गोपालगंज से राय-सीना - (लालू प्रसाद की जीवनी) - पुस्तक समीक्षा




पुस्तक समीक्षा :-  
   गोपालगंज से राय-सीना
                                                         (लालू प्रसाद की जीवनी) 
                                                                    लेखक :- नलिन वर्मा 


कृपया ध्यान दें :- इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मैं अपनी भावनाएँ, अनुभव और समझ आप लोगों तक अपने शब्दों में पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूँ.  आशा करता हूँ,  मेरे शब्दों और लेखन का रोमांच आपको पुस्तक तक खींच कर ले जाएगा । 
                      - मोहम्मद अली
(विशेष बात :- केवल लाल रंग से लिखे शब्द हु-बहु किताब से उतारे गए हैं)
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Ø भूमिका :-

     यदि आप ग़रीबों, मज़दूरों, शोषितों और वंचितो के प्रति अपने दिल में करुणा का भाव रखते हैं, यदि सच में आपके भीतर संवेदनशीलता है, और आप समाज में विद्मान शोषण को महसूस कर के विचलित हो उठते हैं तो निसंदेह इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप वैसे ही रोएँगे जैसे मैं- फूट-फूट कर रोया हूँ ॰
  
     ग़रीबी, मजबूरी, कठिनाईयाँ, सँघर्ष और लगातार सँघर्ष, इस किताब का एक महत्वपूर्ण “किरदार” है जिसे देखने के लिए आपको ज़मीनी स्तर पर उतरना होगा ।  

यह कहनी है - एक ऐसे व्यक्ति की जिसे अपने जन्म-दिन की तारीख़ बतलाने के लिए अपने "स्कूल के रजिस्टर" देखने की ज़रूरत पड़ती है । एक ऐसा व्यक्ति जो - ‘अभावों में ख़ुशियाँ ढूँढने की कला जानता है’ । एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने मूल्यों से समझौता न करते हुए अपने लिए सलाखें चुनना ज़्यादा पसंद किया । वो कहते हैं न - “स्वर्ग का ग़ुलाम बनने से बेहतर, नर्क का राजा बनना है । 



मेरा तर्क :-

     जब नीतीश कुमार ने जुलाई 2017 में महागठबंधन से मुँह मोड़ कर भाजपा के साथ सरकार बनाई, उस वक़्त लालू जी यदि अपने नीतियों से समझौता कर अपने 80 MLA और BJP के 54 MLA के साथ बिहार विधान सभा में बहुमत साबित कर देते तो आज लालू जी जेल से बाहर भी होते, तेजस्वी बिहार के  मुख्यमंत्री भी होते और सम्भवतः नीतीश जी लालू जी की जगह होते । फिर 2019 के बिहार लोकसभा के 40 सीट के नतीजे भी कुछ और ही होते । 


ख़ुद को “जेल” में और अपने बेटे ‘तेजस्वी’ को “मुख्यमंत्री के कुर्सी से दूर” विपक्ष का नेता बनाने वाले इस शख़्स में आप लाख कमियाँ निकाल सकते हो पर इनके मूल्यों और आदर्शों को सलाम करना बनता है ।      

Ø आदर्श :-

   लोहिया और जय-प्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को अपना आदर्श मानने वाले इस व्यक्ति ने समाज नामक किताब के उन पन्नो को पलटकर हर वो चित्र हमारे सामने रखा है जिससे देख कर आपके  और हमारे ‘रोंगटें’ खड़े हो जाएँगे । काँलेज के दिनों से महिला- सुरक्षा की बात करने वाले “लालू” लड़कियों के बीच “लालू-महात्मा” के नाम से प्रसिद्ध थे । 
     
