भारतीय समाज में 15 VS 85 की राजनीति -


भारतीय समाज में 15 VS 85 की राजनीति



आज़ादी के बाद भारतीय राजनीति में लिए गए फ़ैसलों ने भारतीय समाज की समरसता और भाई-चारगी को कैसे छिन्न-भिन्न करते हुए हमारे समाने 15 VS 85 का काल्पनिक विकल्प खड़ा कर दिया है. इसे समझने के लिए आज़ादी से अब तक के राजनैतिक हल-चल को संक्षेपमें समझना होगा .  

यह सर्वविदित है की - देश की आज़ादी में राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे बड़ी भूमिका रही और इसके नेतृत्वकर्ता के रूप मे कोंग्रेस पार्टी ने देश के जन-जन मे अपनी पहचान बना लिया, निसंदेह यह एक बड़ी वजह है कि - आज़ाद भारत के अंतरिम प्रधान-मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु को 1952 के देश के प्रथम आम-चुनाव में पुरे देश से स्वीकार्यता मिली और नेहरु जीवन-प्रयंत (1964) प्रधान-मंत्री बने रहें.   

जब देश आज़ाद हुआ तो देश के सामने एक से बढ़ कर एक पहाड़ जैसी समस्याएँ थी. परंतु सबसे कठिन कार्य था देश को सांप्रदायिकता एवं भेद-भाव से बचाते हुए सभी के विचारों का सम्मान करते हुए सही अर्थों मे लोकतंत्र स्थापित करना जहाँ हर प्रकार के भेद-भाव को ख़त्म करते हुए सभी के विचारों का सम्मान हो.   

देश को आज़ादी मिलने और संविधान लागु होने से हज़ारो सालों पहले से भारत में तथाकथित ‘उच्य वर्गों’ ने ‘दलित’ एवं अन्य पिछड़ी जातियों का भरपूर शोषण और दमन किया । बाबा साहब ने इसके ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए अपनी जान लगा दिया और अंततः उनका हिन्दू धर्म छोड़ देना इस बात का संकेत है कि - "यहां शोषण का चक्र इतना गहरा है कि - धर्म का त्याग ही एक मात्र विकल्प महसूस होता है" । 

 नेहरू के नेतृत्व में कोंग्रेस की सबसे बड़ी खासियत थी की - कांग्रेस के अंतर्गत भी एक विरोधी गुट जिंदा रहता था और उनके विचारों एवं मूल्यों को तर्क की कसौटी पर स्वीकार भी किया जाता था. नेहरु के पहले मंत्रिमंडल के 14 मंत्री मे 05 ग़ैर-कोंग्रेसी (अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद, जौन मथाई, सी.एच. भाभा और शंमुखम चैट्टी) मंत्री थे. उस वक़्त कोंग्रेस का सूत्र था - "हम पानी की तरह है, हमारे अंदर जाति, धर्म, रंग, लिंग, सम्प्रदाय सभी को समावेशन सम्भव है.

कोंग्रेस के इस विविधता से भरे स्वरूप को पुरे देश ने आत्म-साथ कर लिया था यही वजह थी कि - नेहरु से लेकर  इंदिरा के आपातकाल तक कांग्रेस मजबूती से केंद्र में भी और लगभग सभी राज्यों में अपनी सत्ता बनाए रखने में सफ़ल रही.  (केरल जैसे कुछ अपवाद को छोड़कर)

इंदिरा का आपातकाल :- (इंडिया इज़ इंदिरा, इंदिरा इज़ इंडिया) 

इंदिरा गांधी के वक़्त तक कोंग्रेस मे बहुत सारे तोड़-फोड़ और विघटन हो चुका था, अब कोंग्रेस पहले वाली कोंग्रेस नही रही थी. इंदिरा ने अपनी वर्चस्वता को बराकर रखने के लिए पहले तो ग़लत तरीक़े से चुनाव करवाया और फिर अपराधी साबित होने पर देश मे आपातकाल () लागू कर दिया. 

