फ़िल्म समीक्षा - थप्पड़.


      फ़िल्म  -  थप्पड़      
(फ़िल्म समीक्षा से उपर उठ कर लिखा गया एक मार्मिक लेख ........) 










थप्पड़, 
थप्पड़ का मतलब सीधे हाथ से किसी के गाल पर सिर्फ़ तमाचा लगाना नही होता, बल्कि किसी के आत्म-सम्मान को अपने उल्टे शब्दों से रोंध देना भी होता है. ‘शब्दों’ का यह थप्पड़ उस वक़्त और अधिक पीड़ादायी हो जाता है जब रिश्तों की डोर प्यार से अधिक सम्मान से बंधी हो.

अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित और तापसी पन्नू के अभिनय से लबरेज़ फ़िल्म - “थप्पड़”, कहानी है - उस आत्म-सम्मान के ख़ातिर संघर्ष कर रही एक विवाहित घरेलु महिला की जिसने अपना शारीरिक, मानसिक, व्यवहारिक, व्यवसायिक और निजी इंवेस्टेमट किया हो अपने प्यार को ख़ुश रखने के लिए, उसके सपने को अपनाने के लिए, और उसके दर्द में आसूँ बहाने के लिए. इस इंवेस्टेमट के बदले मिले थप्पड़ की पीड़ा उतनी कष्टदायक नही है, जितना भयानक उसके बाद निकले इस ‘शब्द’ की गुंज :- “एक थप्पड़ ही तो मारा है”. 

   गाल पर पड़े ‘थप्पड़’ के दाग तो आंसू की क़तारों से धुल सकता है मगर कानों से हो कर दिलों में घर करने वाले उस “शब्द” को धोने के लिए सात-समंदर का पानी भी कम पड़ सकता है. आत्म-सम्मान का गला घोंट कर ज़िंदा रहना आक्सीजनग्रहण करने और co2 विसर्जित करने के अतरिक्त भी कुछ है क्या ?

जो उसूलों पर आँच आए तो टकराना ज़रूरी है
गर, ज़िंदा है तो ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है ॰॰॰॰॰

  कैसे एक थप्पड़ इंसान के जीने के तरीक़े को बदल सकता है, इसे पर्दे पर परोसते हुए अभिनेत्री कहती है कि - “जीने और निभाने में फ़र्क़ होता है”. मैं इस थप्पड़ के लिए तुम्हें तो माफ़ कर दूँ मगर खुद को कैसे माफ़ करूँगी ? अंदर से एक आवज आती है - “थप्पड़ तो एक ही था, वो भी पहली बार था, मगर मारना नही चाहिए” . इस आवज की गुंज के साथ मैं रिश्ते निभा तो सकती हूँ - जी नही सकती और मैं ज़िंदगी जीना चाहती हूँ निभाना नही .        

 ‘थप्पड़’ का जवाब ‘थप्पड़’  नही होता है, थप्पड़ का जवाब होता है - अपने आत्म-सम्मान को पहचानना, खुद की क़ीमत को समझना, अपने प्यार और दुलार को गहराई को खुद में समेट कर फिर से वहाँ उँडेलना - जो इस काबिल हो, जो अपने अपने कर्मों से आपको कमाना जानता हो, जो आपकी कमियों के साथ आपको स्वीकारने के लिए तैयार हो. जो उस वक़्त आपके साथ खड़ा हो जब आप अपने वजूद के लिए सारी दुनिया से लड़ रहे हो .   

  ये कहानी है, I Love You  से, I don’t Love you तक के सफ़र का जहाँ नफ़रत तो नही हो सकता है पर दिल में एक चुभन है, ख़लिश है, एक कसक है, और एक ख़ालीपन है, जिसे अब शायद - “I am Sorry” कभी नही भर सकता है. तुम्हारा पछताना और गिड़गिड़ाना हमारे रिश्ते के दरार को तो भर सकता है मगर उस दाग को कैसे भरेगा जिसने मेरी हक़ीक़त को भ्रम में बदल दिया. तुम्हारा आत्म-अवलोकन मुझे तुमसे जोड़ कर तो रख सकता है मगर “जो चीज़ जोड़ कर रखी जाए समझो वो टूटी है.”
एक लेखक (दर्शक) के रूप में अंत में यही कहूँगा कि - रिश्ते प्यार से बनते ज़रूर हैं, पर वो चलते हैं - “ज़िद से” एक अच्छी ज़िद से. सामने वाले को खुश रखने की ज़िद, उसे माफ़ कर देने की ज़िद, उसकी कमियों को स्वीकार कर लेने की ज़िद, उसके प्यार करने के तरीक़े को अपना लेने की ज़िद और ये ज़िद दोनो तरफ़ से होनी चाहिए वरना एक शेर सुनते जाए :-  

जैसे पहले थी(था),
वैसी हू-बहू नही लगती(ता)
मैं तुझसे क्या बात करूँ
अब तो तू,
तू नही लगती(ता)॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ 

महत्वपूर्ण बात :- फ़िल्म के विषय को जितनी गहराई में जा कर मैंने लिखने का प्रयास किया है, सम्भव है आपको फ़िल्म वैसी नही लग सकती है अतः फ़िल्म देखने के बाद आपकी नज़रे मुझ पर नही होनी चाहिए !!!  

आग्रह :- PINK जैसी अपेक्षाएँ ले कर फ़िल्म देखने की चाहत न करें.

ध्यान दें :- फ़िल्म के “Spoiler” को उजागर नही करते हुए फ़िल्म के विषय को लेकर मैंने अपने भाव को व्यक्त किया है. आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर लिखें .     

Please Write:-  janghatfoundation@gmail.com +91- 7903892791 , 9334302001.

Comments

Popular Posts