Delhi University: -  Teachers on Road or Education ?
दिल्ली विश्वविद्यालय :- शिक्षक सड़क पर या शिक्षा  ? 

(Delhi University से जुड़े मामले की गहराई को समझने के लिए इस लेख को पढ़े )

जब एक ही उल्लू काफ़ी है, बर्बादे गुलिस्ताँ करने को
    हर शाख़ पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा  ?

क्या होगा, जब JNU, अलीगढ़, और अब दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे शिक्षण संस्था ख़बरों में तो आ रहें हैं पर अपने अकादमिक स्तर की गुणवत्ता के इतर कभी छात्रों तो कभी शिक्षकों के बुनियादी संघर्षों को लेकर । 

 किसी समाज, समुदाय या देश की पहचान ख़त्म करना है तो पहला ‘हमला’ शिक्षण-संस्थानो पर किया जाता है और शिक्षकों (गुरु) की आत्म-निर्भरता को ख़त्म कर उसे कमज़ोर बनाने का प्रयास किया जाता है । दिल्ली विश्वविद्यालय में सड़कों पर आंदोलन कर रहे शिक्षकों की समस्या को यदि आप उनकी ‘निजी-समस्या’ समझ रहें हैं तो आपको रूक कर, ठहर कर, एक बार फिर से सोचना चाहिए, विचार करना चाहिए, अपने नज़रिए को नया आयाम देना चाहिए और कम से कम इस ‘लेख’ को तो एक बार ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि - आपको पता चले सके कि -

जिस ‘गुरु’ के दम पर भारत ‘विश्व-गुरु’ बनने का दंभ भर रहा है, इस देश ने उसके भी कई प्रकारों (Versions) कर दिए हैं :- 

Ø  Permanent शिक्षक 
Ø  Ad-hoc    शिक्षक
Ø  Guest     शिक्षक
Ø  Temporary शिक्षक 
Ø  contract    शिक्षक


      वो दिन दूर नही है, जब इस सूची में कुछ और ‘प्रकार’ (Versions) जोड़ दिए जाएँगे, और उन्हें इस तरह नचाया जाएगा जैसे रिंग मास्टर सर्कस के ‘शेर’ को नचाता है । हमें इस पूरी घटना को काल-क्रम के हिसाब से देखते हुए इसके हर एक पहलू को समझने की ज़रूरत है कि - दिल्ली ही नही बल्कि पूरे देश के शिक्षकों के साथ, बच्चों के साथ और सम्पूर्ण शिक्षा-व्यवस्था के साथ हो क्या रहा है और सरकार कितनी ‘चपलता’ और ‘चतुराई’ के साथ पूरी शिक्षा व्यवस्था की मिट्टी पलीद करने में लगी हुई है । 

इस पूरी शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस करने और वर्तमान एवं भविष्य में पढ़ रहे हर ‘युवा विद्यार्थियों’ को इंसान की जगह “रोबोट” बनाने की ऐसी साज़िश चल रही है जिसे समझने के लिए आपको whats-app ज्ञान और गोदी-मीडिया से बाहर निकल कर यथार्थ का सामना करना होगा । 

इस साज़िश को अमली-जामा पहनाने के लिए सरकार एवं उसका तंत्र हर बार अलग- अलग सिरे(कोने) से शिक्षा व्यवस्था पर चोट कर रहा है । कभी उच्च शिक्षा में हो रहे शोध में आर्थिक कमी करके, कभी शोध-कार्य के लिए बजट में कटौती करके, कभी छात्र-वृति में कमी करके, कभी छात्र-वृति की योग्यता को कठिन करके, कभी छात्रों के फ़ीस को बढ़ा कर, कभी सवाल पूछने वाले छात्रों को देश-द्रोही बता कर, कभी छात्रों पर हमला तो कभी शिक्षकों पर हमला । ये तमाम प्रयास देखने में अलग-अलग लग रहें होंगे पर ये सारे पहलू एक दूसरे से जुड़े हैं और अलग- अलग तरीक़े से इन पर हमला करके पूरी शिक्षा-व्यवस्था को कमज़ोर करने का खेल चल रहा है । 

इस बार दिल्ली विश्वविद्यालय के Ad-hoc शिक्षक उनके जद (निशाने) पर आएँ हैं ।           

 डूबेगी ‘शिक्षा’ तो आएँगे कई पीढ़ीयां ‘जद’ में
  इसमें सिर्फ़ हमारा नुक़सान थोड़ी हैं ॰॰॰॰॰॰॰ 

