अकेला आदमी (भाग-02) - कहानी नीतीश कुमार की - पुस्तक समीक्षा.


अकेला आदमी        पुस्तक समीक्षा - 2.0 
                         ( कहानी  नीतीश  कुमार  की )
   लेखक : संकर्षण ठाकुर.



Note :- पुस्तक समीक्षा का यह दूसरा भाग है. पाठक से विनम्र निवेदन है कि - Blog (सूझबुझ) पर जा कर समीक्षा के प्रथम भाग को ज़रूर पढ़ ले तभी समीक्षा के दूसरे भाग का आनंद लें. 

(https://janghat.blogspot.com/2020/03/blog-post_77.html)

मैं मानता हूँ की - “हर सामजिक व्यक्ति को एक हद तक राजनीति से जुड़ाव रखना चाहिए. समाज और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलु है”. और यहाँ तो मामला बिहार का है.                                                             :- मोहम्मद अली  

Recap :-   (भाग एक को याद करते हुए )

   समीक्षा के प्रथम भाग के अंत तक नीतीश कुमार दिल्ली में संसद भवन पहुँच चुके थे और बिहार में लालू प्रसाद का राज चल रहा था . यह बात है 1990 से 1995 के बीच का. उस वक़्त तक नीतीश कुमार भाजपा की सोंच और Ideology से सहमत नही थे. नीतीश कुमार कोंग्रेस के प्रति भी सकरात्मक नही थे क्यूँकि - इंदिरा और कोंग्रेस की दमनकारी सत्ता के ख़िलाफ़ ही तो आंदोलन कर के नीतीश और लालू जैसे नेता ने अपनी समाजवादी पहचान बनाई थी. सांसद के रूप में नीतीश अपना क़द बढ़ा रहे थे और ज़ोर्ज-फरनेंडिस दिगविजय (बिहार वाले) जैसे अन्य समाजवादी नेता से अपनी पहचान भी.

      इसमें कोई शक़ नही है कि - लालू को बिहार की कुर्सी दिलाने में और अडवाणी की रथ यात्रा को रोकने में नीतीश कुमार लालू जी के साथ कदम-ताल कर के खड़े थे मगर बिहार की कुर्सी मिल जाने के बाद लालू के बदले हुए रूप से नीतीश और अन्य समाजवादी नेता भी परेशान था. (नीतीश लालू के बात-चीत के रूप में इसकी चर्चा समीक्षा-1.0 में हो चुकी है)

      इन बात-चीत से नीतीश और लालू के बीच खटास पैदा होना शुरू हो गया . नीतीश भी थोड़े अक्खड़ प्रवृति के थे और लालू के “चेला-चपाटी” ने उन्हें नीतीश के ख़िलाफ़ उल्टा सीधा भी समझा रखा था . लालू और नीतीश के बीच “टकराहट” को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण घटना को समझना ज़रूरी है . 

      घटना :-  
     बात सन 1992 की है, लालू बिहार के CM थे और दिल्ली के बिहार भवन में थे. नीतीश सांसद के रूप में दिल्ली में थे. नीतीश कुमार बिहार के किसानो की माँग को लेकर लालू से बात चीत करने गए. इस मीटिंग में शिवानंद तिवारी, बिशन पटेल और ललन सिंह भी थे. इस मीटिंग में बात-चीत के दौरान लालू को ललन सिंह की कोई बात बुरी लगी और लालू ने ललन सिंह को गालियाँ देना शुरू कर दिया और बुरे लह्ज़े में वहाँ से निकल जाने को कहा वरना गार्ड से बाहर फेंकवा देने का आदेश दिया. नीतीश अपने साथियों समेत ललन सिंह को लेकर वहाँ से चले गए और कहा :- “अब साथ चलना मुश्किल होगा”. इस घटना के बाद शरद यादव और ज़ोर्ज जैसे अन्य नेता ने नीतीश कुमार को समझाया पर नीतीश नही माने. 

