"INDIA NEEDS SOCIAL NOT EDUCATIONAL TEACHER" - GURU-PURNIMA.

भारत को 'शैक्षिक' नही, 'सामाजिक गुरु' की आवश्यकता


“ भारत” को वैश्विक गुरु बनाने  की इच्छा रखने वाले एवं इसके लिए प्रयास करने वाले सभी भारतीयों को आज “शिक्षक दिवस” (गुरुओं के दिन) पर रूक कर, ठहर कर सोचना चाहिए कि - 135 करोड़ प्रतिभावान लोगों से खचा-खच भरा यह पवित्र-भूमि “भारत” ओलम्पिक के गोल्ड-मेडल से लेकर विश्विद्यालय के रैंकिंग तक और App से लेकर Google Map तक हर जगह पिछड़ क्यों जाता है ? आख़िर क्या कारण है कि - विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का गर्व करने वाले “भारत” को मेट्रो के निर्माण लिए छोटे से देश जापान और 1 Min के videoनिर्माण के लिए पड़ोसी देश चीन के Tik-Tok पर निर्भर रहना पड़ता है. सेना के लिए Helicopter हो या जान-बचाने के लिए बुलेट-प्रूफ़ जैकेट सभी के लिए विदेशी निर्भरता.

क्या हमारे देश में उत्पादन के साधन नही है या हमारे उत्पाद में गुणवत्ता नही है ? खेल-कला, शिक्षा-संगीत, एवं फ़िल्म जगत में भी हम वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट नही कर पाते हैं. 

  इस समस्या की गहराई पर जाने पर आपको पता चलेगा कि - इस समस्या का मूल-दोषी “सरकार” नही बल्कि “समाज” है. सरकारें तो आती -जाती रहती है पर जैसा समाज का चरित्र होगा वैसी ही राजनीति का व्यवहार होगा । रजनीति और समाज एक दूसरे के पूरक हैं. राजनेता भी समाज में ही जन्म लेते हैं और उनकी राजनीति भी मूल-रूप से समाज से ही प्रभावित होती है. समाज ही राजनीति के लिए मार्गदर्शक का कार्य भी करता है क्यूँकि समाज में जिस तरह के परिवर्तन होते है, राजनीति में वैसे बदलाव आसानी से देखे जा सकतें है. 

इसके लिए एक उदाहरण यह है कि - समाज में सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ते ही राजनीति ने भी सोशल मीडिया को स्वीकार कर लिया. आज सारे राजनेता 'Twitter' का प्रयोग करते हैं ।ऐसे कई उदाहरण है, जो यह साबित करते है कि - किसी भी लोकतांत्रिक देश की राजनीतिक दिशा और दशा तय करने में “समाज” की एक अहम भूमिका होती है. यहाँ तक कि - समाज का असर फ़िल्मी पर्दों एवं नाटकों में भी बखूबी देखा जा सकता है. अतः - फ़िल्म को समाज का आईना भी कहा जाता है.

     अब प्रशन उठता है कि - वैश्विक स्तर पर भारत की सफ़लता को समाज से या व्यक्ति से जोड़ कर कैसे देखा जा सकता है ? 
     
इसके लिए सबसे पहले हमें भारत की  सफ़लता और भारत में सफ़ल होने वाले लोगों की प्रकृति पर ध्यान देना होगा. किसी भी राष्ट्र को मिलने वाली सफ़लता सामान्यतः दो स्तर की होती है. 

पहला :- व्यक्तिगत सफ़लता 
दूसरा  :- सामाजिक सफ़लता. 

नाम से ही पता चलता है कि - सामाजिक प्रयासों और पुरे समाज के योगदान से जब किसी व्यक्ति को सफ़लता प्राप्त हो तो उस सफ़लता का श्रेय पुरे समाज को मिलता है, और इसके विपरीत किसी व्यक्ति के निजी (Personal) प्रयासों से प्राप्त सफ़लता उसकी अपनी निजी-सफ़लता कहलायगी. 

इस देश में ख्यातिप्राप्त (Famous) लोगों की सूची उठा कर देख लें. सचिन से लेकर सानिया मिर्ज़ा तक और M.F.हुसैन से लेकर अमिताभ तक, कलाम साहब से लेकर मिल्खा सिंह तक और लता मंगेशकर से लेकर माँझी (माउंटेन-मैन) तक. इन तमाम लोगों की सफ़लता को आप निजी-सफ़लता कह सकतें हैं. इन्हें सामाजिक सफ़लता नही कहा जा सकता है.

ये सभी सफलताएँ, निजी संघर्ष, मेहनत, लगन और निजी प्रयासों का फ़ल है. नवाजुद्दीन के वर्षों का संघर्ष हो या मैरी-क़ौम एवं हिमा दास के तानों से भरे दिन. हर विषम-परिस्थितियों को इन्होंने अपने दम पर झेला और सफ़लता को अपने कदमों तक आने के लिए मज़बूर कर दिया. 
    