शिक्षक की नई प्रजाति  (Ad-hoc शिक्षक) :-   

       ऐसा नही है कि- सिर्फ़ दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षकों को ‘संविदा’, ‘अनुबंध’, ‘अतिथि’ जैसे अलंकारो से सुसज्जित किया गया है। यह अलंकार शिक्षकों के लिए “पिंजरे में बंद परिंदे को उसका मन-पसंद भोजन देने” से भी घटिया है, क्यूँकि यहाँ तो ‘मन-पसंद’ भोजन का भी ख़तरा बना रहता है॰

किसी शिक्षक की सबसे बड़ी परीक्षा उसका प्रतिदिन लिया जाने वाला वर्ग (Class) है, जहाँ वो विषय-वस्तु के माध्यम से बच्चों को सबल और आत्म-निर्भर बनने की सीख देता है । दिल्ली University का दुर्भाग्य देखिए कि - प्रतिदिन बच्चों में आत्म-निर्भरता की घुट्टी पिलाने वाले क़रीब 5000 से अधिक शिक्षक को अपनी निर्भरता का पता ही नही होता है ? हर रोज़ क्लास-रूम में बच्चों के सामने परीक्षा देने के बावजूद हर 4 महीने पर उन्हें अपने प्राचार्य को अपने योग्य होने का सबूत देना पड़ता है । इसे शिक्षक इतिहास का काला अध्याय नही तो और क्या कहा जा सकता है जब किसी शिक्षक को, शिक्षक बने रहने के लिए, अपनी प्रतिभा के अतरिक्त ‘दायं-बायं’ देखने का विचार आने लगे । 

जी हाँ साथियों, ये लेख सूचना से सम्बंधित नही है पर फिर भी आपको बताता चलूँ कि - दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 10000 शिक्षक हैं जिनमे तक़रीबन 5000 शिक्षक को एक नई प्रजाति - “Ad-Hoc शिक्षक” के नाम से जाना जाता है । ये ‘प्रजाति’ भी पहली कक्षा से 17वी कक्षा पास कर NET/Ph.D. के माध्यम से पूरी योग्यता के साथ शिक्षक तो बन जाते हैं पर इस प्रजाति का दर्द आप तक पहुँच जाए तो आप शिक्षक बनने के सपने से भी डरने लगेंगे । 

आप शायद कल्पना नही कर सकते है, उस पीड़ा को जब इस प्रजाति से आने वाली ‘महिला शिक्षिक’ को अपने प्रसव-पीड़ा के अगले ही दिन छात्रों के बीच ज्ञान उँडेलने आना पड़ता है क्यूँकि इन्हें मातृत्व अवकाश से वंचित कर दिया गया है । ऐसे में पितृत्व-अवकाश की बात ही करना बेमानी प्रतीत होती है । इन्हें अपना सर्व-श्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बाद भी पदो-उन्नति (Promotion) के विचार को लाने से भी रोक दिया जाता है । हर 4 महीने बाद - विभाग से प्राप्त एक काग़ज़ का टुकड़ा इन्हें University के Class room से कोसो दूर सड़क पर भेज सकता है । कभी कभी तो मुझे ऐसा लगता है - ये “शिक्षक” हर 4 महीने बाद अपने नौकरी लगने की ख़ुशी में पार्टी करते होंगे या अपने नौकरी बने रहने का ‘काग़ज़’ ‘EMI’ के दुकान पर भेज देते होंगे ताकि वहाँ से कोई आपत्तिजनक सूचना ना आ जाए । इन शिक्षकों को मारने के लिए तलवार नही, कागज के टुकड़े को अस्त्र बनाया गया है । 
      
दिल्ली विश्वविद्यालय में सन 2016 से किसी भी शिक्षक की स्थायी (Permanent) नियुक्ति नही हुई है । और इस काल-क्रम में “Ad-Hoc शिक्षक” की संख्या बढ़ कर तक़रीबन 5000 के क़रीब हो चुकी है । अर्थात् कुल शिक्षक का 50 फ़ीसदी (%) । शिक्षकों की आधी-आबादी को इतने असहाय पीड़ा के साथ बच्चों के समक्ष भेजने की यह प्रक्रिया हमें ‘विश्व-गुरु’ नही ‘ब्रह्मांड गुरु’ बनाएगा । बस प्रतीक्षा करें । इसके अतरिक्त स्थायी (Permanent) शिक्षकों की अपनी अलग पीड़ा हैं । उन्हें पिछले 15 वर्षों से Promotion से दूर रखा गया है ।  