[गुरु ज्ञान लेते रहिए :- ये वही ललन सिंह है, जो वर्तमान में मुंगेर (बिहार) से MP है और संसद में JDU के सांसद दल के नेता और नीतीश कुमार के बेहद ख़ास . खबर यह भी है की - प्रशांत किशोर को JDU से बाहर करने में इनकी अहम भूमिका है. ]

Ø नीतीश-लालू अलग होने की घटना

  छात्र जीवन से समाजवाद के समर्थक, लोहिया और कर्पुरी के पथ पर चालने वाले नीतीश कुमार शुरु से लालू के समर्थक थे. नीतीश का लालू से अलग हो जाना एक महत्वपूर्ण घटना है, जो बिहार की राजनीति में आने वाले समय में भूचाल लाने वाला था. अतः इस घटना को समझने के लिए बिहार के जातीय गणित को समझना होगा :- 

(मोटा-मोटी आँकड़ा समझने के लिए)
 प्रतिशत 
 जाति 

 1990 के बाद की स्थिति .........
14 %
यादव 

          लालू की पकड़
17 %
मुस्लिम (सभी जाति)

08 %
कुर्मी + कोईरी 

         नीतीश की पकड़ 
33 %
EBC 
बँटा हुआ 
लालू की चाहत/ नीतीश गुट की भी चाहत   
14 %
दलित 
कोंग्रेस 
राम-विलास की तरफ़ जाता हुआ 
13 %
General (स्वर्ण)
कोंग्रेस
BJP की तरफ़ जाता हुआ 
कुल- 99%




  लालू यादव को 31%(M+Y) के वोट का शुरूर (नशा) तो चल ही रहा था पर यह नशा नीतीश खेमे के लिए डर का भी कारण था. दूसरी तरफ़ लालू अपने “ग़रीबों के मसीहा” वाली छवि की वजह से दलित वोट बैंक (14%) में भी अपनी बढ़त बना रहे थे . यही कारण था कि - बिहार के दिग्गज़ नेता भी लालू की छत्र-छाया में अपनी रजनीति करना चाहते थे. 

        नीतीश कुमार के पास बड़ी उलझन यह थी कि - लालू से अलग हो कर ख़ुद को कैसे स्थापित किया जाए ? ख़ुद को कुर्मी नेता के रूप में स्थापित करने को लेकर एक बड़ा मामला है . इस घटना की विस्तृत चर्चा किताब में हैं . संक्षेप में इतना कह देता हुँ कि - सन 1992 में पटना के गांधी मैदान में आयोजित “कुर्मी रैली” में नीतीश कुमार काफ़ी सोंच-विचार करने के बाद मंच पर चले ही गए और लालू के ख़िलाफ़ बिगुल फूंक दिया. यह “कुर्मी-समाज” का “महा-रैली” था. जिसकी तैयारी पिछले 6 महीने से राज्य-भर में किया जा रहा था, और लालू की नज़र भी इस रैली पर थी. 

[ गुरु ज्ञान :- इस ‘कुर्मी-रैली’ के संदर्भ में किताब यह कहता है कि - सतीश कुमार ने व्यक्ति ने ख़ूब मेहनत से इस महा-सम्मेलन को एकजुट किया और नीतीश मंच लूट लिए और ये नीतीश के निर्णय का कमाल था. बिहार के गलियारों में लालू गुट यह कहता है कि - लालू ने ही नीतीश को इस रैली में सम्बोधन करने का मशवरा दिया था ]

 इस रैली के बाद नीतीश और लालू बिलकुल आमने - सामने आ गए थे. नीतीश गुट के कुछ लोग नीतीश को लालू से मिलने का मशवरा दे रहे थे और इधर लालू गुट के एक मज़बूत सिपहसालर “अब्दुल-बारी-सिद्दीक़ी” भी नीतीश को लालू से मिलने के लिए मना रहे थे. पर नीतीश इस बार अड़ गए.  उन्होंने ज़ोर्ज को कहा - “बोरिया-बिस्तर लेकर पहाड़ पर चला जाऊँगा पर अब लालू की तरफ़ नही”.  ख़ैर, ज़ोर्ज मान गए और 02 अप्रेल 1994 के आस पास 14 जनता दल सांसदों ने लालू का बहिष्कार करते हुए एक अलग गुट बना लिया . उस वक़्त इसका नाम जनता दल (ज़ोर्ज) रखा गया . यही गुट, बाद में, बिहार के कुछ अन्य नेताओ के साथ मिल कर 19 october 1994 को “समता-पार्टी” का निर्माण किया और अगले साल होने वाले बिहार विधान-सभा चुनाव में जुट गया . 

