क्या तेजस्वी यादव का भाजपा-प्रेम "नीतीश कुमार" का तख्ता पलट देगा ?
क्या इस बार बिहार में तेजस्वी यादव कमल के सहारे कुर्सी पर बैठने वाले है ?
बिहार चुनाव में इस 10 दिन के भीतर ऐसे-ऐसे बदलाव बदलाव हुए और गठबंधन बने जो बिहार चुनाव को बहुत ही रोचक और मज़ेदार बना सकता है. इसकी रोचकता का मज़ा लेने के लिए आपको बिहार चुनाव में हुए अब तक के उलट-फेर और भविष्य के सम्भावित फेर-बदल को समझना होगा.
तो, आइए, शुरू करते है - संक्षिप्त परिचय से.....
एक छिपी हुई बात जो अब जग-ज़ाहिर हो चुकी है कि - भाजपा पार्टी नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है पर BJP किसी भी हालत में नीतीश को CM के रूप में देखना नही चाहती है. इस अंदरूनी चाहत को पूरा करने के लिए BJP पिछले एक साल से LJP (चिराग़-पासवान) के सहारे नीतीश पर हमला करवा रही थी. संक्षिप्त बात यह है कि- BJP इस चुनाव में नीतीश (JDU ) के पाले में कम सीट देखना चाह रही थी और चिराग़ एवं अपने खाते में ज़्यादा सीट तभी तो चुनाव के बाद (Post_Election) नीतीश को दिल्ली का रास्ता दिखला कर BJP यहाँ अपना CM स्थापित कर सके.
भाजपा की यह मंशा तभी पूरी हो सकती थी जब NDA में रहते हुए भाजपा एवं उसके सहयोगी दल (जैसे-चिराग़) को अधिक सीट और नीतीश को कम सीट प्राप्त हो. जितना कम सीट पर नीतीश लड़ेंगे उतना अधिक फ़ायदा भाजपा को होगा. अतः भाजपा अपनी मंशा को स्थापित करने के लिए पिछले एक साल से LJP (चिराग़ पासवान) के माध्यम से नीतीश पर दबाव बनवा रही थी ताकि चिराग़ को ज़्यादा सीट मिल सके और चुनाव के बाद बाज़ी पलटी जा सके.
खिलाड़ियों के खिलाड़ी :- नीतीश कुमार !!
भाजपा की यह मंशा जब हमें और आपको पता है तो नीतीश के ‘पेट में तो दांत’ माना जाता है. BJP की इस चाल से नीतीश भी वाक़िफ़ हैं, परंतु नीतीश अब तीसरी बार “पलटू-राम” का ख़िताब लेकर RJD के पास तो जा नही सकतें हैं और बिना कंधे के CM बनना उन्होंने कभी सीखा नही. अतः वो चुनाव तो भाजपा के साथ ही लड़ेंगे पर भाजपा की साज़िश को समझते हुए उन्होंने चिराग़ को ज़्यादा सीट देने से माना कर दिया. उन्हें पता है कि - NDA गठबंधन के अंतर्गत अगर उन्होंने ‘चिराग़’ या किसी को भी सीट दिया तो चुनाव के बाद वो सीट अमित-शाह के जेब में चली जाएगी और नीतीश कुर्सी से दूर होते चले जाएँगे.
अतः नीतीश कुमार ने चिराग़ एवं अन्य को अधिक सीट नही दे कर भाजपा के उम्मीदों/ योजनाओं पर पानी फेर दिया.
भाजपा का दूसरा इक्का :- चिराग़ पासवान (ताश के पत्ते वाला)
अपने पहले मनसूबे में नीतीश के हाथों पटखनी खाने के बाद भाजपा आला-कमान ने ‘LJP’ को दूसरी योजना के तहत इस्तेमाल करते हुए चिराग़ को नया आदेश दिया. इस हुक्म को मानते हुए :- चिराग़ BJP से तो मोहब्बत कर रही है पर बिहार में भाजपा की राजनैतिक पत्नी - “नीतीश कुमार” से तलाक़ ले कर बिहार विधान-सभा चुनाव में लगभग 143 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है.