     छात्र नेता के रूप में अपनी राजनैतिक- सफ़र की शुरुआत करने वाले ‘लालू’ शुरू से ही निडर प्रवृति के थे और अपने विरोधियों को करारा जवाब देते थे । मुख्य-धारा की राजनीति से जुड़ने के बाद भी उन्होंने अपने निडरता से फ़ैसले लेने की आदत को बनाए रखा । 1990 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘वी-पी-सिंह’ की बात को किनारे रख कर अडवाणी जी की रथ यात्रा को समस्तीपूर में रोकना उनकी निडरता का सबूत है । इस प्रकरण से पूर्ण उनके द्वारा कहे गए शब्द यहाँ लिख रहा हूँ :-    

“जब इंसान ही नही रहेगा तो मंदिर में घंटी कौन बजाएगा,
जब इंसान ही नही रहेगा तो मस्जिद में इबादत कौन करेगा,
आम आदमी की जान उतनी ही क़ीमती है जितना PM की ,
चाहे मेरा राज रहे या चला जाए,
मैं दंगा फैलाने वालों से समझौता नही करूँगा॰” - (लालू जी)

दूरदर्शी लालू जी ने अडवाणी से भरे सदन में कहा था :- “अडवाणी जी, आपने मस्जिद गिरा दी; आप कभी प्रधानमंत्री नही बन सकेंगे”. आज वो मोदी जी के लिए कहते हैं कि - “आप अपने झूठ, नाकामी और लोगों के ध्वस्त हो चुके उम्मीद के ढ़ेर पर बैठे हैं, यही जनता आपको इसी ढ़ेर के नीचे कुचल देगी” । 

1975 के अपातकाल के बाद जब जनता दल की सरकर केंद्र में आयी थी तब जन-संघ के नेता भी इसी जनता दल में शामिल थे॰ ऐसे जन-संघ के नेता समाजवादी सरकार का हिस्सा भी थे और साथ ही साथ समाजवाद के ख़िलाफ़ विचारधारा को भी ले कर चलते थे, ऐसे में लालू प्रसाद यादव ने खुल कर ऐसे नेताओ का विरोध किया और उनकी दोहरी सदस्यता पर ख़ूब बरसे ।  
   
Ø मंडल आयोग :- 

 मुरार जी की सरकर ने 1979 में मंडल आयोग का गठन किया था, इस आयोग ने क़ानूनी तरीक़े से 1983 में अपनी रिपोर्ट पेश किया था जो अलमारी में क़ैद थी । लालू जी ने मंडल आयोग की इस सिफ़ारिश को जिस सामाजिक और राजनैतिक सुझ-बुझ के साथ न केवल आज़ाद करवाया बल्कि धरातल पर उसे लागु करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया । बिहार में सामंती ताक़तें और सामंती मीडिया की जड़ें कितनी मज़बूत है, लालू जी को इसका पता मंडल-आयोग की सिफ़ारिश लागू करने के दौरान अच्छे से हुआ । 

तथा-कथित ऊँची जतियों का लगातार हमला और लगातार मीडिया द्वारा लालू की छवि को धूमिल करने का प्रयास करना । सामंती ताकतें इस ‘मंडल-आयोग’ से नारज़ थी और उन्होंने अपना ग़ुस्सा ग़रीब जनता से लेकर इसे लागू करने वाले तक पर अलग-अलग तरह से निकाल रहे थे । इन तमाम विषम-परिस्थितियों में लालू ग़रीबों और वंचितो के पक्ष में चट्टान की तरह खड़े थे । 

Ø CM लालू :-

 लालू प्रसाद से पूर्व बिहार की सत्ता हमेशा से तथाकथित उच्य जातियों के हाथ में रही (‘कर्पुरी’ जी और ‘छोटे कार्यकाल’ के अपवाद को छोड़ कर) । सामंती ताक़तों के वर्चस्व से लबा-लब भरे बिहार की सत्ता पर एक पिछड़े जाति के  मुख्यमंत्री का स्थापित होना कितना कठिनाइयों से भरा था इसे पुस्तक पढ़ कर या उस 90 के दशक के किसी व्यक्ति से ही पूछाजा सकता है । दिल्ली की सत्ता की सिफ़ारिश, राज्य-पाल के आगे-पीछे दौड़ना और फिर ‘राम सुंदर दास’ और ‘रघुनाथ झा’ जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ना लोहे के चने चबाने जैसा था । 