Ø  1995 :- बिहार विधान-सभा चुनाव :-   (टी.एन.शेषन - चुनाव आयुक्त )

लालू के पहले कार्यकाल के बाद 1995 में बिहार विधान-सभा चुनाव होने को था.- समता-पार्टी की तरफ़ से नीतीश कुमार, ज़ोर्ज फ़र्नांडिस, शिवानंद तिवारी और अन्य नेताओं ने  पुरे बिहार (अविभाजित झारखंड) में घूम-घूम कर प्रचार किया. समता पार्टी के पास “संसाधनो की कमी” तो थी ही साथ में “लालू-लहर” के आगे वो टिक नही सके. 324 विधान सभा की सीट में 164 सीट जनता-दल के खाते में गई और “समता-पार्टी” को मात्र - ‘07’ सीट मिले.  

      इस हार का एक बड़ा कारण यह था कि - एक तरफ़ ‘जनता-पार्टी’ थी जहाँ शरद-यादव और लालू-यादव का दबदबा था दूसरी तरफ़ बिहार में - कोंग्रेस, भाजपा, बहुजन-समाज पार्टी (मायावती), समाजवादी पार्टी (मुलायम) और समता पार्टी (नीतीश-ज़ोर्ज) सब अलग-अलग चुनाव लड़ रही थी. स्वभाविक था कि - ‘जनता-दल’ के विपक्ष में जितने वोटे थे वो विभिन्न पार्टियों में बंट गयी और इसका पूर लाभ ‘जनता-दल’ को मिला.  


[गुरु ज्ञान :- निसंदेह, इस हार के बाद हारी हुई पार्टियाँ, एक दूसरे से मेल-मिलाप के प्रयास का       
            विचार करना शुरू कर दिया होगा]    {समता पार्टी+BJP}
Ø  चारा-घोटाला  (सन 1996) और राबड़ी देवी CM :- 

      1995 की ज़बरदस्त हार के बाद, नीतीश कुमार पूरी तरह निराश और चिंता के सागर में डूब गए थे मगर वो कहते हैं न - “ वक़्त बदलने में वक़्त नही लगता” . ठीक एक वर्ष बाद (1996 में) - बिहार के पशुपालन विभाग में वर्षों से चल रही एक बहुत बड़ी लूट का मामला सामने आया, जो - “चारा-घोटाले” के नाम से पुरे देश में जाना गया . BJP के “सरयू-राय” और समता पार्टी के “शिवानंद-तिवारी” ने ‘लोकहित’ में यह मामला पटना High कोर्ट में  दायर किया. लालू- प्रसाद पर CBI की जाँच बैठी और उन्हें CM पद से स्तीफ़ा देना पड़ा. “समता-पार्टी और BJP” जैसे विभिन्न दलों में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी परंतु इस ख़ुशी को लालू ने थोड़ा ब्रेक लगाया और जेल जाने से पहले अपनी पत्नी “राबड़ी-देवी” को बिहार का CM बना दिया . राजनैतिक गलियारों में इस फ़ैसले को लेकर ‘हहाकार’ मच गया. कोई इसे लालू का मास्टर-स्ट्रोक कह रहा था तो कोई इसे लालू की घटिया राजनीति . सच जो भी हो, पर 6 साल (1990-1996) तक CM रहने के बाद लालू अब बिहार के “CM-पति” बन चुके थे.       

[गुरु ज्ञान :- सन 2005 में जब-तक नीतीश को बिहार की कुर्सी नही मिली तब तक “राबड़ी-देवी” ही बिहार की मुख्य-मंत्री बनी रही और मेरा आँकलन यह है कि - “बिहार में जंगलराज, लूट, अपहरण जैसी अधिक घटनाए लालू के CM पद से स्तीफ़ा देने के बाद ही हुई, जिसे आग-में घी डाल कर परोसा भी गया है ]

Ø थोड़ा दिल्ली देख लें :- (1996,1998 और 1999 का लोक-सभा चुनाव)  

