पुस्तक समीक्षा :- “धर दीनी चदरिया”

             : डॉo अबू बकर रिजवी


 

इस पुस्तक को  'रोशनाई'  देने वाले जनाब - 'डॉ० अबू  बकर  रिज़वी'  अनुभवों से भरे ऐसे फ़नकार हैं, जिन्होंने भावनाओं के समंदर में गोते लगाकर ‘ अल्फ़ाज़ों ’ की ऐसी महीन  ‘बुनाई ’ और ‘जज़्बातों’ की ऐसी संवेदनशील ‘कढ़ाई’ की है,जो पाठकों के दिलों में न केवल अपनी जगह बनाती है बल्कि हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि — 

“सपने देखने क्यों ज़रूरी हैं?”

“जीवनी बड़े लोगों की लिखी जाती है, हम तो मामूली लोग हैं” - प्रोफ़ेसर गिरीश चौधरी के इस वाक्य से उनके ग़ैर-मामूली व्यक्तित्व को स्याही की शक्ल देने वाले ‘धर दीनी चदरिया’ के लेखक ने हाशिए पर संघर्ष कर रहे हर उस नौजवान को सपने देखने और खुद पर भरोसा करने  का एक नायाब औज़ार तोहफ़े में दिया है।

“कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।”


इस पंक्ति को जीवन में चरितार्थ करने वाले इस पुस्तक के मुख्य किरदार — प्रो० (डॉ०) गिरीश कुमार चौधरी — उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद के असली हीरे हैं , जिन्हें सपने देखने से भी डर लगता है। गिरीश जी के जीवन-संघर्ष पर आधारित यह पुस्तक “धर दीनी चदरिया”  हमें भीतर तक कुरेदती है और अपनी-अपनी जीवन-रूपी चादर के रंग टटोलने को विवश करती है।

यह एक ऐसी कहानी है जिसकी शुरुआत गंभीरता, मार्मिकता और कुछ कर गुजरने की ज़िद से होती है—एक ऐसी ज़िद जो जीवन के हर पड़ाव पर गिरकर संभलने और हारकर जीतने की आदत बन जाती है। यही ज़िद गिरीश बाबू को अर्श से फर्श तक ले जाती है और यही उन्हें हर प्रतिकूल परिस्थिति में दोबारा खड़ा होने का साहस देती है।

हाशिए पर खड़े होकर सितारों का सपना देखने वाले इस नायक — डॉ० गिरीश कुमार चौधरी—भी जन्म के साथ एक सफ़ेद, निर्मल और बेदाग़ चादर लेकर आए थे। सीमित संसाधनों और अभावग्रस्त जीवन में पले-बढ़े गिरीश ने किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते भी किताबों का साथ नहीं छोड़ा।

प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास करने के बाद आगे पढ़ने की चाह तो सबकी होती है, लेकिन गिरीश की आर्थिक स्थिति उन्हें नौकरी की ओर मोड़ना चाहती थी। टीचर्स ट्रेनिंग, वायुसेना, पोस्ट ऑफ़िस और बिहार मिलिट्री पुलिस की कोशिशों में कभी समय ने धोखा दिया, कभी हालात ने और कभी अपनों ने। आई.एस.सी. के लिए एच.डी. जैन कॉलेज, आरा तक पहुँचना भी जैसे किस्मत की अधूरी लिखावट थी। इसके बाद राजकीय प्रौद्योगिकी संस्था, सहरसा में डिप्लोमा के दौरान ‘सिविल ट्रेड’ की चाह अधूरी रह गई, लेकिन ‘इलेक्ट्रिकल’ ट्रेड में उन्होंने न केवल दोनों वर्षों में प्रथम स्थान प्राप्त किया बल्कि पूरे बिहार में टॉप कर दिखाया।

वो कहते हैं ना , अक़्ल तेज करने के लिए जो दूसरी सबसे मुफ़ीद चीज़ है - ‘बादाम’ और धोखे का नम्बर उस वक्त से आज तक ‘पहला’  है । साल 1980 में धोखे ने एक बार फिर दस्तक दी—सिंदरी इंजीनियरिंग कॉलेज में नामांकन होते-होते रह गया, मगर बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (आज का NIT पटना) में उनके लिए जैसे नियति ने एक सीट बचाकर रखी थी।

