“सुशांत की मौत का ज़िम्मेदार - राष्ट्रपति- ट्रम्प” ???
'शीर्षक' पढ़कर, बड़ा ही अजीब लगा न ?.
पूरा लेख पढ़िए, "नायाब लगेगा".
पिछले कुछ दिन से सुशांत की आत्महत्या को लेकर सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनेल तक “छीछा-लेदर” चल रहा है. यह एक तरह का खेल है, जो आप और हम खेल रहें हैं - अंग्रेज़ी में इस - “Blame Game” कहतें हैं.
कोई सुशांत को “कायर” कह रहा है तो कोई समाज को बुरा-भला कह रहा है”. कोई Nepotism (भाई-भतीजवाद) को इस मौत का ज़िम्मेदार बता रहा है तो कोई bollywood को बुरा भला कह रहा है. कोई करण-जौहर पर उनसे फ़िल्म छीन लेने का आरोप लगा रहा है. कुछ बरसाती कीड़े तो “खान-जोड़ी” (सलमान-शाहरुख़-आमिर) को इसका ज़िम्मेदारी बतलाते हुए इसे हिंदू-मुस्लिम नज़रिया दे रहा है.
यदि, इस “कुत्ता-घसीटी” को थोड़ा सा और घसीटा जाए तो वो दिन दूर नही जब, भक्त बोलेंगे - “सुशांत की मौत का ज़िम्मेदार राहुल-गांधी है” और चमचे बोलेंगे - “सुशांत की मौत का ज़िम्मेदार नरेंद्र-मोदी है”. तो क्या, ऐसे में अपनी देशभक्त का परिचय देते हुए यह कहना ग़लत है कि - “सुशांत की मौत का ज़िम्मेदार ट्रम्प है” ?
लगातार आती खबरें, मीडिया रिपोर्ट्स, ट्वीट्स और सुशांत के क़रीबियों की मानें तो - सुशांत पिछले कुछ महीने से अवसाद से घिरे थे. शेखर कपूर, जो, सुशांत को लेकर एक बड़े बजट की फ़िल्म बना रहे थे - “PAANI”. करण जौहर ने इस फ़िल्म से अपना पैसा वापस ले लिया और फ़िल्म अटक गयी. दूसरी तरफ़ सुशांत के कई प्राजेक्ट्स उनके हाथ से निकल गए. ऐसी स्थित में, किसी भी व्यक्ति का परेशान हो जाना या अवसाद में चले जाना स्वभाविक है. परंतु, मनुष्य की भीतरी इस्पात [ STEEL not IRON] का पता असफ़लता के दौर में चलता है. सफ़लता में तो सब-कुछ सुहाना और अपना दिखता है.
जो लोग Bollywood में व्याप्त Nepotism को सुशांत की मौत का कारण बतला रहें है, उनकी आवाज़ तब कहाँ दब गयी थी जब लालू-प्रसाद यादव RJD के बड़े से बड़े नेता को पीछे करके अपने 9वीं फ़ेल बेटा को बिहार का उप-मुखमंत्री बना दिया था. जब शिव-सेना में दिग्गज़ नेता के रहते हुए सारी ज़िम्मेदारी “उद्धव-ठाकरे” को दे दिया गया. जब एक से एक दलित नेता के रहते हुए “मौसम-वैज्ञानिक” अपने सपूत्र “चिराग़-पासवान” को या मुलायम अपने पुत्र “अखिलेश” को सत्ता सौंप देते हैं. जब अमित-शाह का पुत्र “जय-शाह” अड़ब-पति बनता चला जाता है और देश ग़रीब होता चला जाता है.
धीरू-भाई अम्बानी की कम्पनी में एक से एक जानकार लोग थे पर कम्पनी का संचालन मुकेश और अनिल के हाथ में चला गया. क्या फ़र्क़ पड़ता है अड़ानी का बेटा कित्तना भी बड़ा बिगड़ैल हो, मालिक तो उसे ही बनना है.
क्या इस देश में भाई-भतीजवाद ही है? जाति-वाद नही है ? संप्रदायवाद नही है? क्षेत्रियवाद नही है ? ग़रीबी-अमीरी का भेद-भाव नही है?
