World Menstrual Hygiene Day 2021.
‘विरक्त’ से ‘रक्त’ तक का सफ़र - “पीरियडस”.
“World Menstrual Hygiene Day”
आज International Period day है. इस विषय पर कुछ लिख सकने की न तो मुझमें योग्यता है और न ही इस "स्थिति" को अनुभव करने का सौभाग्य. परंतु, मुझे लगता है - "पीरियडस" जैसे विषयों पर लिखने या बोलने के लिए ‘योग्यता’ के बजाए ‘संवेदनशीलता’ की ज़रूरत है.
जिस ‘पीरियडस की प्रक्रिया’ को ‘मनुष्य-सृजन’ के आधार के रूप में प्रकृति ने उपहार स्वरूप महिलाओं को पुरस्कृत किया है, उसे ‘टैबु’ और "ओछे" नज़र से देखना और उसके सार्वजनिक-चर्चा पर प्रतिबंध लगाने वाले समाज को अपनी असंवेदनशीलता पर शर्म आनी चाहिए. आम बोल-चाल में इसे “महिलाओं की समस्या’ या “महिलाओं का विषय” जैसा नाम दे कर ‘पुरुष-वार्तालाप’ एवं ‘सार्वजनिक-वार्तालाप’ से से दूर कर दिया जाता है. दरअसल, ऐसा करके हम महिलाओं एवं महिलाओं से जुड़े एक और विषय को अपने "ढोंगी-पितृसत्ता" के चादर से ढ़कने का प्रयास करते हैं.
महिलाओं की नज़र में "पीरियडस" से गहरा दोस्त कौन से सकता है जो 14 साल के अलहड़पन से 54 साल की गम्भीरता तक उनका साथ देता है. ‘माँ’ बनने की ‘सूचना’ देने वाला यह साथी हर महीने उनके पास आता है और अपने दर्द से उन्हें और अधिक मज़बूत करके वापस चला जाता है. हर महीने इसी पीड़ा और तकलीफ़ को अपने अंदर समेटने का अनुभव ही एक महिला को "प्रसव-पीड़ा" सहन करने की असीम शक्ति देता है.
महिलाओं को भीतर से मज़बूत बनाने वाले ऐसे ‘दोस्त’ के आगमन पर हमारा समाज उन्हें - “नापाक”(अपवित्र) घोषित कर देता है. धर्म से दूर, धर्म-स्थल से दूर, धर्मिक-किताब से दूर कर देता है. धर्म की मान्यताओं को अगर विश्वास (Faith) की सीमाओं से बांध कर एक तरफ़ रख भी दे तो, पीरयडस के वक़्त महिलाओं का रसोई-घर में प्रवेश से रोक और बर्तनों के स्पर्श को वर्जित करना आप किस तरह सही साबित करेंगे ? कभी उनके बिस्तर अलग कर देने और कभी उन्हें खुद से अलग कर देने का यह ‘चलन’(प्रथा) महिलाओं को उस कैलेंडर (वस्तुओं) से भी ज़्यादा निकृष्ट(बेकार) कर देता है जो कम से कम साल भर हमारे कमरे में लगातार विराजमान(मौजूद) रहता है.
"पीरियडस" के इन खूबसूरत दिनों में हम पुरुषों को उनके साथ होना चाहिए, उनके बदलते हुए व्यवहारों को लेकर उनसे बात करना चाहिए, हम उनके दर्द को तो नही अपना सकते पर उनके कार्यों और उनके पल-पल बदलते स्वभाव को स्वीकार करना चाहिए. उन्हें यह एहसास दिलाना रहना की - ये दर्द के पल नही बल्कि वो बेहतरीन पल है, जिस वक्त वो सबसे ख़ूबसूरत लग रही है, और हमें अपनी मुस्कुराहटों से उनके "चिड़चिड़ेपन" को "मासूमियत" में बदलने की कोशिश करनी चाहिए.
