SELECTIVE ACTIVISM - (A Request Letter for one and All)
Selective Activism
देश के तमाम हिंदू "भाइयों-बहनों" के लिए प्रार्थना पत्र - अली.
(एक बार ज़रूर पढ़े)
तकलीफ़ और संघर्ष के वक़्त हम आपसे (हिंदू भाइयों-बहनों) सहयोग की उम्मीद-भर नही रखते, बल्कि उचित साथ माँगने का हक़ रखते हैं और आपको हमारा साथ देना होगा, क्यूँकि हमने भी आपके साथ रहना, आपके साथ चलना, साथ ग़म और ख़ुशियाँ मनाने को चुना है.
आज़ादी के वक़्त सत्ता और सियासत के खेल ने जब ज़मीन पर जहाँ-तहाँ लकीरें खींच कर हमारी वतन-परस्ती का सबूत माँग लिया तो हमने इस देश (भारत) को, देश की संविधान को और देश के तमाम बहुसंख्यक भाइयों एवं बहनों को चुना, क्यूँकि हमें यहाँ के तमाम साथियों पर यक़ीन था. उस वक़्त हमने सरकार को नही चुना, धर्म को नही चुना, बल्कि "धर्म-निरपेक्षता"(पंथ-निरपेक्षता ) को चुना.
सरकार की सियासत और वोट बैंक की राजनीति का खेल देखते-देखते हमारे पाँच पुश्त से ज़्यादा गुज़र गयी. बुरे वक़्त में पड़ोसी काम देते हैं प्रधानमंत्री नही. दीपावली में मिठाईयाँ और ईद में सवैयाँ खाने मोहल्ले के लोग आते हैं सरकारें नही तो हम किस पर यक़ीन करे आपके ऊपर या सरकार पर ?
आज़ादी के बाद देश की सामने सबसे बड़ा मुद्दा था - राष्ट्र की एकता को मज़बूत करना और इसके लिए रविंद्र नाथ टैगौर ने कहा था - “भारत की एकता भावनाओं की एकता है”. मगर अफ़सोस यह है कि - 135 करोड़ भारतीयों की भावनाएँ, हथनी के पेट में पल रहे बच्चे की पीड़ा को देख कर तो आहत होती है, मगर जेल में बंद एक गर्भवती छात्रा (सफ़ुरा जरगर ) के पेट में पल रहे बच्चे को लेकर ये भावनाएँ संवेदनहीन और कहीं-कहीं बेशर्म (पायल रहतोगी के अल्फ़ाज़) भी हो जाती है.
भावनाओं से भरे-पुरे इस देश के मासूम नागरिक #प्रिंस को गड्ढे से निकलने की दुआ तो करते हैं पर ज़बरदस्ती जेल में बंद कर दिए किसी अल्पसंख्यक भाई-बहन को जेल से निकलने की चर्चा भी नही करते.
संविधान के प्रथम मौलिक अधिकार (अनुo-14) कहता है कि - "विधि के समक्ष समता का अधिकार" अर्थात् क़ानून के नज़र में सब बराबर होंगे. अगर सच में ऐसा है तो - "देश के ग़द्दारों को गोली मारों सालों को" का मंत्र जापने वाले (अनुराग ठाकुर ) ने न्याय की देवी से कोई दोस्ती कर रखी है या न्याय की देवी के हाथ में जो तलवार है वो हिंदू- मुसलमान देख कर चलने लगी है ?
क्या इस ख़ामोशी को तोड़ने के लिए, फ़्रीज़ में गोश्त रखने के इल्ज़ाम में मारे जाने वाले बेगुनाह के नाम में इसका धर्म तलाश करने की ज़रूरत है या फिर देश के मुसलमानो का रहनुमा बनने वाली राजनीतिक पार्टियों से कोई अपेक्षा करनी चाहिए ?
सच कहें तो मुसलमानों की ये दुर्दशा - कौम के "तथाकथित ठेकेदारों" औऱ भाड़े के उन #रहनुमाओं की वजह से है -जो इज़ारबन की डोरी बांधने का फ़तवा देने के लिए तो कूद-कूद कर TV स्क्रीन पर नाचते रहते है मगर #मुसलमानो के शिक्षा, स्वास्थ, सुरक्षा, रोज़गार, जैसे जीवन से जुड़े मुद्दे पर अपने मुंह मे बकरे की बिरयानी रखना पसंद करते हैं .
दावे के साथ कह सकता हूँ - मुसलमान न कभी कोंग्रेस पर आश्रति था और न ही आज भाजपा के भरोसे है । एक खुला दुश्मन है, एक छिपा दुश्मन । एक को पेट चीर कर नंगी तलवार पर बच्चे को घुमाना आता है तो दूसरे को पीठ में खंजर मारने का हुनर पता है ।
आज़ादी से लेकर आज तक इस देश का मुसलमान अल्लाह को निगेहबान मानते हुए, हर मोड़ पर लड़ता है, गिरता है, खुद-उठता है, और ख़ुद आगे बढ़ता है । पीठ पर खंजर के दाग़ और दिल में हिंदुस्तान को लेकर चलने वाला मुसलमान जब अपने कुछ हिन्दू भाइयो की आंखों में ख़ुद के लिए पाकिस्तान पढ़ता है तब भी उसका होंसला पस्त नही होता, कभी वो ज़हीर खान बनकरसामने आता है तो कभी अब्दुल कलाम बन कर ।
बदन में दौड़ता सारा 'लहू' ईमान वाला है.......
मगर, ज़ालिम समझते है- 'पाकिस्तान' वाला है.