इस देश में ‘जाति और धर्म’ के नाम पर जितने ‘भेद-भाव’ होते हैं, अगर उनको आधार बना कर लोग ‘आत्म-हत्या” करने लगे तो हमारे देश की आबादी “नेपाल” से भी कम हो जाएगी.
आपको क्या लगता है - फ़िल्म इंडस्ट्री या कोई भी इंडस्ट्री में कोई किसे से बेपनाह मोहब्बत करता है ? जिस इंडस्ट्री का पर्दा इतना “नग्नता से भरा” हुआ है वहाँ पर्दे के पीछे कैसा “नंगा-नाच” होता होगा. जिस देश के न्याय-व्यवस्था में “भाई-भतीजवाद” शामिल हो वहाँ किस न्याय की उम्मीद करते हो आप?
धूम- फ़िल्म के एक दृश्य में John-Abraham अपने चोर साथी को कहता है-
“चेहरा तो मुझे तुम्हारा भी पसंद नही है, पर हम साथ रह कर चोरियाँ करते हैं, क्यूँकि हम एक दूसरे की चाहत नही ज़रूरत है”
क्या अमिताभ बच्चन ने बुरे दिन नही देखें है, जब उन्हें “मोहब्बतें” फ़िल्म माँगने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा था, जब उनकी कम्पनी बिक गयी थी और उन्होंने एक निर्देशक को कहा था कि - आप अपनी गाड़ी रात में मेरे घर पर पार्क कर दिया कीजिए ताकि लोगों के लगे मेरे पास भी गाड़ी है. क्या सलमान खान ने बुरे दिन नही देखे हैं, फ़्लॉप पर फ़्लॉप फ़िल्म देने वाला और थाने के चक्कर काटने वाल सलमान की ज़िंदगी वांटेड फ़िल्म (2008) से बदल गयी.
लोग तो कहते हैं कि - फ़िल्म जगत में टिके रहने के लिए गोरा-पन चाहिए मगर आज नवाज़उद्दिन जैसे सामान्य दिखने वाले कलाकार ने सलमान के साथ “बजरंगी-भाई-जान” और “किक”, शाहरुख़ के साथ “रईस” और आमिर के साथ “तलाश” जैसी फ़िल्में बना लिया. क्या नवाज़ किसी बड़े बाप के बेटे थे. आयुष्मान खुराना को ही देख ले जिन्होंने अमिताभ के साथ “गुलाबों-सिताबो” बना लिया. संजय मिश्रा एवं ज़िशान आयुब को भी दर्शक ख़ूब पसंद करते हैं. आपको बने रहने के लिए और टिके रहने के लिए लगातार संघर्ष करते रहना पड़ेगा.
आफ़ताब, डीनो मोरिया, अर्जुन रामपाल, लारा दत्ता, तनुश्री, जैसे कितने सितारे आए, कितने गए. इसके अतरिक्त फ़िल्म जगत से जुड़े हुए - तुषार कपूर, हरमन बवेज़ा, उदय चोपड़ा, आर्य-बब्बर, राहुल-खन्ना, फ़रदीन खान, जाएद खान, विवेक ओबराई और अध्यन सुमन यहाँ तक कि - अभिषेक बच्चन तक को जनता ने नकार दिया. ह्रितिक रोशन के पिता उतने बड़े स्टार नही थे जितने बड़े तुषार कपूर के पिता थे पर जनता ह्रितिक को आज भी स्वीकार करती है और तुषार अपने बहन के रह-मो-क्रम पर कभी कभी पर्दे पर दिख जाते हैं.
आपको क्या लगता है, राज-कुमार राव, पंकज त्रिपाठी, संजय मिश्रा या नवाज़उद्दीन जैसे कलाकार को निर्देशक और इंडस्ट्री प्यार करती है ?.
नही !!!
इन्होंने अपने “प्रतिभा” के बल पर अपना लोहा मनवा लिया है. इन्होंने अपने बुरे दिनों में, संघर्ष के दिनों में सब्र रखा, मुसीबतें उठाई, पर हिम्मत नही हारे. स्वर्गीय “इरफ़ान खान” को भी अपनी क़ाबिलियत दिखलाने के लिए वर्षों संघर्ष करना पड़ा था.
