बिहार विधानसभा चुनाव में “राजनीतिक-विकल्प” का महत्व

 

      राजद का महागठबंधन, भाजपा का NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन)  चिराग़  का LJP, कोंग्रेस का हाथ और नीतीश के तीर की खबरें सुन- सुन कर ऊब गए हैं तो स्वागत है आपका इस लेख पर, जहाँ हम बिहार की राजनीति में उभर रहे अन्य चेहरों पर बात करेंगे जो जनता के दिलों के साथ-साथ बिहार के दलों को भी प्रभावित कर रही है. 

  Importance of Political Alternative in Bihar Assembly Election


इस लेख की राजनीतिक गहराइयों में जाने से पहले थोड़ी चर्चा 'राजनीतिक विकल्प' (Political Alternative) और “वैकल्पिक-राजनीति” (Alternative Politics) पर ज़रूर होनी चाहिए.

 

 किसी भी देश में वास्तविक धरातल पर लोकतंत्र स्थापित है या नही इसकी जाँच के कई पैमाने हैं. चुनावी-राजनीति उनमे से एक माना जा सकता है. एक लोकतांत्रिक देश में चुनाव के वक़्त जनता के सामने जितने अधिक विकल्प होंगे लोकतंत्र की जड़े उतनी मज़बूत होंगी और तानाशाही के वजूद को हमेशा चुनौती मिलती रहेगी. 

  

     चुनावी राजनीति के माध्यम से लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के क्रम में देश और राज्य में “राजनैतिक-विकल्प” और “वैकल्पिक-राजनीति” दोनो की आवश्यकता है. सरल शब्दों में कहा जाए तो :- “राजनीति में विकल्पों के होने से जनता के सामने अपने मनपसंद उम्मीदवार के चयन की अधिक सम्भावना बनती है और साथ ही “जन-प्रतिनिधियात्मक-लोकतांत्रिक-व्यवस्था” (Representative Democratic System) और अधिक मज़बूत होती है.

    

     कहने को तो चीन में भी चुनावी राजनीति होती है और वहाँ CPC (Communist Party of India) के अतरिक्त UF (united Front) नामक अलग राजनीतिक दल है पर क्या चीन जैसे देशों को लोकतांत्रिक देश कहा जा सकता है, जहाँ सारी शक्ति और सारी तानाशाही Communist Party के हाथ मे केंद्रित हो ? इसी तरह, अमेरिका में भी जो “राष्ट्रपति-पद’ का चुनाव होता है वहाँ जनता के सामने ‘डेमोक्रेटिक-पार्टी’ और ‘रिपब्लिकन-पार्टी’ में से किसी एक को चुनने का स्वतंत्रता होती है, परंतु क्या इस स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक स्वतंत्रता कह सकतें हैं ? यदि किसी जनता को दोनो पार्टी के उम्मीदवार में से कोई भी पसंद नही हो तो ?

 

     यदि भारत की बात करें तो अंग्रेजों से स्वतंत्रा की सफ़लता के श्रेय के नाम पर 1948 के पहले चुनाव से लगभग दो दशक से अधिक तक देश और राज्यों में कोंग्रेस पार्टी का एकक्षत्र राज हुआ करता था. दूसरे सारे विकल्प नाम-मात्र कहे जा सकते थे. भारत में उस दौर के ‘विकल्पहीन-राजनीति’ ने ‘तानाशाही-इंदिरा’ को जन्म दिया और उसी तानाशाह का परिणाम देश ने “अपातकाल” के रूप में देखा. इसके बाद समाजवादी नेता एक-जुट हो कर देश की जनता के सामने एक विकल्प बन कर आए जो देश और फिर राज्य की राजनीति में स्थापित होने लगे.

 

रजनीति का इतिहास :- 

समाजवादी ख़ेमों से टूट-टूट कर कई दल बने जो उत्तर-भारत के राज्यों में न केवल अपनी जड़े जमा चुके हैं बल्कि राज्य की विधान-सभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक जनता के सामने विकल्प बन कर सामने आते है और सफ़लता भी पाते हैं. अन्य राज्यों में कोंग्रेस से ही टूट कर कई नेताओ ने क्षेत्रिय-दल का निर्माण किया. इन दलों और नेताओं ने जनता के बीच अपनी जगह बनाई और जनता के सामने अपने उम्मीदवार खड़ा करते हुए जनता को एक लोकतांत्रिक विकल्प दिया.   