जनता सरकार - 1977 

देश की जनता ने आपातकाल के बदला लिया और आपातकाल ख़त्म होते ही इंदिरा को हरा कर जनता दल की सरकार बनी और मोरारजी देसाई देश के प्रधान-मंत्री बने.  जनता सरकर को  ‘इंदिरा-विरोध’ में प्राप्त सत्ता चलाने का न आईडिया था, न नियत न ही नीति. अतः 2 साल में सरकार गिर गयी । देश में फिर चुनाव हुए और इंदिरा गांधी फिर से देश की प्रधानमंत्री बन गयी. 

इस वाले इंदिरा सरकार में नेहरू (सबको लेकर चलने) वाली बात नही रही. अतः देश के केंद्र में तो कांग्रेस की सत्ता थी, पर विभिन्न राज्यो में अलग अलग दल ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिए. कही कम्युनिस्ट पार्टी, कही कोंग्रेस से अलग हुए दल, कही क्षेत्रीय पार्टी, समाजवादी सोंच के नेता जैसे - ज़ोर्ज, लालू, मुलायम, चौधरी चरण सिंह, चंद्र्शेखर, इसके अतरिक्त संघ से निकले - अटल, अडवाणी जैसे दिग्गज नेता. 
  
अतः देश मे राजनिति करने वाले दो लोग खेमे हो गए -- एक “इंदिरा-खेमा” जिसे आप “कांग्रेस” कह सकते है दूसरा “समाजवादी-खेमा” (गैर-इंद्रा खेमा). लोकतांत्रिक समाज में रोटी, कपड़े, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ जैसे मुद्दों को लेकर  सत्ता संघर्ष चल रहा था. जनता कभी कांग्रेस के पक्ष में होती तो कभी दूसरे खेमे से खुश होती 

“भारतीय जनता पार्टी” (BJP) का जन्म :- 

1951 में निर्माण किया गया “भारतीय जन-संघ पार्टी” ने इंदिरा के विरोध में 1977 में “जनता-पार्टी” से जुड़ाव कर लिया था परंतु जनता पार्टी के समाजवादी नेता और जनसंघ से आए नेताओं के बीच वैचारिक ताल-मेल नही बैठने के कारण “जनता-पार्टी” की सरकार भी गिर गयी और 06 April 1980 को जन-संघ के नेताओं ने अपनी अलग छवि बनाते हुए अपनी अलग पार्टी का निर्माण कर लिया, जिसका नाम था :- “भारतीय जनता पार्टी” (BJP). 

भारतीय लोकतंत्र में संप्रदायिकता का बीज :- 

 “भारतीय जनता पार्टी” ने इस लोकतांत्रिक देश में ख़ुद को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित किया और इसके चुनावी सहयोगी के रूप में RSS जैसी संस्था इसका साथ देने लगी. स्थापना के 9 साल बाद, 1989 के लोक-सभा चुनाव में “भारतीय जनता पार्टी” पुरे देश में सिर्फ़ 02 सीट पर ही जीत हासिल कर सकी. देश की लोकतांत्रिक जनता ने भाजपा के “हिंदुत्व” और “साम्प्रदायिकता” से भरे उन्मादी विचार को सिरे से ख़ारिज कर दिया. ऐसे विषम परिस्थिति में बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती थी- "खुद को स्थापित करना”. पहले से चल रहे दोखेमे की रजनीति में खुद को स्थापित करने के लिए भाजपा ने लोकतंत्र के मर्म को उलट देने वाला नीति अपनाया - उसने लोकतंत्र की सबसेबड़ी कमज़ोरी को अपना हथियार बना लिया ।

चुनावी राजनिति के फार्मूले :- 

भाजपा ने चुनावी राजनिति के फार्मूले निकाले :- "जिसके जितना ‘सर’ उसकी उतनी सत्ता" वाले सिद्धांत को अपनाने का फ़ैसलाकिया.  यहां से भारतीय समाज की सबसे बड़ी दिक्कत शुरू हुई । चूंकि, भाजपा पार्टी तथाकथित उच्य जाति से भरी हुई थी जहाँ दलितों कोतो सामने में बैठने की भी इजाज़त नही थी । देश मे पिछड़े वर्ग और दलित को जोड़े बिना ‘सर’ (Head) की संख्या बढ़ाना मुश्किल नहीनामुमकिन था.  अतः उन्होंने सोंचा की - यदि निम्न वर्ग को अपना दुश्मन कहेंगे तो इनका वोट कैसे मिलेगा अतः - हमें दुश्मन बदलना होगा. 