"पीरियडस" जैसे गम्भीर विषयों को “टैबु’ बना देने के कारण इससे लड़ने और जूझने का जो वर्तमान संघर्ष है, वो भारत के हर समाज और समुदाय में अलग-अलग है. कार्यालय में सिर्फ़ 2 दिन "Special Leave" के नाम पर ‘महिला-अवकाश’ मिल जाने से महिलाओं के प्रति न तो संवेदनशीलता प्रकट किया जा सकता है और न ही उनके साथ उचित न्याय. असंगठित क्षेत्रों में कार्य रही मज़दूर-महिलाओं, एवं वो तमाम महिला साथी जो पेट की आग बुझाने के लिए 'दर्द के इस एहसास' को लेकर घर से बाहर निकल जाती है. जब घर पर काम करने वाली दीदी फ़ोन पर कहती है कि - “आज बीमार हूँ, इसलिए नही आ सकी (पीरियडस की बात छिपाते हुए) तो हमारा यह जवाब - (“तुम्हारा यह नाटक रोज़- रोज़ नही चलेगा, कल से टाइम पर आ जाना वरना पैसे कट जाएँगे") हमारी महानता और इंसानीयत के मुखौटे को ठीक उसी तरह नोच देता है जिस तरह Corona-काल में सरकार की व्यवस्थाएँ ताश के पत्ते की तरह ढ़ह कर जनता के सामने बिखर गयी.
"चाँद पर ज़मीन ख़रीद लेने से, आप चाँद के लायक़ हो जाएँ यह ज़रूरी तो नही"
जाते-जाते प्रवीन शाकिर की इस पंक्ति को पढ़ते - जाएँ :-
मैं वो लड़की हूँ, जिसको पहली रात कोई घूँघट उठा कर यह कह दे -
“मेरा सब कुछ तेरा है, इस दिल के सिवा.......”।
परंतु हमें यह नही भूलना चाहिए कि - 'पीरियडस' के रक्त से यह ‘पितृसत्ता-रूपी चादर’ धीरे-धीरे “लाल” होता जाता रहा है और और बदलाव की इस ‘लालिमा’ का विस्तार पुरे समाज को बड़े गौर से महसूस करना चाहिए.
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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Patliputra University, Patna.
सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- (Janghat.blogspot.com)



सिर्फ असंगठित मजदूर महिला ही नहीं, बैंककर्मी और केंद्रीय महिला कर्मी भी अपने दर्द के साथ कार्य स्थल पर जाने को विवश हैं और कार्ययस्थल पर उनके प्रति न तो किसी भी तरह की संवेदनशीलता प्रकट की जाती है, न किसी प्रकार की रियायत दी जाती हैऔर न किसी तरह का आराम...
ReplyDeleteपढ़ने के लिए शुक्रिया ।
Deleteसहमत हूँ आपकी बात से ।
इसे ही शायद असंवेदनहीनता कहते है ।
Tumne dukhti rag per haath rakh diya.Humne bahut jhela hai.period ke time hume achut ki tarah behave kiya jaya tha.sharm se kisi ko bata bhi nahi pati thi.jaise lgta tha bahut bara gunah kiya ho.Tumne aurat ki pira ko samjha hai ,ye humare liye sukhad baat hai.
ReplyDeleteAbhi bhi jab office me hum sl ki baat karte hai to ye purush samaj hume ghurkar dekhne lagte hai
आपने बहुत अच्छा लिखा है शायद महिला सशक्तिकरण पर इतनी बातें करने वाले लोग भी आज तक इस विषय पर अपनी पुरानी रूढ़िवादी सोच से बाहर नहीं निकल पाये। आज भी वही समस्याएं हैं जो पहले थी बस उनका स्वरूप बदला है। एक पुरूष होकर आपने महिलाओं की परेशानी को समझा और उसे इतने स्वच्छ विचारों के साथ कागज पर उतारा है इस उम्मीद से की शायद अभी भी लोग अपनी विचारधारा में बदलाव लाये ।
ReplyDeleteबहुत -बहुत धन्यवाद आपका
महिलाओं के उत्थान के लिए जरूरी है कि महिलाओं का साथ हम लोग को हर परिस्थिति में देना चाहिए
ReplyDeleteअल्लाह सीबी को इतनी समझ दे की हर कोई एक दूसरे का दुख समझे
ReplyDeleteमैने जिंदगी से पूछा की तू सबको दुख क्यों देती है तो जिंदगी ने जवाब दिया में सबको खुशी देती हूं मगर इस दुनिया में हर एक की खुशी दूसरे का दुख है