     दूसरी तरफ़ केंद्र की बात करें तो केंद्र में भी समाजवादी-खेमे के अतरिक्त जन-संघ से निकल कर “भारतीय-जनता-पार्टी” का निर्माण हुआ जिसने देश स्तर पर कोंग्रेस जैसी पार्टी के सामने एक विकल्प बन कर खड़ी हुई और पिछले दो लोकसभा चुनाव से जनता ने अपने मतों से इस विकल्प को कोंग्रेस से भी बड़ा बना दिया है.

      साफ़ ज़ाहिर होता है कि - राजनीति में विकल्प के होने से दलों और नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ाता है और जनता को अच्छों में सबसे अच्छा चुनने का अवसर भी मिलता है. बिजनेस की तरह प्रोडक्ट/(नेता) नही पसंद आने पर जनता अगली बार दूसरे विकल्प की तलाश में जुट सकती है. इससे राजनीतिक-विकल्प की महत्ता समझ आती है. परंतु, यदि रजनीति में एक या दो नेता एवं उनके द्वारा स्थापित दल का वर्चस्व हो तो ऐसी रजनीति, विकल्पहीन-रजनीति कहलाएगी. जहाँ नेता एवं दल अपनी तानाशाही का प्रदर्शन करेंगे एवं जनता को अपने हिसाब से इस्तेमाल करेंगे.

 

बिहार के तीस वर्ष 

     बिहार के पिछले 30 साल के इतिहास पर नज़र डालने से आपको कहीं न कहीं विकल्पहीन-रजनीति का ज़रूर अनुभव होगा. जय-प्रकाश नारायण (J.P) के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के विरुध चलने वाली सम्पूर्ण क्रांति के बाद बिहार से कोंग्रेस का वर्चस्व मानो ख़त्म ही हो गया. इसके बाद समाजवादी नेताओं और दलों ने ‘जाति-आधारित-रजनीति’ को अपना मुख्य हथियार  बना कर अपनी जड़े इतनी गहरी के साथ स्थापित कर लिए की आज भी बिहार मे सेफ़ोलोजिस्ट (Psephologist) से लेकर राजनीतिक विश्लेषक (political Analyst) तक अपना आँकलन कहीं न कहीं जाति को सामने रख कर करते हैं. 1990 में जनता दल की सरकार में लालू-प्रसाद यादव ने मुख्य-मंत्री के रूप में राज्य की सत्ता संभला और तक़रीबन 15 साल तक जनता दल फिर राजद (RJD) के रूप में सत्ता पर क़ाबिज़ रहें. ज़ोर्ज फ़र्नांडिस और नीतीश कुमार जैसे उनके आज के विरोधी भी उस वक़्त तक उनके सहयोगी और साथी के रूप में रजनीति करते थे. राजनीतिक-अनबन और विचारों के मतभेद ने नीतीश कुमार की राहें लालू-प्रसाद से अलग कर दिया और फिर नीतीश लालू के प्रतिद्वंदी (Competitor)  के रूप में रजनीति करने लगे.

     जब 2005 में BJP के साथ मिलकर नीतीश कुमार सत्ता में आए तो जनता के सामने इस गठजोड़ का वही पुराना विकल्प था - लालू प्रसाद (RJD). आज 15 साल बाद भी जनता के सामने NDA (भजपा+नीतीश) के विकल्प के रूप में वही RJD है. (पिता के कुर्ते में पुत्र के रूप में).

 

     क्या हम जनता के सामने इसे राजनीतिक विकल्प मान सकते हैं. किसी मतदाता को यदि नीतीश के 15 साल की सत्ता का विरोध करना है तो उसे ‘लालू के पुत्र’ को ही चुनना ही होगा वो चाहे या न चाहे. यहीं पर आ कर ‘लोकतंत्र’ अपनी अस्मिता खो देता है. लोकतंत्र का सही अर्थ है - “चुनने की बेबाक़ आज़ादी” और वो आज़ादी तभी स्थापित होगी जब हमारे सामने चुनने के कई विकल्प होंगे.