     बिहार को 25वें मुख्यमंत्री के रूप में एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसने पहली बार राज-भवन के प्रांगण से बाहर निकल कर पटना के गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण की प्रतिमा से आशीर्वाद लेते हुए जनता के बीच शपथ लिया । 

     CM होते हुए वेटनरी college के चपरासी वाले कमरे में रहना, गंदी बस्ती में जा कर ग़रीबों, दलितों और अल्पसंख्यक समूहों  के बीच रहना, उनके बच्चों को सरकारी टैंकर के पानी से नहलाना, उन्हें साबुन लगाना और उन्हें यह बतलाना कि - 

“वोट का राज मतलब - छोट का राज”
आप सब ही असली मालिक हो ।

Ø     खेतिहर मज़दूर की पारिश्रमिक बढ़ाना । चरवाहा स्कूल खुलवाना ।  दलित एवं अति-पिछड़े इलाक़े में ख़ुद जगह चिन्हित कर अलग से विद्यालय की स्थापना कराना ताकी वंचित तबक़ा भी शिक्षा से जुड़ सके । "पासी समुदाय" के लिए पेड़ से ताड़ी की निकासी और उसके बिक्री पर TAX हटा देना । 

  लीक से हट कर चलने वाले इस CM के ऐसे तमाम फ़ैसले आप देख सकतें हैं जिससे सीधा-सीधा फ़ायदा जनता को और वो भी जरूरतमंद जनता को पहुँच रहा था । 

Ø शासन और प्रसाशन का खेल :- 

  मंडल आयोग की रिपोर्ट को ज़मीनी स्तर पर लागू करना हो या भागलपुर दंगे के वक़्त बिहार में क़ानून व्यवस्था बनाए रखना हो, हर परिस्थिति में लालू जी के फ़ैसले जनता के पक्ष में थे और उन्होंने जनता के दिल में पुलिस और प्रसाशन के प्रति डर को ख़त्म करने की कोशिश जारी रखा । ग़रीबों और वंचितो में पैदा हुई इस निर्भिकता ने सामंती ताक़तों की नींद उड़ा दी और कई प्रशासनिक अधिकारी भी इससे परेशान होने लगे । राज्य में क़ानून व्यवस्था बनाए रखने और जनता के अधिकर के लिए उन्होंने कई अधिकारियों के कार्य में दख़ल देना शुरू किया और जनता को प्रोत्साहित करने लगे कि वो जनता के सेवक - “पुलिस” से नही डरे । सामंती विचारधारा के ऐसे अधिकारी और वर्षों से ग़रीबों का शोषण करते आ रहे तमाम लोगों को यह बात रास नही आयी और फिर शुरू हुआ आरोप-प्रत्यारोप का खेल ।  

     जगन्नाथ-मिश्रा के CM- काल में शुरू हुए चारा-घोटाले के दस्तावेज़ इकट्ठा किए गए , और उस लपेटे में वर्तमान CM (लालू जी) को लाने की साज़िश रची  गई । BJP-RSS, तथाकथित उच्य वर्ग, मीडिया और तमाम सामंती ताक़तें एक सूत्र में लामबंद हो गयी । मीडिया ने आग में घी की भूमिका निभाई और लालू को बदनाम करने के लिए हर-रोज़ नए नए हथकंडे अपनाए गए । इस साज़िश को लेकर पुस्तक में एक विख्यात पत्रकार और लेखक - “A.J Flip” की चिट्ठी की विस्तृत चर्चा है । लालू जी को दोषी या निर्दोष मानने से पूर्व सभी पाठकों को ये चिट्ठी ज़रूर पढ़ना चाहिए । 




Ø साथियों का बिछड़ना - RJD का बनना । 
                      (Every exit is a new Entry)