इक़बाल :-
खुदी को कर बुलंद इतना कि, हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा* क्या है ?
(रज़ा- चाहता)
मै यह नही कहता हूँ कि - ‘सुशांत सिंह राजपूत’ के साथ भेद-भाव नही हुआ होगा. मैं यह भी मानता हूँ कि - “प्रतिभा होते हुए भी उनसे फ़िल्म छीन लिया गया होगा” पर व्यवस्था से हार- जाना, टूट जाना और आत्म-हत्या करना विकल्प नही है. क्या महेंद्र सिंह धोनी को अपने संघर्ष के दिनों में “बिहारी” (गाली के रूप में) सुनने को नही मिला होगा ? क्या उन्होंने ज़बर्दस्त संघर्ष और हार का सामना नही किया होगा ?
"गिरते हैं शह-सवार ही जंग के मैदान में,
वो तिफ़ल* क्या गिरे जो घुटनों के बल चले
(तिफ़ल :- बहुत छोटा बच्चा )
इस मुल्क में भेद-भाव का पूरा मेन्यू है - काले होने पर, लड़की होने पर, मुस्लिम होने पर, दलित होने पर, ग़रीब होने पर, बिहारी होने पर, हिंदी बोलने पर.............. किस-किस से लड़ेंगे आप ?
दुःख होता है, जब एक उच्य जाति का बाप अपनी पुत्री का हाथ - “प्रतिभावान दलित” को नही दे कर “अयोग्य ब्राह्मण” को दे देता है. बहुत दुःख होता है, जब एक डिग्री-धारी पिता अपने पुत्री से कहता है - बेटी, तुम्हारी पसंद से ही तुम्हारा विवाह करूँगा, लड़का मुस्लिम नही होना चाहिए. क्या आपको उस वक़्त पीड़ा नही होती है जब - जाति, धर्म, रंग या लिंग के आधार पर आपको हाशिए पर छोड़ दिया जाता है ?
समाधान :-
प्रश्न उठता है, इसका समाधान क्या है ? इसका समाधान है . और इसका समाधान कहीं बाहर नही है. इसका समाधान आपके भीतर है. आपको और हमें यह समझना होगा कि -
Ø तमाम कमियों के साथ आप जैसे है वो सबसे सुंदर अवस्था है और हमारे अंदर और बेहतर होने की पूरी सम्भावना हमेशा बनी हुई है.
Ø हमें यह स्वीकार करना होगा कि - हमें सफ़लता या असफ़लता पर ध्यान न देते हुए, अपना बेहतर करते रहने को जारी रखन होगा.
Ø आपको कोई रंग, रूप, या जाति-धर्म के आधार पर भेद-भाव कर रहा है, इसका मतलब - “आपमें कमी नही है” बल्कि यह उसकी घटिया मानसिकता है.
Ø जो व्यक्ति आपको प्रतिभा के आधार पर नही देखता और आंकता है, ऐसा व्यक्ति आपके साथ और आपके पास रहने के योग्य नही है.
Ø प्रतिभा के होते हुए आपको अवसर नही मिलने का अर्थ कमी आपके अंदर नही उस व्यवस्था के अंदर है, जिसे आपकी प्रतिभा दिखलाई नही देती है. और ऐसी व्यवस्था में यदि आप सफ़ल भी हो गए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
इसके लिए मैं आपको एक इस वास्तविक उदाहरण देना चाहता हूँ -
कुछ दिन पहले एक खबर आयी थी कि - चित्रांगदा सेन, नवाज़उद्दिन के साथ फ़िल्म करने में असहज महसूस कर रही थी क्यूँकि चित्रांगदा को नवाज़ के कालेपन से दिक्कत हो रही थी. परिणाम यह हुआ कि - उस फ़िल्म से चित्रांगदा को हटा दिया गया और एक दूसरी अदाकार (heroin) के साथ नवाज़ ने वो फ़िल्म पूरी किया. इस सच्ची घटना को लिख कर हर व्यक्ति को अपने दीवार पर चिपका लेना चाहिए .
यह घटना हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणदायक सबूत है कि - अगर आपके अंदर क्षमता है तो आपको कोई टस-से-मस नही कर सकता है. जनता चित्रांगदा से ज़्यादा नवाज़ को पसंद करती है अतः निर्देशक ने चित्रांगदा को अलविदा कह दिया.