 

2020 चुनाव में राजनीतिक विकल्प 

     अतः इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव पर नज़र डाले तो विकल्पहीन रजनीति और चुनने की बाध्यता पर प्रहार करते हुए दो-तीन दल जनता के सामने आए हैं पक्ष और विपक्ष के दाग़ से अलग हट-कर हैं.

      इसमें PDA (Progressive Democratic Alliance) जैसे गठबंधन है जिसमें पप्पू-यादव जैसे मेहनती नेता, चंद्र्शेखर रावण जैसे युवा नेता, SDPI जैसे मुस्लिम-छवि वली पार्टी एवं अन्य छोटी पार्टियाँ हैं. इसके अतरिक्त एक अनय  गठबंधन में पढ़े-लिखे नेता उपेंद्र-कुशवाहा, उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री रही “बहन-मयावती” और AIIM चीफ़ ओवैसी साहब एवं अन्य का जुड़ाव है. इस राजनीतिक विकल्प को मज़ेदार बनाने का काम दो और दल ने किया है. एक तो बिहार के स्थापित नेता रहे “स्वर्गीय राम-विलास” के सुपुत्र “चिराग़ पासवान” ने अकेले चुनाव लड़ने का बिगुल बजा दिया और दूसरी तरफ़ दरभंगा की निवासी और विदेश में अपनी शिक्षा ग्रहण करके “पुलरलस-पार्टी” बनाने वाली “पुष्पम-प्रिया-चौधरी” का नाम सामने आता है.

     Social-Media के सहारे अपनी राजनीतिक शुरुआत करने वाली पुष्पम-प्रिया से आप सहमत हो या नही हो पर जिस तरह से उन्होंने अपनी पार्टी की तरफ़ से पढ़े-लिखे और ज़मीन से जुड़े उम्मीदवार का चयन किया है वो न तो सिर्फ़ क़ाबिले-तारीफ़ है बल्कि बिहार की राजनीति में इसके सकरात्मक परिणाम देखे जा सकते हैं.

      हार-और जीत से ऊपर उठा कर यदि इन पार्टियों का आँकलन किया जाए तो ये छोटी- छोटी पार्टियाँ की बिहार मे गठबंधन करके या स्वतंत्र लड़ते हुए जनता के सामने एक विकल्प तैयार कर रही है जो राजनीतिक-विकल्प के रूप में बिहार और देश की रजनीति को सकारात्मक दिशा देते हुए लोकतंत्र को भी मज़बूत बना रहा है.

      इन दलों के उभरने से युवा, संघर्ष-शील एवं ज़मीन पर काम करने वाले राजनेता जो पैसे और बाहुबल में पिछड़ जाते है उन्हें रजनीति में एक नई उम्मीद की किरण दिखलाई दे रही है.


अंत की शुरुआत :- 

     अंत में यही कहूँगा कि - जैसे IPL की शुरुआत ने क्रिकेटर बनने का सपना पाल रहे युवा प्रतिभाओं को एक मंच और एक सुनहरा अवसर देते हुए जन-जन में लोकप्रिय हो चला है, ठीक उसी तरह बिहार के धरती से उठने वाली इन राजनीतिक विकल्पों के माध्यम से युवा और मेहनत-कश रजनेताओं को भी विधान-सभा और लोकसभा जाने का अवसर भी मिलेगा साथ ही साथ रजनीति को पैसा, बाहुबल और जातिवाद के जाल से मुक्ति भी.

अतः, “राजनीतिक-विकल्प” से जुड़े इस लेख की समाप्ति एक आशावादी बिंदु पर करते हुए आपसे वादा करते कि - फिर मिलेंगे, “वैकल्पिक- राजनीति” पर चर्चा करने के क्रम में. 

 

नोट :- लेख पसंद आया हो तो अपनी राय ज़रूर दें. आपके मशवरा हमें आगे लिखते रहने के लिए प्रोत्साहित करता रहेगा. 

ये लेखक के अपने विचार है :-

Dr. Mohammad Ali

Assistant Professor

Dept. of Philosophy

RLSY College, Bakhtiyarpur.

Patliputra University, Patna

 

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