  बिहार में, लालू का जेल जाना, राबड़ी का CM बनना और समता पार्टी का BJP से जुड़ जाना तो चल ही रहा था, उधर दिल्ली की राजनीति में भी उथल-पुथल मच रहा था. देश की राजधानी में स्यासत अस्थिर हो चुकी थी. देश में 5 साल के भीतर ही लगातार 3 लोकसभा चुनाव हो गए :- 
(1996 - 11th Loksabha)
(1998 – 12th Loksabha)
(1999 – 13th Loksabha)

1996 में भाजपा के अटल बिहारी वाजपाई का 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बन कर स्तीफ़ा देना आप सबको याद होगा. फिर कोंग्रेस की तरफ़ से देव-गौडा और गुज़राल देश के प्रधानमंत्री बने पर कोंग्रेस-सरकार नही चल सकी और 1998 में फिर से देश में लोकसभा चुनाव हुआ. 
      1998 के चुनाव में फिर से NDA की तरफ़ से “वाजपाई” देश के प्रधानमंत्री बने परंतु 1 साल होते ही तमिलनाडु की पार्टी AIADMK ने NDA से अपना समर्थन वापस ले लिया और केंद्र की ‘वाजपाई-सरकार’ गिर गई. राष्ट्रपति ने UPA की अध्यक्षा “सोनिया-गांधी” को सरकार बनाने का प्रस्ताव दिया पर सोनिया गांधी ने कहा :- “सरकार बनाने लायक़ हमारे पास बहुमत नही है”. अतः फिर 1999 में फिर लोकसभा चुनाव हुआ. 
      1999 में भाजपा ने ख़ुद 180 लोकसभा सीट प्राप्त किया और अन्य के समर्थन से केंद्र में सरकार बनाया. इस बार NDA के “अटल बिहारी वाजपाई” पुरे 5 साल के लिए देश के  
प्रधानमंत्री पद पर बने रहे . फिर 2004 से 2014 तक UPA के “मनमोहन सिंह” और 2014 से अब तक NDA के “नरेंद्र मोदी”................ 

Ø  वापस बिहार लौटते है  :- (समाजवाद + संप्रदायवाद) = राजनीति 

1996 में वाजपाई जी को 13 दिन के बाद PM पद से स्तीफ़ा देना पड़ा था अतः भाजपा केंद्र में बहुमत जुटाने के लिए किसी भी राज्य में किसी भी दल के साथ गठ-बंधन करने का मन बना चुकी थी. इधर 1995 की हार से नीतीश, ज़ोर्ज और उनका दल निराश और हताश चल रहा था . लालू को सत्ता से बाहर निकलने की कोई तरकीब नही समझ आ रही थी. ऐसे में जनता दल का साथ डूबते को तिनके का सहारा जैसा था. जय-प्रकाश और लोहिया के विचारो वाली ‘जनता-दल’ से टूट कर अलग हुई ‘समता-पार्टी’ ने भाजपा के साथ को स्वीकार लिया.  

[गुरु ज्ञान :- इसकी विस्तृत चर्चा किताब में है जहाँ नीतीश और अरुण-जेटली के बीच के संबंध को भी आप समझ सकेंगे और संजय झा की मध्य्स्त्तता का भी इल्म होगा]

1998 लोकसभा चुनाव (बिहार चेप्टर) :- 

1996 के बाद 1998 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 54 सीट (बिहार40+झारखंड15) पर लालू के विरोधी (समता पार्टी) को 54 में से 29लोकसभा सीट पर जीत मिली. 
       जीत का कारण :- 
ü  लालू पर चारा घोटाले का आरोप (नकारात्मक छवि)
ü  समता पार्टी (ज़ोर्ज-नीतीश) + भाजपा के एक साथ हो कर चुनाव लड़ना . 
ü  भाजपा की देश भर में हिंदुत्व और राम-मंदिर की लहर का असर . 

