गांधी जी के “स्वराज" को संक्षेप में समझते हैं !!!


             राष्ट्र-पिता महात्मा गांधी (बापू) की जन्म दिन के उपलक्ष्य में उनके बेहद महत्वपूर्ण विचार से अपने बात की शुरुआत करते हैं :-  


गांधी जी कहते थे :- 

    शोषण और दमन के पीड़ित व्यक्ति को किसी भी हालत में   ' निर्दोष '  नही कहा  जा सकता है. वैसे व्यक्ति अपने शोषण की प्रक्रिया के ज़िम्मेदार ख़ुद ही होते हैं. 

ऐसे व्यक्ति को अपने ही ख़िलाफ़ बग़ावत करना सीखना चाहिए ” - गांधी जी. 


मेरी तरफ़ से इसे आगे बढ़ाते हुए :- 

"...............और जो लोग उन्हें बग़ावत करना सीखा सकते हैं, (अर्थात् उनकी मदद कर सकते हैं) उन्हें आगे बढ़ कर इस कार्य को करना चाहिए ”. यही वास्तविकता और सतत (Sustainable) सहयोग है :- अली 



           गांधी जी के जन्म दिन पर आज उनके “स्वराज” के विचार को समझने का प्रयास करते हैं । आपसे विनम्र निवेदन है कि - बापू की जन्म-दिन पर उनके इस “करिश्माई विचार" को समझने की कोशिश करें । आज इस किताब को ख़त्म करने के बाद, इसके बारे में लिखने और आप तक भेजने से मैं ख़ुद को रोक नही सका । इस सारांश को पढ़ें, आपको अच्छा लगेगा । 

                                                                                  :-     मोहम्मद अली 




“ स्वराज ” -  संछेप में 

दार्शनिक, संत, समाज-सुधारक, राजनेता और विचारक महात्मा गांधी ने आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शित करने के उद्देश्य से न जाने कितने विचार कहे और लिखें । इन विचारों की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह है कि - गांधी अपने विचार के साथ जीते थे उसे अपने प्रयोग में लाते थे, उसकी सफलता और असफ़लता का प्रमाण दुनिया के सामने प्रस्तुत करते थे । यही कारण है कि - जहाँ एक तरफ़ तो उनके विचार प्रायोगिक (Practical) नज़र आते थे दूसरी तरफ़ वो आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक (Relevant) भी ।    

पुस्तक :- हिंद- स्वराज
दो शब्द :-

20 अध्यायों में वर्णित इस किताब को बापू ने ख़ुद अपने हाथो से लिखा है । आज 
किताब को ख़त्म करने के बाद मैं इसके बारे में लिखने और आप तक भेजने से ख़ुद को रोक नही सका । बापू ने अपनी लिखी इस किताब में बारे में ख़ुद क्या कहा है, पहले उसे सुनें :- 
“मेरी यह किताब इतनी निर्दोष है कि, बच्चों के हाथ में भी यह दी जा सकती है । यह किताब ईर्ष्या की जगह प्रेम सीखती है; हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को स्थापित करती है और पशु-बल के ख़िलाफ़ टक्कर लेने के लिए आत्म-बल को खड़ा करती है”
                                                                                    :-   (बापू के शब्द) 

परिचय :- 

     यह किताब इतनी दिलचस्प और नायब है कि - पढ़ते वक़्त आपके विचार आपस में लड़ने लगेंगे । आपको बताता चलूँ कि - 1909 में गांधी जी विलायत से लौटते वक़्त “जहाज” पर इस किताब को लिखा था और जब इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा था तो मुंबई (अंग्रेज काल में बंबई) सरकर ने इसे जप्त कर लिया था और इसके प्रकाशन पर रोक लगा दिया था । इसके अंग्रेज़ी अनुवाद को जब “गोपाल कृष्ण गोखले” ने पढ़ा तो उन्हें उस वक़्त ये किताब इतना “अनगढ़” और “असहज” लगा कि उन्होंने कह दिया कि :- गांधी एक साल भारत में गुज़ार लेंगे तो ख़ुद इस पुस्तक का नाश कर देंगे । परंतु गोखले जी की यह भविष्यवाणी सही नही हुई । इतने वर्षों बाद सन 1938 में गांधी जी ने कहा कि - इस किताब में सिर्फ़ एक शब्द (महिला मित्र के आग्रह करने पर) छोड़ कर इसमें कुछ भी बदलाव नही करूँगा । गांधी अपने पाठकों से कहते है कि - “दक्षिण अफ़्रीका के हिंदुस्तानियों में जो सड़न दाखिल होने वाली थी उसे इस पुस्तक ने रोका और दूसरी तरफ़ मेरे एक स्वर्गीय मित्र की यह राय थी कि - “यह एक मूर्ख आदमी की रचना है” 