1995 में जार्ज-फ़र्नांडिस और नीतीश कुमार  ने लालू और जनता दल से अलग हो कर “समता-पार्टी” का गठन कर लिया । 1995 के विधान-सभा चुनाव में जनता ने उन्हें पटक दिया और दुबारा उठने के लिए समाजवादी सोंच रखने के बावजूद अपने मूल्यों से समझौता करके  उन्होंने BJP का सहयोग ले लिया । फिर 1997 में जनता दल के अध्यक्ष बनने की महत्वकांक्षा या ज़िद के चलते “शरद-यादव” ने भी  ख़ुद को लालू से अलग कर लिया और शरद यादव के अलग होते ही लालू जी ने 1997 में 21 M॰P और 137 M॰L॰A के साथ अपनी नयी पार्टी - “राष्ट्रीय जनता दल” (RJD) का गठन कर लिया । “शरद-यादव” की अध्यक्षता में जनता दल युनाईटेड (JDU) बना जिसमें जाँर्ज फ़र्नांडिस और नीतीश की समता पार्टी विलय हो गयी और ये सभी BJP से मिल कर लालू भगाओ मिशन पर लग गए ।  

(ताज़ा Update :- ये अलग बात है कि - आज नितीश कुमार  ने अपने क़द का फ़ायदा उठा कर JDU का बीज बोने वाले शरद यादव को पार्टी से निकाल दिया और 2019 के लोकसभा में शरद यादव को RJD ने ही मधेपुरा लोकसभा से टिकट दिया॰)

Ø राबड़ी CM और रेल की यात्रा :- 

इसके अतरिक्त पुस्तक में राबड़ी देवी के CM बनने की पुरी कहनी का विवरण, रेल-मंत्री के रूप में लालू जी के अतुलनीय कार्य की चर्चा जिसे विदेशों तक में सराहा गया । कैसे भैंस की सवारी करने वाला “ललुआ” जवानी मे “महात्मा लालू” और बुढ़ापा होते- होते अपने कर्मों से “प्रोफ़ेसर लालू” बन गया । डूबते रेल को प्रगति पर लाने की सफ़लतापूर्वक प्रयास को कभी Harvard तो कभी Wharton University के छात्र सुनने को उत्सुक थे । आप लालू के Innovative Ideas और प्रसाशनिक कौशल को इस किताब में आँकड़ो के साथ समझ सकते हैं।  
     
Ø नीतीश चैप्टर :- 

   पुस्तक की सबसे मज़ेदार कड़ी है - लालू जी के मुख से नितीश कुमार की चर्चा । लालू के शब्दों में उस "नीतीश कुमार" की चर्चा जिसके “पेट में दाँत है” ॰ 

नितीश कुमार का बिहार की सत्ता में आना, नितीश जी का PM बनने की ख़ुशफ़हमी में लग जाना । बिहार में RSS की शाखा को भीतर-भीतर मद्द करना और BJP का ख़ास बनने की कोशिश करना, पहले नरेंद्र मोदी जी की बड़ाई करना, फिर नरेंद्र मोदी जी को भोज में आमंत्रित करके उनके सामने से पत्तल (प्लेट) खींच लेना । नीतीश कुमार का अडवाणी गुट से मेल-मिलाप करना और ख़ुद को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश करना । बाद में विफल होने पर BJP से रिश्ता तोड़ते हुए यह कहना :- 

“मिट्टी में मिल जाएँगे-BJP में नही जाएँगे”

लालू के शब्दों में - पलटू-राम का फिर से पलट कर BJP में जाना, बिहार की जनता के साथ धोखा करना सब कुछ इतना मज़ेदार है कि- पढ़ कर आपकी ‘समझ’ बढ़ेगी और हँसते हुए आपकी ‘उम्र’ भी बढ़ेगी । 

Ø तेजस्वी चैप्टर :- 
     
     तेजस्वी को बिहार का उभरता हुआ सितारा और परिपक्व नेता बतलाते हुए लालू जी ने अपने और तेजस्वी के पुराने अनुभव साझा किए है । लालू जी तेजस्वी को किस तरह देखते हैं और उन्हें तेजस्वी के भीतर वो कौन सा कौशल दिखता है जो बिहार को साम्प्रदायिक ताक़तों से बचा सकता है इसका जवाब आपको पुस्तक पढ़ कर ज़रूर मिलेगा । फ़िल-वक़्त, उप-मुख्यमंत्री के काल-क्रम में और ‘नेता-प्रतिपक्ष’ के रूप में तेजस्वी के कार्य की सराहना की जा रही है । तेजस्वी को लेकर लालू जी के “शब्दों” की असली जाँच तो भविष्य के गर्भ में हैं । 