स्वभाविक है कि, निजी सफ़लता का प्रतिशत सामाजिक सफ़लता की अपेक्षा कम होगा, यही वजह है कि - हम भारतीय-सफलताओं को उँगलियो पर आसानी से गिन लेतें हैं. 

सामाजिक सफ़लता के मामले में भारत का पिछड़ापन यहाँ के सामजिक-व्यवहार, सहयोग में कमी और मानसिक स्तर पर पिछड़ापन की तरफ़ साफ़ शब्दों में इशारा करता है. एक दूसरे से जीतने की होड़, असफ़लता बर्दाश्त करने की कला का आभाव, प्रोत्साहन की कमी, मनोवैज्ञानिक दबाव, और मानिसक स्तर पर ग़ुलामी इत्यादि ने भारत को सामाजिक सफ़लता से कोसों दूर कर दिया है.      

ऊपर से हमारा समाज “एडिटेड-तस्वीर” की तरह कितना भी चमकता हो परंतु इसकी गहराई में प्रवेश करने पर आपको विसंगतियो का पहाड़ दिखलाई पड़ेगा, जहाँ माता-पिता बच्चों को फेल हो जाने से डराते हैं. शिक्षक उन्हें ‘काले-धन’ वाली नौकरी के प्रति उत्साहित करते हैं. रिश्तेदार, विफलताओं पर अजगर की तरह फूँफकारते हैं. पड़ोसी आपकी नाकामी को अवसर की तरह तलाश करते रहतें हैं. 

हर कोई भीतर से ऐसे ख़ाली बैठा है, मानों आपकी असफ़लता की प्रतीक्षा में  घात लगा कर ही बैठा हो. ऐसी परिस्थितियों में अंदर से घुटन महसूस होती है. लोग क्या कहेंगे? माता-पिता क्या सोंचेंगे? ऐसे प्रशन किसी को भी प्रयास करने से रोक देते हैं. इंसान भीतर से कमज़ोर महसूस करने लगता है. उसे असफलताओं से डर लगने लगता है. नकारात्मकता के भँवर में फँसता हुआ व्यक्ति ख़ुद के सामने और जमाने के सामने हारने लगता है. बाहर से वो कितना भी प्रयास करता दिख रहा हो पर अंदर से वो टूट चुका होता है. सामाजिक नकारात्मकताओं के आगे ‘व्यक्तिगत-प्रयास’ भी कई बार घुटने टेकने लगते हैं. 

समाधान :-

भारतीय सफ़लता का स्तर और संख्या बढ़ाना है तो हमें निजी सफ़लता से सामाजिक सफ़लता की दूरी तय करनी होगी. इस मंज़िल तक पहुँचने के लिए social मीडिया से लेकर सामाजिक परिवर्तन तक हर स्तर पर सुधारात्मक और सकारात्मक नज़रिया अपनाना होगा.

इस हेतु, अभिभावक से लेकर शिक्षक तक और पड़ोस से लेकर समाज तक बहुत ही जागरूक हो कर अपने-अपने ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करना होगा. इस प्रयास को सफल बनाने के लिए सबस पहले तो एक-जुटता चाहिए. 

अभिभावकों की बात करें तो - इन्हें बच्चों के प्रति विश्वास उत्पन्न करना ज़रूरी है, बच्चों को नकारात्मकता से सकारतमकता की तरफ़ ले जाने का प्रयास करना होगा. विषम-परिस्थितियों में उन्हें प्रोत्साहित करना, बच्चों में असफ़लता को चुनौती की तरह स्वीकार करने की आदत सिखलानी ज़रूरी है. बच्चों में आत्म-विश्वास जगाना और उन्हें कुछ अनूठा (Creative) करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा. उनमें यह विश्वास दिलाना होगा कि - “उनका कोई भी प्रयास जीवन का आख़री प्रयास नही हो सकता है” 

शिक्षक की बात करें तो, शिक्षकों को ज्ञानी बनते हुए बच्चों को अपना ज्ञान-थोपने की जगह बच्चों की क्षमताओं के विकास पर ज़ोर देना होगा. बच्चों के हुनर और दिलचस्पी को पहचानते हुए उसे उनकी  रुचि के तरफ़ प्रेरित करना होगा. “शिक्षित होने का सही अर्थ” बच्चों के बीच साझा करना एवं उनकी प्रतिक्रिया जानाना आवश्यक है. संस्कार और व्यवहार के दृष्टि से उसे मज़बूत करना ज़्यादा आवश्यक है. 

शिक्षकों द्वारा आँकड़े जमा करवाना किसी भी बच्चे को शिक्षित करने की पहचान हो ही नही सकती है । दूसरों को हरा कर ख़ुद को जीतने की कला को “विजय” होना कहा ही नही जा सकता है.   

