवाद”() को अपनाते है ।
अब ज़रा इन तीनो कड़े शब्द को समझ लेते हैं ।
“संघवाद”:- यह ऐसी व्यवस्था है, जहाँ ताक़त किसी एक केंद्र के पास नही होता
है, बल्कि सभी राज्य मिलकर एक ‘संध’ का निर्माण करते है । और
केंद्र से ज़्यादा ताक़त राज्यों के पास होता है ।
“एकवाद” :- ‘एकवाद’ में सारी ताक़त “केंद्र” के पास रहता है । वो जो चाहे
फ़ैसले ले सकता है । राज्यों के पास अपनी कोई विशेष ताक़त
नही होती है उसे केंद्र के लगभग सभी फ़ैसले को मानना पड़ता है
। अक्सर ऐसी स्थिति में “तानाशाही” वाली स्थिति उत्पन्न होने
का डर लगा होता है ।
“अर्ध-संघवाद”:- परंतु भारत ने तीसरे वाले तरीक़े को अपनाय है । यहाँ केंद्र के
पास भी अपनी ताक़त होगी और राज्य के पास भी अपनी ताक़त
। होगी । कुछ मामलों का निपटारा केंद्र करेगा और उसके फ़ैसले
को राज्य को स्वीकार करना होगा और कुछ मामले राज्य अपन
स्तर पर देख सकता है इसमें केंद्र सरकार अपना “नाक” या कहें
“सीना” बीच में नही ला सकती है ।
इसके कई उदाहरण है :- जैसे - बिहार सरकार ने अपने स्तर पर फ़ैसले लेकर पूरे राज्य में “शराब और अभी गुटका” को बंद कर दिया है पर केंद्र इस मामले में कुछ नही बोल सकता है । और नया मोटर ऐक्ट को कई राज्य ने मानने से मना कर दिया है, जबकि ये केंद्र सरकार का फ़ैसला था ।
सीधी से बात यह है कि --- दोनो के बीच आपसी तारतम्यता बनी रहनी चाहिए और हमारा ये जो विविधता से भरा देश है जहाँ हर कुछ दूरी पर “भाषा” बदल जाती है, हर कुछ दूरी पर “पहनावा” , खान-पीन, संस्कृति, तरीक़ा, लेह्जा, और हर कुछ दूरी पर सम्मान और सलाम का तरीक़ा बदल जाता है । ज़रा सोंचे ऐसे देश में क्या कोई एक केंद्र के हाथ में सारी ताक़त और सारी शक्ति सौंप देने से देश में एकरूपता बनी रह सकती है । सच तो यह है कि - हमें “एकरूपता” शब्द के सही अर्थ को समझने की ज़रूरत है ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
अब बस, बहुत हो गया
इस “एकरूपता” शब्द पर चर्चा अगले कड़ी में करेंगे और अभी article- 370 पर कुछ मुख्य बातें रह गयी है जिसका वादा मैंने पहले अंक के अंतिम भाग में किया था ।
सच तो यह है कि - इस भाग में “Article-370” को हटाना सही है ये ग़लत इसे समझने के लिए हमने “Article-371” पर पूरी चर्चा कर लिया । आप लोग भी इसी इसकी गहराई में उतरते चले गए और मैं भी लिखने के क्रम में आपके पीछे- पीछे चलता चला गया ।
कोई बात नही, अगले अंक में विशेष रूप से हम - “Article-370” के संवैधानिक और राजनैतिक पक्ष पर चर्चा करेंगे ।
आशा है, आज का अंक आप सभी साथियों को मज़ेदार लगा होगा । नही लगा तो मुझे अपने “शब्दों की डाँट” लगा सकतें हैं ।
इसे पूरा पढ़ने के बाद, हो सकता है अब आप इस आधा ही सही पर इस नतीजे पर पहुँच गए होंगे कि - केंद्र सरकार के द्वारा - “Article-370” को हटाना कितना सही फ़ैसला है ????
अगर अभी भी नही पहुँचे है तो -- प्रतीक्षा करें - अगले अंक का
नोट :-
1॰ ये लेखक का लेखक ने अपने शब्दों और अपने नज़रिय से लिखा है ।
2॰ इसके लिए “Google” और lallantop और अन्य न्यूज़ का सहारा लिया है ।
3॰ टंकण संबंधी दोष के लिए माफ़ी (लेखक ने ख़ुद type किया है)
और ये तो पता ही होगा कि - लेखक कौन है ।
आपका साथी
मोहम्मद अली
धन्यवाद !!!


Comments
Post a Comment