1999 लोकसभा चुनाव (बिहार चेप्टर) :- 

 1998 के बाद 1999 के लोकसभा चुनाव में भी बिहार की 54 सीट पर चुनाव हुए. इस चुनाव में लालू प्रसाद बुरी तरह पस्त हो गए और नीतीश कुमार ने बिहार में अपना परचम लहर दिया. इस चुनावी गणित को यहाँ समझें :-   

      नीतीश के इस जीत के कारण :-

इस जीत का एक बड़ा कारण यह था कि - राबड़ी के CM बन्ने के बाद जनता-दल में सब कुछ पहले जैसा नही रहा. “शरद-यादव” जनता दल के अध्यक्ष बनने की कोशिश कर रहे थे, ऐसी स्थिति में लालू प्रसाद ने 1997 में 21 MP और 137 MLA को ‘जनता-दल’ से अलग करके अपनी पार्टी बना लिया, नाम :- “राष्ट्रीय-जनता-दल’ (RJD). जो आज-कल उनके सुपुत्र “तेजस्वी यादव” के नेतृत्व में बिहार में विपक्ष की भूमिका निभा रहा है. 

लालू से अलग होकर शरद- यादव ने अपनी नयी पार्टी “जनता-दल-युनाइटेड”(JDU) बना लिया. नीतीश कुमार ने “समता-पार्टी” को (JDU) से जोड़ लिया और भाजपा के साथ मिल कर बिहार में और अधिक मज़बूत हो गए. इधर भाजपा की राम-मंदिर और हिंदुत्व का अजेंडा देश भर में सर चढ़ कर बोल रहा था और कोंग्रेस की सरकार भी टूट-टूट कर चल रही थी.  
अतः 1999 में केंद्र में NDA की सरकार 5 साल के लिए सत्ता में आ गयी. वाजपाई जी देश के प्रधान-मंत्री बने और बिहार के 54 सीट में से (JDU+ भाजपा) को 42 सीट पर ज़बरदस्त जीत मिली.  
( गुरु ज्ञान :- नीतीश बाबू रेल मंत्री बने थे, याद है ना -- )

Ø  सन 2000 विधान-सभा चुनाव & बिहार विभाजन :- 

      1995 के बाद सन 2000 में बिहार विधान-सभा चुनाव होने वाल था. नीतीश कुमार 1999 के लोकसभा की जीत से झूम रहे थे और उन्हें लग रहा था कि - “इस बार बिहार की कुर्सी उनके कदमों में है”. दिल्ली में भी उनके गठ-बंधन की सरकर चल रही थी. मगर कुर्सी अभी कदमों से दूर थी. 2000 का बिहार विधान-सभा चुनाव बड़ा ही मज़ेदार और बिहार विभाजन के दृष्टिकोण से ऐतिहासिक भी था.  

2000 का चुनाव कई मायने में मज़ेदार रहा :-

      सन 2000 के बिहार विधान-सभा चुनाव में लालू-प्रसाद अपनी नई पार्टी RJD के साथ चुनावी मैदान में थे. इस बार उनके साथ शरद यादव भी नही थे और राबड़ी देवी के CM रहते बिहार में “जंगल-राज” का आरोप भी लग रहा था . अतः लालू और उनकी ‘RJD’ कमज़ोर नज़र आ रही थी. मगर, कभी कभी इंसान का कमज़ोर होना भी उसके लिए लाभदायक हो जाता है. विपक्षी पार्टियाँ को लगने लगा कि - इस बार लालू सत्ता से बाहर होने वाले हैं, अतः जो जितने ज़्यादा सीट से चुनाव लड़ कर विधान-सभा आएगा, CM उम्मीदवार उसी दल का होगा. अतः विपक्ष खेमे में सीट-बँटवारे को लेकर तनाव का माहौल बन गया . ज़ोर्ज फ़र्नांडिस की ‘समता-पार्टी’ ने ‘JDU (शरद+नीतीश)” से नाता तोड़ कर 120 सीटों पर चुनाव लड़ी. इसके अतरिक्त बिहार के “बाहुबली-नेता” आनंद-मोहन की अगुआई में बनी पार्टी बिहार-पीपल्स-पार्टी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा. ‘JDU+BJP’ ने क्रमशः 87 और 168 सीट पर चुनाव लड़ा. 