धर्म और सम्प्रदाय कार्ड : - 

इस समस्या के समाधान हेतु भाजपा ने एक साथ 2 कार्ड खेल दिया - "धर्म-कार्ड  और "संप्रदाय-कार्ड".  
"धर्म कार्ड" का अर्थ - धर्म के नाम पर देश के सभी हिन्दूओं (अनपढ़ हिन्दू) को एक धागे में जोड़ना. 
"संप्रदाय-कार्ड" का अर्थ - “मुसलमान को दुश्मन बताने से अनपढ़ हिन्दूओं को एक कर के वोट बैंक बढ़ाने की नीति .

 इसी के साथ भाजपा ने हाथी के दिखलाने वाले और खाने वाले दांत में अंतर करते हुए, दलित एवं पिछड़ो के शोषण को पीछे के रास्ते से जारी रखा और मुसलमान से नफ़रत की राजनीति को उग्र रूप देना शुरू किया. इसी क्रम में आपने वो तस्वीर देखी होगी जिसमें भरे मंच पर मुस्लिम टोपी को पहनने से मोदी जी इंकार करते हुए “मुस्लिम-संप्रदाय से नफ़रत” का एक संकेत देते हैं. ऐसे हज़ारों संकेत भारतीय राजनीति में आपको देखने को मिल जाएँगे .   

धर्म कार्ड का प्रयोग करते हुए 1989 में पुरे देश में आडवाणी के  'रथ यात्रा" का बिगुल बजाया जाता है और देश के सभी हिंदुओ को “भगवान राम” के नाम पर, मंदिर के नाम पर, एक करने की निकृष्ट राजनीति के खेल से आप सभी परिचित होंगे. इस कार्ड की सफ़लता का ही परिणाम है कि - भाजपा को “रथ-यात्रा” से पूर्व लोकसभा में - 02 सीट और इसके बाद 80 सीट पर सफ़लता मिलती है. 3 वर्षों के अंतराल में 40 गुणा सफ़लता पाने वाली इस पार्टी के विचार और व्यवहार में “धर्म-कार्ड” का एजेंडा बस जाता है.  

इस ‘धर्म और सम्प्रदाय’ कार्ड के साथ राजनीतिक संघर्ष करते हुए भाजपा अपने सहयोगी दलों का साथ लेते हुए (NDA) सबसे पहले 1998 में अपने सबसे साफ़ छवि वाले नेता “अटल बिहारी वाजपाई के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बना पाती है परंतु अपने ही सहयोगी दल “AIADMK” के साथ छूट जाने के कारण यह सरकार 1 साल में गिर जाती है. फिर 1999 में, अटल बिहारी के नेतृत्व में एक बार फिर से सरकार बनाने का अवसर तो मिल जाता है, परंतु बिना नियत और नीति की चलने वाली सरकार की पोल जल्द ही खुलने लगती है. सरकारी कर्मचारी को मिलने वाली “पेंशन” को ख़त्म करना, पूँजीपतियों का सहयोग एवं धर्मिक-उन्माद फैलाने वाली भाजपा की सरकार के “इंडिया-shaining” के फ़र्ज़ी (झूठे) वादों को देश की जनता 2004 में नकार देती है.

“2014 का मास्टर-प्लान” :- (संक्षेप में )

2004 से अगले 10 वर्षों तक सत्ता में आने के लिए भाजपा हर हथकंडे अपनाने को व्याकुल रहती है और बदलते हुए इस आधुनिक युग में उसे सबसे बड़ा हथियार मिलता है - “IT cell के माध्यम से फ़र्ज़ी खबर फैलाना”. 