देश के लिए मिसाईल बनाने के बावजूद भी जब देश के सांसद (तेजस्वी सूर्या ) को हम #पंक्चर बनाने वाले नज़र आते है तो वैसे संसद भवन और वैसे सांसद से हमारे लिए किस स्तर की योजना की अपेक्षा की जा सकती है ???
बंटवारे के बाद हुए कत्ले-आम में गलती से बच जाने के बाद इन 70-75 सालों में हमने अपने ऊपर जितने जुल्म देखे है, जिससे अब तक हमारी नस्ले मिट जाती पर हमें माँ के पेट मे ही सब्र रख कर यकीन के साथ आगे बढ़ने का हौंसला सीखा दिया जाता है, और माफ़ करना तो हमारे खून में शामिल है। ज़ालिमों को माफ़ करते करते हमारी बस्तियां साफ़ हो गयी हम उफ़्फ़ तक न बोलें ।
पेट मे पत्थर बांध कर काम करने वाले हम इंसाफ-पसंद मुसलमानों ने ईमानदारी की ऐसी-ऐसी मिसाल पेश किया है और बदले में वो हमारे हाथ का खाना (zomato) वापस कर देते है ।
हमारे वालिद (पापा) अपनी बेग़म औऱ बेटे से दूर जा कर पैसे कमाने के खातिर अरब-ममालिक में अपने जवानी के खूबसूरत पल बर्बाद कर देते है ताकि - बच्चों को अच्छी शिक्षा औऱ घर वालों को इज़्ज़त की रोटी नसीब हो सके पर हमें बदले में कभी "हाशिमपुरा का सामूहिक जनाज़ा" तो कभी अपने "फ्रिज़ में गोश्त रखने" की सज़ा मिलती है.
न गोलियों से प्रधानमंत्री की हत्या, न बम से श्रीपेरमबदूर का धमाका, न गांधी से नफरत औऱ न नक्सल की साज़िश, फ़िर भी हमारे बच्चों को सरकारी तोहफ़े में "बटला-हाउस" मिलता औऱ हमारे उस माथे पर आतंकवाद की मुहर लगा दिया जाता है, जिसे हम दिन में पाँच क़्त इसी सर-जमीन में रगड़ते है.
हमें पाकिस्तान भेजने की चाहत रखने वालों, हमें कहाँ - कहाँ से निकलोगे???
पैदा भी यहीं हुए थे औऱ दफ़न भी इसी मिट्टी में होंगे. हमारी अस्थि-पंजर उन मिट्टियों में सने हुए हैं, जिसकी ख़ुश्बू अनाज़ के शक़्ल में खेतों में लहलहाते हुए देश के अड़बो भारतीयों का भूख मिटाती है । हम खून की बोतल बन कर ब्लड-बैंक में बैठे हैं जो कल भी देशवासियों के रगों में उतरे थे और कल भी उतरेंगे.
हमें कहाँ- कहाँ से निकालोगे?
दिन के उजाले में हमारे आंखों के सामने एक-एक कर मीनारों को समतल कर दिया जाता है औऱ धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाली केंद्र सरकार बड़े ही बेशर्मी से इसे #प्रशाशनिक भूल का नाम दे देती है औऱ हम इस ज़ख़्म को सीने में कैद करके धोनी के छक्के औऱ भारत की जीत पर बुमराह के गेंद की तरह गलियों में नाचते हैं ।
कॉलेज में पढ़ रहे हमारे बच्चों को शक़ के आधार पर 20 वर्षों तक जेल में पड़तारित करके यह कहते हुए छोड़ दिया जाता है कि - "#न्यायालय आपसे माफ़ी मांगता है” । हम मासूम देशवासी, देश की उसी न्यायालय को माफ़ भी करते है और उनसे फिर से इंसाफ की उम्मीद भी करते है, पर हमारी उम्मीदों का जनाज़ा निकालते हुए देश का सर्वोच्य न्यायाल किस खूबसूरती से कह देती है कि -"मंदिर के पक्ष में दिया जाने वाला फ़ैसला तर्क औऱ सबूत नही बल्कि भावनाओ के आधार पर किया गया है"। देश मे अमन-चैन और भाईचारगी के ख़ातिर हम अल्लाह के घर से भी समझौता कर लेते है औऱ फिर ईद के दिन अपने दस्तर-खान पर आपका बेसब्री से इंतजार करते हैं ।
जाते-जाते आपसे प्रार्थना करना चाहता हूं कि - बहुसंख्यक होने के नाते हमारी सुरक्षा का दायित्व नही उठा सकते तोन सही कम से कम अपने आने वाले संतानों को हमसे नफ़रत करना तो मत सिखलाओ क्योंकि ये नफरत ज़हर बन कर कब देश की खूबसूरती को #भगवा कर देगा तुम्हे पता भी नही चलेगा ।
औऱ हां, हम यह प्रार्थना आपने 135 करोड़ भाइयों औऱ बहनों से ही कर सकतें है, क्योंकि सरकार न हमारी थी, न हैऔऱ न होगी, पर हम सरकार के भी हैं, संविधान के भी है और इस देश के भी.
जाते-जाते "शकील आज़मी” की ये दो पंक्ति सुनते जाएँ सुनते जाएँ :-
मेरा इस बात पर ईमान था मज़बूत पहले- अब-भी पुख़्ता है,
#ख़ुदा बेहतर समझता था, #ख़ुद बेहतर समझता है.
अच्छा लगे तो Share करें दें !!!
Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें .
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- (Janghat.blogspot.com)
+91-7903892791, 9334302001



Mai aaj bahut aahat mahsus kar rahi hu.mujhe is aalekh ne jhakjhor diya hai, shayad mai in emotional bhi ho rahi hu. Hume apne bhai se mafi mangni chahiye.Akhir hum unhe barabari ka darza kab denge.
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