[गुरु ज्ञान :- झारखंड वाले बिहार में भाजपा का दबदबा था इसलिए BJP ज़्यादा सीट से चुनाव लड़ी और JDU कम सीट से ]

  इस तरह लालू के विपक्ष में 3 पार्टी खड़ी हो गयी जिससे वोट का बँटना स्वभाविक था. नतीजा. यह बिहार का पहल ऐसा चुनाव था जिसमें निर्दलीय विधायक बड़ी संख्या में जीत कर विधान-सभा पहुँचे थे और इन विधायकों में ज़्यादा संख्या “बाहुबली और गुंडो” की थी जो जेल में रह-कर चुनाव जीत गए थे. अंततः, नतीजा यह निकला कि - लालू की RJD को 124 सीट और NDA में शामिल पार्टी को 122 सीट मिले. बड़ी संख्या RJD के पास थी. मगर केंद्र में भाजपा सरकार थी (वाजपई PM) जिसका फ़ायदा उठा कर गवर्नर के आदेश से नीतीश कुमार ने CM पद की शपथ ले लिया. 
(गवर्नर के इस फ़ैसले का लोकतंत्र में आज भी आलोचना किया जाता है. )

अब शुरू हुआ खेल :- 

नीतीश कुमार की अतृप्त आत्मा ने CM पद की शपथ तो ले लिया मगर उसके लिए बहुमत साबित करना लोहे के चने-चबाना जैसे लग रहा था. नीतीश और भाजपा ने बहुमत साबित करने के लिए गुंडे-बाहुबली- मवालियों सभी प्रकार के निर्दलीय विधायकों की ख़रीद-बिक्री के हर प्रकरण से गुजरे मगर लालू-प्रसाद ने ऐसा जाल-बिछा रखा था के सारे के सारे  प्रयासों पर पानी फिर गया और बदनामी हुई वो अलग. उन्हें केंद्र के भाजपा सरकार का जुगाड़ भी काम नही आया. अंत में नीतीश कुमार ने 10 दिन के बाद CM पद से स्तीफ़ा दे दिया और लालू यादव ने कोंग्रेस के साथ मिलकर बिहार में RJD की सरकार बना लिया. एक बार फिर से CM बनी - “राबड़ी-देवी”. राबड़ी देवी 2000 से 2005 तक बिहार की C.M रही.

[गुरु ज्ञान :- एक महत्वपूर्ण बात यह समझना ज़रूरी है कि - RJD को सरकर बनने के लिए कोंग्रेस ने अपने विधायकों का सहयोग तो कर दिया मगर बिहार के बँटवारे के शर्त पर. लालू को बिहार की कुर्सी चाहिए थी तो बँटवारे के लिए “हाँ” बोलना पड़ा. इस तरह 2000 में बिहार को पुनः राबड़ी देवी के रूप में CM मिला और देश को मिला एक नया राज्य - “झारखंड” ]

Ø  बिहार का बँटवारा (अभिशाप या अमृत )

  झारखंड के निर्माण से जहाँ एक तरफ़ धनबाद, झारिया का कोयला तो दूसरी तरफ़ टाटा और बोकारो स्टील उद्योग अब बिहार से जा चुके थे. ऐसा लग रहा था, बिहार को फिर से ‘शून्य’ से शुरुआत करना होगा. राबड़ी देवी CM थी और राज्य के हालत बिलकुल ठीक नही चल रहे थे. “बिहार का बँटवारा” बिहार-वासीयों के लिए एक बुरे ख़्वाब जैसा था. इस बुरे ख़्वाब में भी किसी को एक आस- एक उम्मीद दिख रही थी. बिहार में एक “व्यक्ति” था, जिसके लिए “बिहार का बँटवारा”, ‘डूबते को तिनके का सहारा’ जैसा लग रहा था. उस व्यक्ति का नाम था - “अकेला आदमी (नीतीश कुमार).

      बिहार के बँटवारे ने JDU और नीतीश कुमार का क़द अचानक ही बहुत ऊँचा कर दिया. इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि - (JDU+ BJP) गठ-बंधन में BJP की ज़्यादा पकड़ झारखंड राज्य में थी और बिहार वाले हिस्से में नीतीश कुमार, शरद यादव जैसे JDU के नेता की पकड़ और पहुँच थी. झारखंड के अलग होने जाने से JDU का दबदबा भाजपा की तुलना में अधिक         

Ø  2005 का बिहार विधान-सभा चुनाव :-

सबसे पहले तो यह जान ले कि - बिहार में 2005 में दो बार विधान-सभा चुनाव हुआ .