भाजपा इस आधुनिक और विषैले हथियार का प्रयोग अपने दोनो कार्डों पर करती है. फ़र्ज़ी खबरों के माध्यम से एक तरफ़ तो देश के मुसलमानों के प्रति नफ़रत का ज़हर घोलती है और दूसरी तरफ़ धर्म का ग़लत तरीक़े से रजनीतिकरण करना शुरू करती है. इसमें गुजरात का झूठा-विकास मॉडल दिखला कर “नरेंद्र-भाई- मोदी की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना भी शामिल है. पूँजीपतियों के सहयोग एवं IT cell के इन्ही प्रयासों से भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव के वक़्त देश में धार्मिक-गोलबंदी करते हुए पहली बार अपने दम पर केंद्र में सरकार बनाने में सफ़ल हो जाती है. 

2019 का प्लान :- (संक्षेप में)
अपने इसे रणनीति के साथ-साथ, एक कदम आगे बढ़ते हुए 2019 के लोकसभा में ‘हिटलर’ का अनुसरण करते हुए "फ़र्जी देशभक्तिकार्ड" का  प्रयोग  से पुनः सत्ता में वापसी करती है . 

एक कदम देश एवं लोकतंत्र  के लिए :-


      देश की एक-एक जनता इस बात को जानती है कि - आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा हुआ 15 या 16% मुसलमान किसी भी क़ीमत पर 85 % बहुसंख्यकों के लिए किसी भी प्रकार का ख़तरा नही हो सकता है, पर भाजपा के IT cell लगातार यह साबित करते रहते है कि - देश का 15 % अल्पसंख्यक देश में 85% बहुसंख्यकों के लिए ख़तरा है, अतः बहुसंख्यकों को एक जुट होना पड़ेगा. वास्तव में बहुसंख्यकों की यह एक जुटता ही भाजपा का वोट-बैंक है. संविधान इस बात को बार बार दोहरता है कि - - "दुनिया के किसी भीदेश मे अल्पसंख्यक की सुरक्षा और उसके विकास की पूरी की  पूरी जिम्मेदारी और जवाबदेही उस देश के बहु-संख्यक को लेना पड़ती है. 

बेशक, अपने निजी स्वार्थ को पुरा करने वाले कुछ अल्पसंख्यक नेता भी अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का प्रयास करते हैं जो इस देश की विविधता को ख़त्म करने और संविधान को मिटाने की कोशिश है. देश के एक एक नागरिक को रुक कर, ठहर कर यह सोंचने की ज़रूरत है कि -  

क्या 15 Vs 85 की कभी लड़ाई हो सकती है ?
“कभी नही”

Dr. Mohammad Ali 
Assistant Professor 
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna

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Comments

  1. It's completely pro muslim. Your thoughts seems so biased that you are presenting the only part of event. I will like to recall you that - 98% of muslims were voted muslim league when muslim league has an agenda of separate pakistan . Rest of all what actually you are writing in this blog is event not the solution. So you also is doing same repetitive thing. And whole you say dalit and deprived, I belongs to Rajput community and my father is farmer ,we struggle for education and even fir bread and butter. Where all ours rights are? Why don't you indicate us?? You are doing the same what they does boss!! Need to rethink

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    1. Avinash as you have said 98% Muslims voted to Muslim League on the basis of separate Pakistan then why didn't all Muslims migrated to Pakistan?? If they want so. Why More population of Muslims are here in India than Pakistan ??
      According to you if 98% Muslims voted to Muslim League that time was right?? We are struggling for bread and butter as you have said then why should we fight to each other on the ground of religion in this new India ?? Every middle class and poor family struggling this time. Why shouldn't we arise question among governments??

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    2. Does this the way questioning government?? This articles talk about the same hypothetical issues with preconceived notion of hate towards the societical called upper cast. And the answer for why all muslims do not migrate was- their fear of life in the state of butcher's pakistan. I don't means that every muslim should migrate from India because 2% even then want to be with motherland . And one more thing ,the way muslims living in india is living non other part of world. There is a phrase in english - Beauty is in the eyes of viewers not in the object. We need to grow that beauty of ours

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