Ad-hoc शिक्षकों के साथ छल :- 

अपनी आवाज़ को class room की चहारदीवारी से निकाल कर सड़क पर लाने की विवशता की कहानी 28 Aug 2019 से शुरू हुई थी । 29 Aug2019 को होने वाले “DUTA” (Delhi University Teacher’s Association) चुनाव के ठीक एक दिन पहले दिल्ली University की तरफ़ से एक चिट्ठी जारी किया जाता है । उस चिट्ठी के माध्यम से Ad-hoc शिक्षकों को यह भरोसा दिलाया जाता है कि-

Letter No- CB-II/Cir. No.32(a)/2019/317 dated – 28.08.2019

“ Delhi University  जल्द से जल्द शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति (Permanent Appointment) की व्यवस्था करे और जब तक स्थायी नियुक्ति नही हो जाती है तब तक शिक्षकों की आवश्यकता पड़ने पर - विश्वविद्यालय Guest शिक्षकों की बहाली कर सकती है .”

इस पत्र से - “स्थायी नियुक्ति” होने की सम्भावना बढ़ती नज़र आती है जिसके लिए “Ad-Hoc शिक्षक” भी योग्य है । अतः उन्हें अपने ‘स्थायी’ होने की दावेदारी के संकेत मिलते हैं ।    

परंतु यह बतलाने की आवश्यकता नही कि - University  द्वारा जारी किया गया यह पत्र वैसा ही ‘चुनावी-जुमला’ था, जैसा - “15 लाख आएँगे”  । न 15 लाख आए, और न ही “स्थायी शिक्षकों” की नियुक्ति हुई । देश अपने 4॰5 % GDP के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर है । 

यहाँ पर एक रहस्य प्रशन बन कर सामने आता है कि - “इस पत्र को University द्वारा प्रकाशित किया था या इसके पीछे DUTA के वो चेहरे छिपे थे जिन्हें सत्ता की भूख थी”

उस पत्र के आलोक में University ने अतिथि (Guest) शिक्षकों की बहाली शुरू कर दिया, क्यूँकि इस पत्र में  Ad-hoc शिक्षक की नियुक्ति की कोई चर्चा नही है । Ad-hoc शिक्षक तो ख़ुद के “स्थायी” होने के सपने संजो रहा था ।  स्वभाविक है ‘अतिथि’ जाने के लिए ही आते हैं । सत्र समाप्ति के बाद Guest शिक्षकों की विदाई हो गयी और हालात पहले से बुरे होने लगे क्यूँकि नई बहाली पर ग्रहण सा लगा हुआ था ।  

DUPA की चाल और Ad-Hoc बदहाल  :- 


DUPA :- (Delhi University Principal Association)

 इस पूरे प्रकरण में “आग में घी” डालने का कार्य - “DUPA” ने किया । हुआ यूँ कि - Delhi University के पाँच वर्ष के कार्यकाल के समाप्त होने पर कुलपति (VC) ने उन्हें अपने पद पर 2 अतरिक्त महीने बने रहने की छूट दे दिया, पर उनकी भूख 2 महीने नही बल्कि अगले 05 साल वाली थी ।  ऐसे में उन्होंने अपने ग़ुस्से को Punching box की जगह “Ad-Hoc शिक्षक” पर निकाला । “DUPA” ने Ad-Hoc शिक्षक के वेतन और उनके कार्य-निरंतरता (Job Continuation) पर रोक लगा दिया ।  

      इतना होने के बाद भी यदि कोई शिक्षक अपना ज्ञान और अपनी आवाज़ चहारदीवारो से बाहर नही निकाल सके तो उसके बुद्धिजीवी होने पर मुझे संदेह होगा । ठीक वैसा ही हुआ - DUTA के सभी स्थायी एवं Ad-Hoc शिक्षक एक साथ आवाज़ बुलंद करते हुए सड़क पर उतर आए और VC कार्यालय का घेराव किया ।    

      मामले की गंभीरता को देखते हुए - HRD मंत्री ‘रमेश निशांक पोखरियाल’ ने ‘DUTA’ के अध्यक्ष- “राजीब राय ” एवं उनकी टीम से बात-चीत किया । 

DUTA के तरफ़ से चार महत्वपूर्ण माँगे सामने रखा गया । 

1) Ad-Hoc शिक्षक को समायोजित कर के उन्हें स्थायी शिक्षक बनाया जाए । (Absorption) 
2) 28-08-2019 को जारी किया गया पत्र वापस लें । 
3) 10 %  EWS (Economical Weaker Section) के लिए अलग से सीट निर्धारित किए जाए । 
4) स्थायी शिक्षकों का Promotion किया जाए . 