पुस्तक का सारांश मेरे क़लम (नज़र) से :-

      सबसे पहले तो आपको यह बता दूँ कि - गांधी जी के अनोखे विचार से भरी इस पुस्तक को 1 या 2 पन्ने में आपके सामने प्रस्तुत करना “गागर में सागर” को समेटने जैसा है । अतः मैं इस पुस्तक की आत्मा को आपके सामने पेश करने का प्रयास कर रहा हूँ । 
                                                                                  :-  (मोहम्मद अली)

शुरुआत - 
      20 अध्याय में वर्णित इस पुस्तक की शुरुआत तो - भारत में “हिंद-स्वराज” की कल्पना के साथ होती है और धीरे- धीरे अध्याय सह अध्याय आपको “स्वराज” शब्द के असली मतलब का पता चलता है । वास्तव में यह पुस्तक एक संवाद जैसा है जिसमें गांधी जी पाठक को संवाद के माध्यम से यह बतलाने के प्रयास करते है कि - स्वराज का अर्थ सिर्फ़ देश की आज़ादी नही है और न ही अंग्रेजों को देश से भगा देने से हम भारतीयों को पूर्ण स्वराज मिल जाएगा । 

      आप उस वक़्त आश्चर्य-चकित हो जाएँगे जब गांधी जी कहते है कि - हमारी लड़ाई अंग्रेजों को देश से भगाने की है ही नही । वो अपने तर्कों से साबित कर देते हैं कि - अंग्रेजों को देश से खदेड़ कर भगा देने से हमारी हालत और बिगड़ सकती है । वो तर्क देते है कि - यदि अंग्रेज हिंदुस्तानी के स्वभाव में जीने लगे तो हम अंग्रेज को कभी भी जाने को न कहें बल्कि हम तो उन्हें अपना लें । 

      रोमांचित कर देनी वाली इस परिचर्चा को पढ़ते वक़्त आपको समझ आएगा कि - गांधी जी ने भारतीय सभ्यता की चर्चा कितने सुंदर तरीक़े से किया है । विदेशी हमारे जिन पक्षों को दोष देते हैं हम उन्हें कैसे अपने गुण के रूप में विकसित कर सकते हैं । भारतीय सभ्यता पर चर्चा करते हुए उन्होंने “अशांति” और “असंतोष” के महत्व को बखूबी समझाया है  ।

इंसान अपनी सामान्य हालत से ख़ुश रहता है मगर जब उसमें असंतोष पैदा होता है तभी वो चीज़ों को बदलने की कोशिश करता है और यही कोशिश उसे कामयाबी दिलाती है.

गांधी जी इंग्लैंड की हालत बतलाते हुए कहते हैं कि - इंग्लैंड वास्तव में वो नही है जैसा हमें दिखता है, नई-नवेली सभ्यता ने उसे बर्बाद कर दिया है । उसकी हालत तरस खाने लायक़ है । गांधी जी आगे बतलाते है कि - सच तो यह है कि; इंग्लैंड ने हमारे ऊपर क़ब्ज़ा नही किया बल्कि हम खुद उनके ग़ुलाम बन गए और सही अर्थों में उनका कोई दोष नही है । अंग्रेज तो व्यपारी लोग है, वो व्यपार करने आए थे और आज भी व्यपार करना चाहते हैं । भारत और भारतीय अपनी सभ्यता से दूर हो कर और आपस में लड़ कर अंग्रेजों के ग़ुलाम हो गए ।   