पहला चुनाव - FEB 2005
 दूसरा चुनाव -  OCT 2005

पहला चुनाव - FEB 2005 :- 

      सन 2000 के बाद 2005 में बिहार विधान-सभा चुनाव हुआ . इस बार का बिहार झारखंड से अलग हो चुका था अब यहाँ विधान-सभा की 324 नही बल्कि 243 सीट थी.  NDA की बात करें तो इन सीटों पर BJP की तुलना में JDU का अधिक वर्चस्व था. 138 सीट पर JDU और 103 सीट पर BJP ने चुनाव लड़ा. JDU को 55 सीट पर जीत मिली. BJP को मिले - 37 सीट (55+37= 92). लालू की पार्टी RJD ने 210 सीट से चुनाव लड़ा और 75 सीट जीत सके. कोंग्रेस को इस बार 10 सीट प्राप्त हुए. 

बड़े दल के सीटों को जोड़ कर देखे तो :- 

  JDU(55) + BJP  (37) = 92
  RJD(75) + Cong(10) = 85

सरकार बनाने के लिए ज़रूरत थी :- 122 सीटों की. 

ऐसी स्थिति में बिहार की राजनीति में एक नया नाम उभर कर आया:- “राम-विलास पासवान
पार्टी का नाम :- लोक-जन-शक्ति पार्टी (LJP)  - सीट प्राप्त - 29


ऐसा लग रहा था - राम-विलास के पास यह 29 सीट नही बल्कि बिहार में सरकार बनाने की चाभी आ गयी हो. दोनो बड़े दलों ने इस 29 सीट के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया. किताब तो कहती है कि - नीतीश कुमार ने ऐसी कोशिश नही किया और दुबारा चुनाव करवाने के पक्ष में थे, पर बिहार की राजनैतिक गलियों से कूच और ही खबर आती है. राम-विलास के कई MLA टूटने लगे और राज्य का राजनैतिक माहौल भी बिगड़ने लगा. अंततः नतीजा यह हुआ कि -  राम-विलास ने यह चाभी किसी को नही दिया और न ही ख़ुद मुख्यमंत्री बने. बहुत दिनो के राजनैतिक उठा-पटक के बाद बिहार के राज्यपाल को पुनः चुनाव की घोषण करनी पड़ी .     



दूसरा चुनाव - OCT 2005 :- 

यही वह चुनाव है जिसमें इस पुस्तक के “नायक” – “नीतीश कुमार” को बिहार की कुर्सी मिली जो इस लेख लिखने तक लगभग पिछले 15 साल से नीतीश कुमार के हाथ में . दुबारा हुए चुनाव में :- 
                  सरकार बनाने के लिए ज़रूरत थी :- 122 सीटों की.

      JDU – (88) + BJP (55)   = 143
      RJD – (54) + cong (09)  =  63

राम-विलास की पार्टी - LJP को मिले -  10 सीट . 

तो इस तरह नीतीश कुमार BJP के साथ मिल कर बिहार की कुर्सी पर आ गए. अब याद करते है - नीतीश कुमार का वो वादा जो उन्होंने छात्र जीवन में टेबल पर हाथ पटकते हुए किया था :- 
“छल से या बल से जैसे भी हो, सत्ता हासिल करूँगा
      मगर,
       “सत्ता हासिल करके विकास का कार्य करूँगा” .

  नीतीश ने अपना वादे का पहला पंक्ति तो सच में पूर कर दिया . पिछले 15 साल में नीतीश अपने दूसरे पंक्ति को पूर करने में कितना सफल हो सके ये बात किताब में ज़रूर लिखी है - मगर नीतीश जी पर लिखी हुई किताब है तो - सब कूच अच्छा ही लिखा होगा. अतः नीतीश के वादे की सफलता को देखना है तो :- 

                  क्यों है, अगले लेख के इंतेज़ार में,
 एक बार तो आइए, बिहार में......

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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें

 धन्यवाद ।
Mohammad Ali 
Assistant Professor 
Patliputra University, Patna. 


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