विकास दुबे के Encounter से क्या उन 8 पुलिस वाले को इंसाफ़ मिल गया ?
कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच लटकता लोकतंत्र
उत्तर प्रदेश का एक शहर - कानपुर, कानपुर का थाना - “चौबेपुर”, तारीख़ - 03 जुलाई, रात के क़रीब 2 बजे - अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट हुई, चीखें रुकी तो पता चला 3 अफ़सर समेत 8 पुलिसवाले की जान चली गयी और 7 घायल हो गए. रात के सन्नाटे मे आवाज़ आ रही थी - “एक भी पुलिस वाला बचना नही चाहिए”
इतना हिम्मत और इतना साहस एक व्यक्ति के पास कहाँ से आ गया जिससे वो पुलिस-अधिकारी को योजना के तहत खोज-खोज कर मार रहा हो. क्या इसके पीछे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का हाथ है या दुश्मन मुल्क चीन का ? क्या यह किसी आतंकवादी समूह का सरग़ना है या कोई मोस्ट-वांटेड ? 03 जुलाई की इस घटना के बाद कुछ मीडिया इसे - "अपराधी कह रही है और कुछ इसे "बदमाश".
परिचय :-
आज से 19 वर्ष पहले सन 2001 में उत्तर-प्रदेश के तत्कालीन राज्य-मंत्री स्तर के नेता को थाने में घुस कर गोली मार देते है. इन 19 सालों में 60 से अधिक आपराधिक मामले में केस दर्ज हैं. करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक जो कार्यपालिका को अंगूठे के नीचे, न्यायपालिका को जेब में और नेताओ को अपने बग़ल में रखते हैं. (विस्तृत परिचय के लिए गूगल कर लें)
03 जुलाई को पुलिस वाले को मार कर जब विकास दुबे ने पुरे देश में खलबली मचा दिया तो किसी ने कहा - "अब इसकी मौत पक्की है, तो दूसरे ने कहा :- ऐसे लोगों का तो Encounter हो जाना चाहिए. जनता के इस फ़ैसले को उत्तर-प्रदेश STF (Special Task Force) ने स्वीकार करते हुए 09 जुलाई को नाटकीय तरीक़े से इसका Encounter कर दिया.
लोक-तंत्र का मतलब "लोग का तंत्र", जहाँ जनता की सुनी जाए. जनता ने कहा - मार दो .......... मार दिया. जनता के कहा - "बीच सड़क पर मार दो.......बीच सड़क पर मार दिया गया. "आँख के बदले आँख" , "जान के बदले जान". मिल गया सुकून, हो गया फ़ैसला, बज गयी ताली.
परंतु, एक प्रशन अभी भी रह गया है :- विकास दुबे की मौत को उन 8 में से किस पुलिस वाले की मौत का बदला माना जाए ? क्यूँकि एक मौत का बदला तो एक मौत से माना जाएगा. बांकी के 7 पुलिस वाले की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी ?
क्या विकास दुबे को 7 बार फिर से ज़िंदा करके 8 बार गोली मारना चाहिए, और 2001 मे जिस राज्य-मंत्री को थाने में घुस कर मारा था उसके लिए एक बार और ज़िंदा करके फिर गोली मारना चाहिए. इसके अतरिक्त उन 60 से अधिक मामलों का क्या- जिसमें लुट, हत्या, शोषण, मर्डर, और बलात्कार जैसी घटना शामिल है.