स्वभाविक है कि - भाजपा के इस आदेश का उद्देश “नीतीश” को कमजोर करना है, अतः यह बतलाने की ज़रूरत नही है कि - LJP (झोपड़ी छाप से) अपने 143 उम्मीदवार वहीं खड़ा करेगी जहाँ नीतीश कुमार अपने तीर का प्रयोग करेंगे, ताकि नीतीश कमजोर हो सके. चर्चा यह भी है कि - ऐसे कई उम्मीदवार जिन्हें भाजपा के कमल से टिकट नही मिल सकाहै उन्हें भाजपा “झोपड़ी” का सहारा दे रही है. अतः बिहार में ‘झोपड़ी’ की जीत को “कमल” की जीत ही मान कर चलें.
(नीतीश का चुनाव चिन्ह - तीर है)
LJP के NDA से निकल जाने के बाद वर्तमान उम्मीदवारी स्थिति :-
बिहार में कुल - 243 सीट हैं
JDU (नीतीश) :- 119 सीट
भाजपा (सुशील) :- 119 सीट
हम पार्टी (माँझी) :- 05 सीट
नोट :- ख़ुद को सन of मल्लाह कहने वाले “मुकेश सहनी” की दाल UPA (तेजस्वी) खेमे में नही गली तो वो पैसे की आँच पर अपनी कुकर लेकर BJP के चूल्हे पर आ चुके हैं. चूँकि, नीतीश ऐसे चूल्हा बदलने वाले लोगों को अपनी सीटनही दे सकतें है. अतः BJP ने अपने 119 सीटों में से 11 सीट “मुकेश सहनी” को दिया है.
भाजपा के चाल में ‘चिराग़’ बुझने वाला है क्या ?
NDA गठबंधन से अलग हो कर चिराग़ इस लड़ाई में ख़ुद जीतने के लिए नही बल्कि ‘नीतीश’ को हराने के मक़सद से उतर रहें हैं. LJP (चिराग़) का स्वतंत्र होकर 143 सीट पर ‘नीतीश के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़’ चुनाव लड़नास्पष्ट रूप से ‘नीतिश-कुमार’ को चोट पहुँचा सकता है. परंतु यह भी सत्य है कि - चिराग़ के candidate अपने दम पर चुनाव जीतने की हिम्मत नही रखते हैं. ऐसे में, यदि चिराग़ के Candidate वोट काट कर “नीतीश” के Candidate कोहरा देने में सफ़ल हो जायंगे तो घाटा तो NDA (BJP+JDU) का होगा.
यहाँ पर एक बहुत बड़ा प्रशन उठता है की - जिस विधान-सभा से JDU (नीतीश) हारेगी वहाँ से जीतेगा कौन ???
क्या BJP ? जवाब :- नही
नही . चूँकि, जहाँ से नीतीश के उम्मीदवार खड़े होंगे वहाँ BJP के उम्मीदवार तो खड़े नही होंगे क्यूँकि दोनो के बीचगठबंधन है. अतः BJP वहाँ से जीत ही नही सकती.
क्या LJP ? जवाब :- नही.
क्यूँकि ,LJP के उम्मीदवार तो ‘नीतीश’ को हराने के लिए खड़ी हुई है वो नीतीश का दलित वोट काटेगी और भाजपा के‘गुप्त-सहयोग’ से BJP वाले स्वर्ण और मोदी वोट काटेगी और नीतीश को हराएगी पर LJP जीतेगी नही.
तो कौन ? जवाब :- राजद का गठबंधन (संभवतः)
यह सत्य तो आपको भी पता है कि - बिहार में मुख्य रुप से दो विरोधियों के बीच चुनाव होने जा रहा है.
पहला :- NDA गठबंधन (नीतीश +BJP+ छोटी पार्टी) (चिराग़ निकल गए)
दूसरा :- UPA गठबंधन (तेजस्वी+ कोंग्रेस+ लेफ़्ट पार्टी)
अब, सामन्य सा गणित है कि - BJP अपने संयंत्र से या LJP की मदद से यदि नीतीश के उम्मीदवार को हराएगी अर्थात्NDA के उम्मीदवार को हराएगी, तो स्वभाविक है कि - UPA गठबंधन का उम्मीदवार अर्थात् तेजस्वी यादव काउम्मीदवार जीत जाएगा.