            पुस्तक पढ़ते वक़्त आपको तब झटका सा लगेगा जब आपको यह पता चलेगा कि - गांधी जी ने भारत की सभ्यता के नाश होने में - रेल-गाड़ी की उपस्थिति, वकीलों, डॉक्टरों और हिंदू-मुसलमान के बीच के संवादहीनता का उल्लेख्य किया है । गांधी स्पष्ट कहते हैं कि - “ हिंदुस्तान को रेल, डॉक्टर और वकीलों ने कंगाल बना दिया है । 

उन्होंने वकीलों की अंपुयोगिता, डाक्टरों की लूट और रेल-गाड़ी के बुरे परिणामों को अपने तर्कों पाठक के बीच रखा है । हिंदू- मुस्लिम के विवाद को गांधी जी ने इस अध्याय में जिनती ख़ूबसूरती से सुलझाने का प्रयास किया है वो सबको पढ़ना चाहिए । गांधी कहते हैं कि - हमारे देश के स्वभाव में आपसी भाई-चार है पर अंग्रेज इसे तोड़ने का प्रयास कर रहें है पर वो इसमें कामयाब नही हो सकते हैं क्यूँकि जो कमज़ोर दिल के लोग होते हैं उनके रिश्ते को ही कोई तीसरा तोड़ सकता है । और भारतीय कमज़ोर दिल के नही होते है । वो भावुक ज़रूर होते है पर उनमे हिम्ममत है ।

      गांधी के अनुसार सच्ची सभ्यता “भारत की सभ्यता है” जिसे आज हम भूल कर यंत्रो के चक्कर में पड़ गए हैं । रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का सिर्फ़ नाम रह गया, मिस्र की बादशाहत ख़त्म हो गयी मगर हिंदुस्तान ग़ुलाम होने के बावजूद अपने बुनियाद के साथ खड़ा है । यही भारत की ख़ूबसूरती है और यही भारत की सभ्यता है जो संस्कार बन कर यहाँ के लोगों के खून में घुली हुई है । सभ्यता वो आचरण है - जिससे आदमी अपना फ़र्ज़ अदा करत है, नीति का पालन करत है, अर्थात - माँ और इंद्रियो को वश में रखता है और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता है दूसरों के अहित किए बग़ैर ।  

इस पुस्तक में सिर्फ़ गांधी जी ने पाठकों के सामने सिर्फ़ अपने विचार नही प्रकट किए है बल्कि उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया है कि - हिंदुस्तानकैसे आज़ाद होगा और आज़ादी का मतलब अंग्रेजों को भगाना नही बल्कि - "पूर्ण स्वराज हासिल करना है" ।

            स्वभाविक सी बात है, जिन कारणो से देश ख़ुद से गुलाम हुआ था उन्ही कारणों को हटा देने से हमें सच्ची आज़ादी मिलेगी । हमें अपने सभ्यता को समझना होगा । इस देश की वास्तविकता को पहचानना होगा और वैसे बर्ताव करना होगा । गोला- बारूद के प्रयोग कर के या इटली के रास्ते चल कर हम एक बार के लिए तो दुश्मन को परास्त कर सकते हैं पर वास्तविक आज़ादी कभी नही मिलेगी । 

      गांधी जी के वचनो में आप महसूस कर सकते हैं कि - हमें आज़ादी केवल और केवल - सत्याग्रह और आत्मबल से मिल सकती है । अपनी बात का प्रमाण देने के लिए गांधी जी तुलसीदास की इस पंक्ति का वर्णन करते है । 
      
दया  धर्म  का  मूल  है,  पाप मूल अभिमान
तसली दया न छोड़िए, जब लग घट में प्राण ।

ये दुनिया लड़ाइयों एवं हंगामे के बावजूद सत्य, दया और आत्मबल पर टिकी हुई है । गांधी जी स्वराज की अवधारणा स्पष्ट करते हुए साफ़ शब्दों में कहते हैं कि - 