समाज के स्तर पर भी बहुत बड़े बदलाव की आवश्यकता है, क्यूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज का सीधा असर उसके व्यवहारों पर पड़ता है. जब सामुदायिक स्तर पर प्रोत्साहन का माहौल उत्पन्न होता है तो व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता कम होने लगती है और उसे फिर से प्रयास करने का आत्म-बल मिलता है.  
सामाजिक सहयोग की भावना भेद-भाव को भी दूर करती है और सुविधाओं के आभाव में भी मेहनती लोग आगे आने का साहस कर सकतें हैं. अवसरों की समानता (Article-16) की ज़िम्मेदारी भले ही “भारतीय-संविधान” ने लिया हो पर इसकी जवाबदेही तो “समाज” को ही लेना पड़ेगा.  

समाज का एक-जुट प्रयास किसी भी सफ़लता के लिए एक माहौल (Environment) पैदा कर सकते हैं जहाँ व्यक्ति न कवेल आत्म-बल के साथ लक्ष्य की तरफ़ आगे बढ़ सकता है बल्कि उसमें सामाजिक सरोकार की भावना भी जागेगी और वो समानता एवं बंधुत्वता जैसे मूल्यों के प्रति जागरूक भी होगा. 

सामाजिक सफ़लता किसी एक व्यक्ति की निजी-सफ़लता नही होगी जिसका ‘जश्न’ केवल एक व्यक्ति मना सकता है, जिसका लाभ केवल वही उठा सकता है. ऐसी सफ़लता व्यक्ति के भीतर समाज के प्रति एक दायित्व एवं कर्तव्य की भावना भी जगाती है जिससे वो सफ़ल व्यक्ति अपने समाज, पड़ोसी, समुदाय और वंचितो के प्रति उत्तरदायी भी होगा एवं अन्य लोगों के लिए सिर्फ़ प्रेरणा नही बल्कि सहयोगी की भूमिका में होगा. 

      परंतु, हमें यह समझना होगा कि, सामाजिक प्रयास एक “समूह-कार्य”(Team work) की तरह है, जिसमें अभिभावक, शिक्षक, समाज, समुदाय, पड़ोसी, रिश्तेदार सभी को एक-जुट हो कर खेलना होगा. किसी एक खिलाड़ी का नकारतमक व्यवहार आने वाली पीढ़ी को असफलताओं की तरफ़ ले जा सकता है. 

     मुझे देश के एक "सामान्य-अभिभावक" से मिला दीजिए जो कहता हो कि - "या तो मेरा बच्चा भारत के लिए ओलम्पिक में गोल्ड लाएगा या मै उसे जीवन भर बिठा कर खिलाऊँगा." आपको अपने बच्चे से बोर्ड परीक्षा में 95% मार्क्स (एवं एक अच्छी नौकरी) भी चाहिए और भारत ओलम्पिक में गोल्ड क्यों नही लाता इसका दुःख भी होता है. 

      देश की 135 करोड़ प्रतिभा,  जातिवाद, संप्रदायवाद, रंग-भेद, नस्लवाद, भाई-भतीजवाद और निजी नकारात्मकताओं के भँवर से ऊपर उठ कर ही 'खेल से लेकर शिक्षा' और 'संगीत से लेकर कला' तक हर क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर, इस देश के तिरंगे को जल्द ही लहराएगा.

   बेशक, सामाजिक प्रयासों से मिलने वाली सफ़लता का प्रतिशत “निजी-सफ़लता” से हज़ार गुना ज़्यादा होगा.

देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए :-
                                                “जय-हिंद”
टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा
Dr. Mohammad Ali 
Assistant Professor 
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna

सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :-  (Janghat.blogspot.com)
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Comments

  1. नमस्कार।आपका गुरूपुर्णिमा के अवसर पर आर्टिकिल पढ़ा जिसमें महत्वपूर्ण तथ्य अंकित है और सुझाव भी।अभी सद्गगुरूजनो़ और समर्पित शिष्यो़ की सभी जगह कमी है।इसी कारण से आदि गुरू भगवान शंकर, ब्रम्हलीन संत शिरोमणी स्वामी राम कृपालु जी जिनके सानिध्य में मेरा बचपन सेक्षलेकर1978तक की अवधि और ब्रम्हलीन स्वामी शिवानंद तीर्थ के सानिध्य में यदा कदा जाने का अवसर मिला है के प्रति अपनी श्रद्धासुमन समर्पित करता हूं। आपके विचारों को मैं समयानुसार देखा करता हूं। गुरू पूर्णिमा के अवसर पर आपके विचारों को पढ़कर मैं काफी अह्ललादित हूं। गुरू -शिष्य रिस्ता को प्रगाढ़ बनाने में अभिभावकों, समाज और सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है जिसपर ध्यान दिया जाना अपेक्षित है तभी समाज में संत कबीर,संत तुलसीदास, संत रविदास और गुरू नानक जैसे चिंतक और समाज सुधारकों का अवतरण इस धरती पर होगा और सही अर्थों में गुरू शिष्य परंपरा का पुनर्स्थापन हो सकेगा।

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  2. बहुत सुंदर विचार

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  3. Thanku very much sir

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