इसे वोटों की गणित से समझ कर देखिए :-
नीतीश को जो दलित वोट मिलते उसे LJP (चिराग़) काटने का प्रयास करेगी अपने उम्मीदवार खड़ा करके.
नीतीश को जो BJP के स्वर्ण हिंदू के वोट एवं मोदी वोट मिलते वो नही मिलेंगे क्यूँकि BJP अंदर से नीतीश को हराने के इरादे में है.
ऐसी परिस्थिति में नीतीश को जो वोट मिलने वाला था उसमें से कुछ वोट LJP ले जाएगा और कुछ वोट बिहार मेंजो 2 नए गठबंधन बने है वहाँ जाने का ख़तरा हो सकता है. इसका सीधा फ़ायदा UPA गठबंधन को मिलेगा और तेजस्वी यादव बैठे-बिठाए बाज़ी मार सकते हैं.
तेजस्वी के हाथ में कमल का फूल :-
ऊपर लिखे गणित से एक बात तो समझ आती है की BJP नीतीश को कमजोर कर रही है पर क्या उसे यह नही पता कि - नीतीश के कमजोर होने पर RJD या UPA के जीतने की सम्भावना बढ़ती है क्यूँकि चिराग़ तो अकेले दम पर जीतने वाले नही है.
फिर, प्रशन उठता है कि - BJP ने चिराग़ को अकेले दम पर लड़ने क्यूँ कहा ?
पहली सम्भावना :-
क्या भाजपा यह चाहती है कि - नीतीश के JDU को कम सीट आए और उन सीटों पर RJD के उम्मीदवार जीत जाए ?
दूसरी सम्भावना :-
क्या भाजपा को लगता है कि - जहाँ से नीतीश हारेंगे वहाँ से ("पप्पू-यादव+ चंद्र्शेखर आज़ाद) वाला 'PDA' गठबंधन या उपेन्द्र- कुशवाहा एवं मायावती वाला गठबंधन जीत सकता है और चुनाव के बाद अमित-शाह उसे अपने चालाकी से भाजपा से मिला कर अपना CM और अपनी सरकार बना लेंगे.
भाजपा अपने दिमाग़ से पहली सम्भावना की योजना बना रही हो या दूसरी सम्भावना की मगर ज़मीनी हक़ीक़त तो यह है कि -- लड़ाई NDA गठबंधन और UPA गठबंधन में होने वाला है. अतः जहाँ से NDA के उम्मीदवार हारेंगे वहाँ से UPA के उम्मीदवार जीतेंगे. कुछ सीटों में अपवाद के रूप में इधर-उधर हो जाए वो बात अलग है.)
अतः किसी भी सीट पर नीतीश के उम्मीदवार की हार का मतलब NDA की हार और NDA की हार का मतलब UPA की जीत, तेजस्वी की जीत.
लेख के अंत में कुछ प्रशन आपके सामने छोड़ कर जा रहा हूँ :-
प्रशन :- ये तो समझ में आता है कि - BJP पार्टी नीतीश की हार देखना चाहते हैं पर BJP पार्टी तेजस्वी यादव की जीत क्यूँ देखना चाहती है ?
प्रशन :- BJP चुनाव तो नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ना चाहती पर क्या BJP चुनाव के बाद तेजस्वी यादव के साथ सरकार बनाना चाहती है ?
प्रशन :- क्या तेजस्वी यादव चुनाव के बाद अपने सफ़ल उम्मीदवार को लेकर भाजपा के साथ सरकार बनाएँगे और बदले में अपने पिता जी (लालू-प्रसाद ) यादव जी जेल से बाहर निकल सकेंगे.
क्या बिहार में वही होने वाला है, जो हरियाणा में हुआ.
एक बात याद रखें :- BJP सत्ता में आने के लिए कुछ भी कर सकती है और नीतीश के रहते BJP का क़द बिहार में बढ़ना मुश्किल नज़र आता है.
ये लेखक के अपने विचार है :-
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :-
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