"स्वराज तो सबको अपने लिए पाना चाहिए और सबको उसे अपना बनाना चाहिए । दूसरे लोग जो स्वराज दिला दे वो 'स्वराज' नही 'परराज्य' होगा" ।

तालीम के अर्थ को लेकर भी गांधी जी ने इस पुस्तक में बड़ी सुलझी हुई चर्चा किया है । प्राथमिक शिक्षा में हम अक्षर-ज्ञान हासिल करते है, उच्य शिक्षा में भूगोल से लेकर खोग्ल-शास्त्र तक जान भी ले तो उससे किसका क्या भला हो सकता है ? वो कहते है कि - उसने सच्ची शिक्षा पायी है - जिसका मन कुदरती क़ानून से भरा होता है, जिसकी इंद्रियाँ उसके वश में है, जो दूसरों को अपने जैसा मानता है और जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत और न्यायदर्शी है । 

एक्सट्रीमीस्ट और मोडरेट दोनो पक्षों से अलग विचार प्रकट करने वाले गांधी जी ने अपने पुस्तक के अंत में दोनो पक्षों को अपना मशवरा दिया है और कहा है कि - ये दोनो दो अलग छोर है जिस पर चलकर हमें स्वराज मिलना सपने जैसा प्रतीत होता है । 

अंत में मैं जो समझ सका हुँ  :- 

पूर्ण स्वराज के लिए इंसान को अपने भीतर का डर दूर करना होगा
                               क्यूँकि। :- जो डर गया समझो मर गया ॰॰॰॰॰॰॰॰॰

जीतना है तो लड़ना होगा, अपने आत्म-बल से अपने सत्याग्रह से, अपने विश्वास से अपनी सकारात्मकता से और सवाल पूछना होगा , संवाद करना होगा और अपने विरोधियों का भी सम्मान करना होगा । मत-भेद हो सकते हैं ॰॰॰॰॰॰ मन-भेद नही । 

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साथियों,  मेरी यह कोशिश आपको कैसी लगी ज़रूर बताएँ । आप अपनी राय मुझ तक पहुँचाए ताकि आपके मशवरे और टिप्पणी से अपनी ग़लतियों को सुधार सकूँ और अपनी लेखनी के माध्यम से फिर आप तक पहुँच सकूँ । 

जिन साथियों/पाठकों को “हिंद-स्वराज -पुस्तक" की चर्चा अध्याय सह अध्याय पढ़ने की इच्छा है वो मुझे अपना संदेश(Email) भेजें . मैं इस पुस्तक को अध्याय सह अध्याय और अधिक विस्तृत ढंग से लिए लिख कर  आपकी ख़िदमत में पेश करूँगा ।    
                                                                        
:- (धन्यवाद)

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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें

Dr. Mohammad Ali 
Assistant Professor 
Patliputra University, Patna
 सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- 
 (Janghat.blogspot.com)

Comments

  1. Keep writing, wonderfully summarized...

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  2. निसंदेह गांधी जी की हिंद स्वराज एक अद्भुत पुस्तक है। मैंने पीजी के दौरान इस पुस्तक को पहली बार पढ़ा था और उसके बाद भी कई बार पढ़ने का मौका मिला। जितनी बार पढ़ी जाए यह पुस्तक उतनी बार ही कुछ न कुछ नया आयाम देखने को मिल ही जाता है। गांधी जी की सरल और सहज लेखनी इस किताब को आकर्षक बनाती है और उनके निडर विचार सोच के ताले को खोलती है।
    हमारे राजनेता काश इस पतली सी पुस्तक को पढ़ पाते!
    आपकी लेखनी हमेशा की भांति ही आकर्षक और तेज से भरपूर है। उम्मीद और विश्वास है कि आगे भी इस तरह के लेख आप भेजते रहेंगे।
    पढ़ते रहें; पढ़ाते रहें।

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  3. आपकी लेखनी में ताजगी है
    मैं महूसस करता हूँ

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