थाने मे घुस कर मंत्री की हत्या एवं 60 से अधिक मामले मे आरोपी होने के बावजूद विकास दुबे, पिछले 19 साल से उत्तर-प्रदेश की सड़कों पर आज़ाद घुम रहा था तब पुलिस वाले गहरी नींद में सो रहे थे क्या ? और आज 8 पुलिस वाले को मार दिया तो पुलिस की नींद अचानक खुल गयी. इस 19 सालों में केंद्र से राज्य तक न जाने कितनी सरकारें आयी, कितनी गयी पर पुलिस महकमा तो वैसे का वैसे बना हुआ था. आज पुलिस वाले की हत्या का आवाज़ ज़ोर से गुंजने लगा तो सरकार ने विकास दुबे के ऊपर 5 लाख का इनाम घोषित कर दिया. लोकतंत्र में इसे - "पुलिसवाले की जान की क़ीमत समझा जाए या आम-आदमी के जान की बेज्जती"
19 साल से जिस अपराधी के ऊपर कार्यपालिका (पुलिस-तंत्र) ने शिकंजा नही कस सकी. क्या उस पुलिस-तंत्र कोविधायिका (नेताओं ) का ग़ुलाम नही मान लेना चाहिए? या अपराधियों को शरण देने वाला बड़ा अपराधी ? पुलिस स्टेशन मेंघुस कर गोली मारने वाले के ख़िलाफ़ क्या एक भी पुलिस वाला गवाही नही दे सका या गवाही देने के बावजूद देश की न्यायपालिका भी विधायिका (नेताओं ) के आगे झुक गयी और वो आज़ाद घुम रहा था.
इस देश के न्यायपालिका की पहचान - "न्याय की वो मूर्ति है, जिसके आँखो पर काली-पट्टी बंधी होती है". इस पट्टी का अर्थ न्यायपालिका का अंधा होना नही होता बल्कि इसका अर्थ होता है - "न्यायपालिका बिना भेद-भव के न्याय करती है, सबूत और गवाह के आधार पर, संविधान और क़ानून के आधार पर".
न्यायपालिका के सामने ठोस सबूत और गवाह पेश करने का कार्य कार्यपालिका (पुलिस-तंत्र) का होता है. तो क्या पिछले 19 साल में कार्यपालिका ने विकास दुबे के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत और गवाह पेश नही किया या उसे पेश करने से रोक दिया गया. कार्यपालिका के आँख के आगे पट्टी नही होता है. वो कभी दबाव में आ कर सबूत बदल देती है तो कभी आरोपी के नाम में जाति तलाशने लगती है. कभी पुलिस कस्टडी में ही फ़ैसले सुना देती है तो कभी बीच सड़क पर.
अपनी ताक़त और मन-मर्ज़ी से फ़ैसले सुना देने के लिए इस देश में "लोकतंत्र" की स्थापना नही हुई थी. फ़ैसले सुनाने का काम तो "राजा" भी करते थे और "अंग्रेज" भी. फिर क्यों ज़रूरत पड़ गयी - आज़ादी की? क्यों आवश्यकता पड़ गयी - लोकतंत्र की और व्यवस्था चलाने के लिए हमने क्यों - लोकतंत्र के तीन स्तम्भों को निर्माण किया.
लोकतंत्र के तीन आधार-स्तम्भ है - विधायिका - जो क़ानून बनाती है, कार्यपालिका - जो क़ानून को लागू करती है और न्यायपालिका जो क़ानून और संविधान के आधार पर इंसाफ़ करती है. आपको यह पता होगा कि - न्यायपालिका के जज भी अपनी कुर्सी पर फ़ैसला सुनाने के लिए नही बैठते हैं बल्कि न्याय के आधार पर इंसाफ़ करने के लिए बैठते हैं. यही कारण है कि - इसे "न्याय-तंत्र कहा जाता है न की "फ़ैसला-तंत्र"
लोकतंत्र के आधार स्तंभ को इन तीन भागो मे इसलिए बाँट दिया गया है कि - कोई एक व्यक्ति राजा की तरह फ़ैसला नही सुना सके और सत्ता एवं ताक़त का बँटवारा किया जा सके. सभी स्तंभों को अपने-अपने कार्य एवं जिम्मेदारियाँ सौंप दिया गया है ताकि - सामाजिक एवं क़ानूनी व्यवस्था को नियंत्रित रखा जा सके.
