युवाओं की राजनीतिक भागीदारी कितनी लोकतांत्रिक ?
युवाओं की राजनीतिक भागीदारी कितनी लोकतांत्रिक ?
युवाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ना, किसी भी देश के लोकतंत्र या जनतंत्र के लिए सकारात्मक चिन्ह माना जा सकता है । लोकतंत्र की सबसे सरल परिभाषाओं में से एक है :- “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा की जाने वाली शासन प्रणाली” । शासन की पूरी व्यवस्था में जितनी अधिक भागीदारी, ज़िम्मेदारी और जुड़ाव जनता का होगा, लोकतंत्र उतना ही मज़बूत और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होगा ।
विश्व के पहले लोकतंत्र के रूप में यदि भारत का नाम लिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी क्योंकि - ‘वैशाली’ का प्राचीन जनतंत्र इस बात की गवाही देता है । ऐसे में, भारत को मजबूत लोकतंत्र की मिसाल पेश करनी होगी, जिसके चारों स्तम्भ समानता, न्याय, स्वतंत्रता, बन्धुत्व और धर्मनिरपेक्षता से लिपटी हुई हो ।
समाज और राजनीति आपस मे जुड़े हुए पहलु हैं, एक शुद्ध सामाजिक व्यक्ति का पूर्ण रूप से राजनीति से मुंह मोड़ना तर्कसंगत नही माना जा सकता है, क्योंकि सामाजिक न्याय तक पहुंचने का रास्ता संविधान और लोकतंत्र की सीढ़ियों से हो कर गुज़रता है, जिसके लिए राजनीतिक समझ, सूझ-बूझ और जागरूकता आवश्यक है । एक नेता की समाजिक स्वीकृति और जन-मानस तक उसकी पहुँच ही उसे सफल राजनेता बनाता है । स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज के भारत की सामाजिक और राजनैतिक स्थिति में आमूल-चूल बदलाव हुआ है जिसका सीधा असर युवाओं का राजनीति में हो रहे जुड़ाव से समझा जा सकता है ।
आज की राजनीति में सोशल मीडिया के योगदान को नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता है । सोशल मीडिया के प्रभाव ने धरनो को आंदोलनो में तब्दील करने में अहम भूमिका निभाई है । समाज से जुड़े मुद्दों को सरकार की निगाहों तक लाया है । लोगों में जागरूकता और ज़िम्मेदारी का भाव उत्पन्न किया और सरकार को अपने ढीले तंत्र का आइना दिखलाया है । एक तरफ़ अन्ना आंदोलन से उभरे केजरीवाल को दिल्ली की कुर्सी तक बिठाया है, तो दूसरी तरफ़ चर्चित “निर्भया-कांड” में फ़ास्ट-ट्रेक कोर्ट के माध्यम से आरोपी को सज़ा दिलवाया है । ये सभी उदाहरण इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है के - आज के दौर में सोशल मीडिया एक ऐसा अस्त्र बन चुका है, जिसका सकारात्मक प्रयोग शासन पर विराजमान मदमस्त हो चुके मतवाले हाथियों के कान में चींटी के समान है ।
सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वालों की एक बड़ी तादाद युवा वर्गों की है। अतः कहीं ना कहीं आज युवा ख़ुद को राजनीति से जोड़ कर देखते हैं । समाजिक- एवं राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय पेश करना, अच्छे-बुरे घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया करना, ट्वीट का सहारा हो या कमेंट के माध्यम से अपना रोष एवं अपनी पसंद दूसरों तक पहुँचाना । पर क्या इसे संवैधानिक दृष्टिकोण से राजनीति में सक्रियता कहा जा सकता है ? क्या इसे लोकतंत्र में या राजनीति में भागीदारी से जोड़ कर देखा जा सकता है ? मेरी नज़र में ये ‘भेड़-चाल’ के समान है ।
वास्तविकता तो यह है की, सबसे पहले युवाओं को यह समझने की ज़रूरत है की - ‘राजनीति में भागीदारी’ का सही अर्थ क्या है ? आज हमने समाज को दो वर्गों में बाँट रखा है - पहला - “राजनैतिक व्यक्ति” अर्थात - ‘नेता’, दूसरा - “ग़ैर-राजनैतिक व्यक्ति” अर्थात - ‘जनता’ । ‘नेता’- वो जो चुनाव लड़ता हो या लड़ने वाला हो, ‘जनता’- वो जो ‘नेता’ को वोट देता हो । राजनीति की यह स्थिति - राजनेता और जनता के बीच एक खाई पैदा करता है । इस खाई को पाटने के लिए, “राजनीतिक भागीदारी” को सही अर्थों में समझना होगा ।