इस बात-चीत के बाद बड़ी ही चतुराई के साथ सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण माँग Ad-Hoc शिक्षकों के समायोजन (Absorption) की को किनारे करते हुए बाँकि तीनो माँग को सरकार की तरफ़ से स्वीकार कर लिया गया । चूँकि, 28-08-19 के पत्र में “Ad-Hoc शिक्षक” शब्द की कोई चर्चा ही नही हुई थी , अतः University केवल Guest शिक्षक ही नियुक्त करने लगी थी । परंतु DUTA और HRD मंत्री के बात -चीत के बाद इसमें ‘भाषायी सुधार’ करते हुए - Guest के अतरिक्त Ad-Hoc/temporary/Contract “शब्द” भी जोड़ दिए गए ।

उस नए “पत्र” में इस बात को जोड़ दिया गया है कि -

“जब-तक University स्थायी नियुक्ति नही करती है तब तक उसे Ad-Hoc/temporary/Contract शिक्षक भी नियुक्त करने की अनुमति दी है ॰” 

परंतु, यहाँ पर प्रशन यह उठता है कि - जहाँ से हमने चलना शुरू किया था हम वही पहुँच गए । एक तरफ़ 2017 से MHRD सदन के माध्यम से जनता को यह विश्वास दिल रहा है कि - “हम जल्द ही स्थायी नियुक्ति करने वाले हैं” यह बात सदन में - वर्तमान HRD मंत्री ने और इससे पूर्व HRD मंत्री रहे - “प्रकाश जावडेकर” ने भी कहा है । पर इस मामले में हो रहा विलम्ब सबके सामने है ।   
      दूसरी तरफ़ Ad-Hoc शिक्षकों की Absorption (समायोजन) की माँग को बात-चीत के टेबल पर “ठंडी-चाय” समझ कर गटक लिया गया । Ad-Hoc शिक्षकों की वही पीड़ा, वही कष्ट और वही संघर्ष आज भी सड़क पर आवाज़ लगा रही है ।  

      कुछ बात ध्यान देने योग्य है कि - जिसे ठहर कर सोंचने की ज़रूरत है  !!! 

Ø  DUTA के प्रतिनिधि Ad-Hoc शिक्षक की माँग को लेकर बात-चीत करने गए थे या स्थायी शिक्षक के “Promotion” की स्वीकृति हेतु ??? 
Ø  यदि Ad-Hoc शिक्षक की बहाली यूँ ही चलती रही तो “स्थायी शिक्षक” की नियुक्ति ऐसे ही लटकी रह सकती है ।  
Ø  Ad-Hoc शिक्षक की हालत आज भी वैसे ही है जैसी इस पूरे आंदोलन से पहले थी । 
Ø  क्या ऐसा नही लगता कि - DUTA चुनाव के ठीक एक दिन पहले प्रकाशित पत्र का उद्देश :- “5000 Ad-Hoc शिक्षक के वोट को समायोजित करना था ना कि उन्हें ‘स्थायी-शिक्षक’ के रूप में समायोजित करना” 
Ø  DUTA के प्रतिनिधि और HRD मंत्री की बैठक की बात-चीत (Record on Discussion) को देखने से साफ़ पता चलता है कि -  Ad-Hoc शिक्षकों के (Absorption) समायोजन की बात को किनारे करते हुए बड़ी ही सुंदरता के साथ सबसे नीचे 4th & 5th Point  में उन्होंने स्थायी शिक्षकों के Promotion को जगह दिलवा दिया । 

मेरी समझ से :- 

इस पूरे आंदोलन, धरने और क्रांति की बुनियाद Ad-Hoc शिक्षकों ने अपने साथ हो रहे शोषण के विरुध शुरू किया परंतु आज वो वहीं खड़े हैं । न तो उनका Absorption (समायोजन) सम्भव हुआ, न तो स्थायी नियुक्ति की की समय-सीमा तय हुई और न ही Ad-Hoc शिक्षकों को किसी अन्य तरह की सुविधा दिया गया । DUTA और HRD मंत्री की बैठक से कौन ख़ुश हुआ और कौन संतुष्ट ये सोंचने का काम आपको करना चाहिए !!!  

अंत में यही कह सकता हूँ कि - देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में संघर्ष चलते रहना चाहिए” परंतु विश्व गुरु बनने की चाहत रखने वाले देश में यदि गुरु के साथ ही छल किया जाए तो यह एक दुर्भाग्य ही माना जा सकता है । 

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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें

धन्यवाद ।
Dr. Mohammad Ali 
Assistant Professor 
Dept. of Philosophy
RLSY College
Patliputra University, Patna

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