परंतु, जब कार्यपालिका ही न्यायपालिका का कार्य करने लगे. पुलिस अपराधी को पकड़ने के साथ साथ उसे सज़ा देना शुरू कर दे और जनता इसे इंसाफ़ कहने लगे, ख़ुशी में तलियाँ बजाने लगे तो आप "लोकतंत्र" में नही बल्कि "भीड़-तंत्र" में जीना शुरू कर चुके हैं. गोली मार कर न्याय करने का यह प्रक्रिया (चलन) पुलिस के हाथ से निकल कर कब जनता के हाथ में चला जाएगा इसकी खबर आपको और हमारे रूह को भी नही लगेगी.
"आँख के बदले आँख" और "हाथ के बदले हाथ" की वकालत करने वाले कमज़ोर लोग इस देश की न्याय-प्रणाली और न्याय-व्यवस्था से निराश हो कर हार चुके हैं. वो मान चुके हैं कि -हमारे देश में लोकतंत्र के आधार पर नही बल्कि "भीड़-तंत्र" के आधार पर अब ऐसे ही न्याय होगा. उन्हें न्याय, कोर्ट, संविधान, क़ानून से कोई मतलब नही रहा, वो फ़िल्मी पर्दे की तरह Encounter के लिए "पुलिस" को शाबाशी तो दे रहे हैं पर उसी पुलिस (कार्यपालिका) से इतना पुछने की हिम्मत नही रखते कि - क्या 19 साल में उत्तर-प्रदेश की पुरे पुलिस-तंत्र ने, विकास दुबे के ख़िलाफ़ एक भी ठोस सबूत अदालत में पेश नही कर सकी. अदालत तो अंधी होती है, उसे सबूत मिल जाए तो वो फ़ैसला ज़रूर सुना देगी चाहिए वो किसी के हक़ में हो या उसके ख़िलाफ़.
कार्यपालिका (पुलिस-तंत्र) की इस नाकामी और निक्कमेपन (या आप इसे राजनीतिक दबाव भी कह सकतें हैं) के कारण 8 पुलिस वाले भी मारे गए और विकास दुबे ने इन 19 सालों में कितने हज़ार लोगों के साथ अन्याय, शोषण और लुट-पाट किया होगा. क्या विकास दुबे के Encounter से उन सबको न्याय और इंसाफ़ मिल गया.
सच तो यह है कि - लोकतंत्र में लोग अपनी क़ीमत नही समझेंगे, अपने अधिकर को नही समझेंगे और सत्ता (विधायिका) से, पुलिस (कार्यपालिका) से सवाल नही करेंगे तो यही लोकतंत्र लोगों के "ख़िलाफ़" काम करने लगेगा. लोगों को यह समझना होगा कि - यह गांधी का देश है, यहाँ गांधी के हत्यारे को भी गोली के बदले गोली नही मारा गया था.
जाते-जाते अंतिम बात :-
"A Wednesday" फ़िल्म में आपको नसीरुद्दीन शाह का किरदार पसंद आया होगा पर आप दिल से जानते है कि - सही और सत्य के साथ अनुपम खेर खड़े थे । ये फ़िल्म नही चल रहा है कि --, "किसी चरित्र को Fantasied कर के लोगों से ताली बटोर लिया जाए । अगर ताली ही बटोरने की बात हो तो - 'कबीर-सिंह' में शाहिद-कपूर को भी खूब ताली मिले थे जब वो चाकू के धार से लड़की के इज़ारबंद (नारा) को काटने से लेकर हर प्रकार के घटियापन को प्रस्तुत करता है ।
“जय-हिंद”
अतः हमें जागरुक होना पड़ेगा न कि आश्रित.
टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- (Janghat.blogspot.com)
+91-7903892791, 9334302001


लोकतंत्र सो रहा है, कृपया जगाने का प्रयास ना करें।
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