पटना से इंजीनियरिंग करते हुए गिरिश को ‘दरभंगा रेडियो स्टेशन’ में नौकरी लग गयी। पढ़ाई पूरी करने की ललक और उनके नर्म लहजे ने दरभंगा रेडियो स्टेशन के तत्कालीन इंजीनियर ‘घनश्याम जी’ को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने मार्गदर्शन और निजी प्रयासों से गिरीश को ‘आकाशवाणी पटना’ भिजवा दिया।

दरभंगा से पटना का सफ़र बढ़ता गया और इंजीनियरिंग पूरा करने के बाद IES (भारतीय इंजीनियरिंग सेवा) में सफलता प्राप्त करते हुए यह सफ़र महराष्ट्र के अर्वी तक जा पहुँचा जहां विक्रम सारा भाई ने ‘अर्वी सेटलाइट कम्यूनिकेशन अर्थ स्टेशन” बनवाया था । बिहार के इस लाल ने महराष्ट्र की भाषा-बोली, खान-पीन, रहन-सहन सीखने तक तो खुद को वहाँ बनाए रखा मगर संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियाँ और बिहार से जुड़ाव की भावना ने गिरीश को जनवरी 1988 में उसी बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में शिक्षक के रूप में वापस बिहार ला दिया जहां से उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की । 

ईमानदारी और स्पष्टवादिता गिरीश के स्वभाव की पहचान है। अर्वी से विदाई के समय उन्होंने सम्मान के साथ धन्यवाद दिया, पर कार्यस्थल की कमियों को सुधार की नीयत से निस्संकोच सामने भी रखा। शिक्षक के रूप में पहचान बनाने के बाद भी गिरीश कुमार के भीतर का शिक्षक कभी पदों के बोझ तले दबा नहीं। डिप्लोमा से डी.लिट् तक का उनका सफ़र  केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि संस्थानों के पुनर्निर्माण की कहानी है । 

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के उप-कुलपति और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उन्होंने शैक्षणिक ढांचे को नई दृष्टि दी। R&D Cell, IT Cell, Training & Placement Cell की स्थापना, शोध अनुदानों की शुरुआत, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से प्राप्त आय का शोध में निवेश—ये सभी निर्णय उनकी दूरदर्शिता के प्रमाण हैं।

NIRF रैंकिंग प्रक्रिया में विश्वविद्यालय को शामिल कराना, आधारभूत संरचनाओं का विकास, छात्रावास, परीक्षा भवन, विज्ञान भवन, सेनेट हाउस का नवीनीकरण—इन सबके पीछे गिरीश की वही ज़िद थी जो कभी एक अभावग्रस्त बालक को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी। आज बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी वे शिक्षा व्यवस्था को दिशा दे रहे हैं। 

“धर दीनी चदरिया” केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि यह उस सोच की कहानी है जो हालात से हार मानने से इनकार करती है । अंत में, लेखक की कलम उधार लेकर इस पुस्तक के नायक के लिए बस इतना ही— 

विषम परिस्थितियों में जन्म लेकर जब कोई बालक डॉ० गिरीश कुमार चौधरी बनता है,
तो उसमें केवल तक़दीर का नहीं,
कुर्बानी, बुलंद हौसले, निरंतर संघर्ष
और दृढ़ निश्चय का बड़ा हाथ होता है।

इसी भाव के साथ—

“ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे—बता तेरी रज़ा क्या है?”


समीक्षक :
डॉ० मोहम्मद अली
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर विभाग, दर्शनशास्त्र
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

सम्पर्क : +91-9334302001, ali2011pf@gmail.com . 


Comments

  1. Very nicely reviewed. Commendable job...

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  2. Very Nice Thought Sir.....With Honest review

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  3. ऐसे ऐसे विद्वान सपूत से पूरा भारत वर्ष धन्य हो जाएगा ।। यही मानवता है , यही हमारा असल धर्म है , जिस व्यक्ति के शिक्षा के अनुसार ज्ञान का प्रकाश नहीं फैल पाया ,वो शिक्षा व्यर्थ है । बातें तो बहुत है , पर यही विराम देता हूँ और आप सभी को सादर प्रणाम करता हूँ।।

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  4. धर दीनी चदरिया इस पुस्तक का नाम क्यू परा ? इस पर भी कुछ चर्चा होना चाहिए था |

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    1. अली सर क्या आप मेरी उपरोक्त बातों से सहमत हैं l sudhir kumar

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