पुस्तक से अपेक्षा :-
     
     पुस्तक समाप्ति के बाद पाठक के रूप में मेरी कुछ अपेक्षाएँ भी रह गयी जिसे मैं आपके साथ बिंदुवार साझा कर रहा हूँ :- 


ü तेज़-प्रताप की कमी महसूस हुई । 

ü मीसा जी के राजनीतिक सफ़र पर चर्चा होनी चाहिए । 

ü राबड़ी देवी के मुश्किल वक़्त में उनके साथ खड़े रहने वाले पुरी टीम ने कैसे राबड़ी देवी के नेतृत्व को संभाला और उसे सहर्ष स्वीकार किया ?

ü 2005 से 2015 तक लालू जी जब ‘बिहार की सत्ता’ से दूर थे तब RJD कैसे कार्य कर रही थी और लालू जी ने उस 10 वर्ष तक अपनी टीम को पुरे बिहार मैं कैसे बाँध कर रखा था ?

ü लालू जी के काल में अपहरण और लूट की बढ़ती वारदात का ज़िम्मेदार कौन था ? 

ü लालू जी जिन मामलों में जेल में हैं उसको लेकर ज़मीनी हक़ीक़त की  थोड़ी विस्तृत चर्चा होनी चाहिए । 

ü बिहार में Feb 2005 का विधान-सभा चुनाव जिसमें किसी की सरकार नही बनने के कारण दुबारा Nov 2005 चुनाव हुए । उस बीच के वक़्त को थोड़ा विस्तार से चर्चा होना चाहिए साथ ही साथ इस चुनाव में “राम-विलास पासवान” की भूमिका पर थोड़ी विस्तृत चर्चा की अपेक्षा थी । 
     
उपर्युक्त सारी चर्चाएँ पुस्तक को और अधिक दिल-चस्प और उपयोगी बना सकती थी । आशा करता हूँ - पुस्तक के लेखक अगले संस्करण में इन मुद्दों को शामिल करेंगे ।  


मेरा आभार


235 पन्ने की किताब और लालू जी के 50 साल से अधिक के राजनैतिक सफ़र को 7 या 8 पन्ने में समेटना “गागर में सागर”समेटने जैसा प्रतीत होता है॰ पुस्तक पर लिखी गयी मेरी संक्षिप्त टिप्पणी के अतरिक्त और भी बहुत कुछ है जिसका अनुभव आप पुस्तक पढ़ कर ही कर सकते हैं । 

     इस पुस्तक के ज़रिए आप अपने नज़रों से बिहार को, बिहार की ग़रीबी को, यहाँ की आर्थिक बदहाली को, संघर्ष करते मध्यम-वर्ग को, सामजिक ताने-बाने को और राजनैतिक उथल-पुथल को महसूस कर सकते हैं । 

मैंने किताब की रोचकता को बनाए रखते हुए बस एक झलकी आपके सामने प्रस्तुत किया है । आशा है, आपको मेरी यह समीक्षा पसंद आयी होगी । 

आग्रह/ निवेदन

मेरा प्रयास और ये समीक्षा यदि आपको अच्छा लगा हो तो कृपया इसे अन्य साथियों तक साझा करें और मुझे अपना Comment और Feedback ज़रूर Email करें  ।
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टंकण सम्बंधी दोष के लिए क्षमा करें 

ये समीक्षा मेरे अपने विचार और मेरी अपनी समझ हैं ।  
                                                                                                                               आपका साथी 
                                           Dr. Mohammad Ali
      Assistant Professor
RLSY College  Bakhtiyarpur
 Patliputra University Patna
               

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