जनता के रूप में, वोट डाल कर राजनीति में भागीदरी करना और नेता के रूप में, सड़क से संसद तक राजनीति में भागीदारी करना ये दोनो लोकतंत्र में राजनीति करने के दो अलग- अलग छोर (बिंदु) हूँ । इन दोनो छोरों के बीच में रह कर एक आम नागरिक राजनीति में अपनी भागीदारी अलग- अलग तरह से प्रस्तुत कर सकता है और मुख्य- धारा की राजनीति को सकारात्मक ढंग से प्रभावित कर सकता है । तभी एक सही और मज़बूत लोकतंत्र की रूप- रेखा खींची जा सकती है ।
आज देश में युवाओं का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, और अगले 5 दशक तक राजनीति और सत्ता की बागडोर इन्ही युवा हाथो में रहने वाली है । अतः इन युवाओं को सकारात्मक राजनीति के प्रति ईमानदार होना होगा । धर्म, जाति, संप्रदाय, और क्षेत्र के नाम पर गुट- बना कर समाज में वेमनस्य फैलाने और राजनेताओ के हाथ की कठपुतलियाँ बनने को राजनीति करना नही कहा जा सकता है ।
युवाओं को देश के वास्तविक मुद्दों को समझना होगा । बेरोज़गारी की समस्या, बढ़ती महँगाई, वातावरण का प्रदूषित होना, नदियों की दूषित होना, किसान का आत्महत्या करना, धार्मिक-असहिष्णुता, पानी का अकाल, ऊर्जा की बर्बादी, महिलाओं की सुरक्षा, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, इत्यादि । इन समस्याओं पर लिखना, बोलना, सवाल करना, आवाज़ उठाना, धरना देना होगा । सोशल मीडिया के माध्यम से इन मुद्दों को जन- आंदोलन का रूप देना होगा । हमें आपसी मतभेद और मनभेद के बीच के अंतर को समझते हुए एक जुट हो कर एक लड़ाई लड़नी होगी तभी “अनेकता में छिपे एकता को सही अर्थ में पहचाना जा सकता है और विभिनताओ से घिरे इस देश को एक सूत्र में बांधा जा सकता है जहाँ आपसी मतभेद तो बहुत होंगे मनभेद की कोई जगह नही होगी ।
इसके लिए युवाओं को समाजिक एवं राजनैतिक रूप से जागरूक होना होगा, लोकतंत्र के मूल- उद्देश को समझना होगा, क़ानून और संविधान की आधारभूत समझ बनानी होगी और आस-पास के समुदाय को सकारात्मक करना होगा । सरकार के नीतियों में अपनी राय देनी होगी, अप्रसंगिक नीतियों का संविधानिक तरीक़े से विरोध करना, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाना, अपने कर्तव्यों को समझना, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना, दूसरों के हक़ के लिए आवाज़ उठाना और आस-पास के समुदाय को जागरूक करना होगा तब जा कर युवाओं की राजनीतिक भागीदारी सही अर्थों में संवेधानिक कहलायगी और यह प्रयास देश को आदर्श लोकतंत्र की तरफ़ ले जाने के साथ-साथ प्रतिनिधियात्मक लोकतंत्र को सही अर्थों में साकार करेगी ।
इन युवाओं में जोश है, ऊर्जा है, आत्मविश्वास है, न तो इनकी प्रतिभा पर कोई प्रश्न-चिन्ह खड़ा किया जा सकता है और ना ही इनकी देशभक्ति पर । बस ज़रूरत है इन्हें सही मार्ग-प्रशस्त करने की, इनके ऊर्जा को सही दिशा में हस्तांतरित करने की, इनके आत्मविश्वाश को अनुभव के साथ जोड़ने की । ये प्रयास सम्पूर्ण देश को दूरगामी लाभ की दिशा में ले जाएगा और हम सब मिलकर समाजिक न्याय की ऐसी संवैधानिक रेखा खींचने में सफ़ल हो पाएँगे जिसे कोई भी ‘रावण’ (असमाजिक तत्व) अपने छल- कपट से पार करने में कामयाब नही हो पाएगा ।
जय-हिंदी !!!
Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें.
धन्यवाद ।
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- (Janghat.blogspot.com)
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Nice post
ReplyDeleteVery informative
ReplyDeleteThank you so much 🍁
DeleteWell written! 👏👏
ReplyDeleteTotally agree👍