सुशांत से एक गलती हो गयी -
“ ज़िंदगी के बाउंसर पर सुशांत DUCK करना भूल गए ”
परिस्थितियाँ जो भी रही होंगी पर मैं यदि “सुशांत” से मिलता तो मैं उन्हें यह चंद पंक्ति सुनता जो अब उनके जाने के बाद यहाँ लिख रहा हूँ :-
यही है ज़िन्दगी - कुछ ख़्वाब, चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौने से तुम भी बहल सको तो चलो......
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती है
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो.....
सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी है भीड़ में, जो तुम भी निकल सको तो चलो.....
यहाँ किसी को कोई रास्ता नही देता
मुझे गिरा कर अगर तुम संभल सको तो चलो........
यही है ज़िन्दगी - कुछ ख़्वाब, चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौने से तुम भी बहल सको तो चलो......
(निदा फ़ाज़ली)
NOTE - हमारे समाजिक व्यवस्था में इस कदर भेद-भाव क्यों है और हम प्रतिभा के जगह पर भाई-भतीजवाद, नस्लवाद, जातिवाद........इत्यादि को क्यों प्राथमिकता देते हैं , इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे ?
टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- (Janghat.blogspot.com)
+91-7903892791, 9334302001



Bebak aur satik tippani ke liye abhar.
ReplyDeleteBilkul sahi likhe ho dost koi kaise aisa kar sakta insaan apne zindagi m kyu itna jaldi hemmat har jata h aisa nhi karna chahiyeah tha sushant rajput ko sun kar belive nhi horaha tum jo likhe ho saranay h good profesar sahab
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा लेख है सर बहुत लोगों को इसे पढ़कर प्रेरणा मिलेगी।
ReplyDeleteबहुत हीं शानदार, सटीक, सामयिक, और यथार्थ लेखन!
ReplyDeleteप्रिय अली ,
ReplyDeleteबहुत बहुत शुक्रिया आपका जो आपने इतनी खूबसूरती से अपनी बात हमारे सामने रखी। मैं कहना चाहुंगी कि आपने जो कुछ भी कहा 90 प्रतिशत बात सही कही। 90 प्रतिशत इसलिए कि उन 10 प्रतिशत कारणों को हम और आप नही जान पाते, जिसे सिर्फ आत्महत्या करने वाला ही जानता है । इसके अलावा और भी कई कारण है ।
इन सब जातिवाद, ऊंच नीच, धर्म का खेल, भाई भतीजा आदि से अगर निपटना है तो इसकी शुरुवात हमे अपने ही घर से करनी होगी। अपनी 60,70 साल की ज़िंदगी मे देश मे सब कुछ बदल पाना मुमकिन नही। पर हम अपने घर मे बेशक कई बुराईयों को दूर कर सकते है। तब भविष्य बदलेगा। हर परेशानी का स्रोत भी हम है और निदान भी । मेरी ओर से आपको बधाई इतना सुंदर लेख के लिए । आभार।
काफी अच्छा लगा पढ़ कर...ऐसा लगा मानो तुम्हे सुन रहा हूँ। आशा है ऐसी चर्चा कॉलेज के विद्यार्थियों से भी होती होगी...और ये जरूर होनी चाहिए। मेरे अनुसार अगर मेरी रचना कोई सकारात्मक बदलाव नही ला पाए तो लाख प्रसंनशाओं के बावजूद उसकी कोई मूल्य नही है। ये अत्यंत ही आवश्यक है कि देश के युवा मंदिर-मस्जिदों के चंगुल से बाहर निकल और वर्तमान "राष्ट्रवाद" के जाल से अपने आप को बाहर निकाल कर तथ्यात्मक सोच विकसित करे। वर्तमान परिस्थितियां जिस अंधेर रास्ते पर हमें ले जा रही है वो अत्यंत ही भयावह है जहां ज़बानों पर अंकुश लगने लगे है और राजनीति अपने निचले स्तर पर है। इस स्थिति से बाहर निकलना और निकालना दोनों इस देश के युवाओं की जिम्मेवारी है।
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