नीतीश vs तेजस्वी :- दूसरा चरण !!
‘राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा?’
कल बिहार विधान-सभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान 17 ज़िलों में होने वाला है. इस चरण में विधान-सभा के 94 सीटों पर जनता मतदान करते हुए अपने मन-पसंदीदा उम्मीदवार को अपना विधायक बनाएगी. जन-प्रतिनिधियात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था(Representative Democratic System) के अंतर्गत यही विधायक जनता को Represent करते हुए विधान-सभा पहुँचेंगे जहाँ बहुमत दल के नेता बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप राज्य का नेतृत्व करते हुए राज्य की बागडोर सम्भालेंगे.
मेरी नज़र में, इसे लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही समझें कि - “चुनावी-समर में जनता अपने लिए अच्छे विधायक चुनने के बजाए, ‘राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा?’ इस चर्चा पर अपनी उत्सुकता और अपनी ऊर्जा ख़र्च करते है .
ख़ैर, लोकतंत्र में “जनता-जनार्धन" की उत्सुकता और उनकी दिलचस्पी को नज़रंदाज़ कैसे किया जाए?
अतः यह लेख “जनता और उनकी उत्सुकता के नाम ....
लोकतंत्र में जनता का एक मुख्य काम होता है - "सवाल करना". अतः सवाल से शुरुआत करते हैं :-
जिधर देखो एक सवाल ? सरकार किसकी बन रही है ? महागठबंधन या NDA ?, अगला मुख्यमंत्री कौन ? तेजस्वी या एक बार फिर से नीतीश आ रहे हैं ?
नेताओं को “मुख्यमंत्री” बनने का ऐसा सनक चढ़ा हुआ है कि - उपेन्द्र-कुशवाहा अलग गठबंधन के साथ ख़ुद को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर लिए हैं. एक नई-नवेली नेत्री तो ‘मुख्यमंत्री-उम्मीदवार’ के रूप में ही राजनीति में शामिल हुई है. नाम तो पता ही होगा - “पुष्पम-प्रिया”. चिराग़ पासवान भी स्वतंत्र-रूप से चुनाव लड़ते हुए अपने चहरे को 'भावी-मुख्यमंत्री' के रूप में दर्शाना चाहते हैं.
राजद के धुरंधर से धुरंधर नेता भी 'तेजस्वी के ताजपोशी' के आगे नत-मस्तक हैं, जो ऐसा नही कर रहे हैं उन्हें - “एक लोटा पानी” बोल कर “बंगाल की खाड़ी”(जहाँ गंगा विलीन होती है) का रास्ता दिखला दिया जाता है.
नीतीश के ‘कुर्सी-प्रेम’ की कहानी तो ‘महाभारत’ से ज़्यादा चर्चित और “अलिफ़-लैला” से ज़्यादा रोमांचित हैं जिसकी चर्चा करना व्यर्थ है. पटना के सड़कों पर नीतीश ने एक ‘स्लोगन’ लगवाया है :- “नीतीश सबके हैं”. ‘सब’ में तो “कुर्सी” भी आता है. और राजनीति में सबसे पहले कुर्सी ही आता है. क्यूँकि- मिट्टी में मिल जाएँगे- मगर भाजपा में नही जाने की क़समें खाने वाले “बख़्तियारपुर के मुन्ना” ने 10 साल तो भाजपा का दामन पकड़ कर रखा और 2015 में भाजपा के ख़िलाफ़ जनता से वोट ले कर कुर्सी से चिपकने के बाद उसी जनता और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाते हुए - भाजपा से पुनः-विवाह कर लिया.
अब प्रशन उठता है कि - इस बार कौन ?
मोटे- तौर पर देखें तो एक बात पूरी बिहार की जनता समझ रही है कि - मुख्य लड़ाई महागठबंधन और NDA के बीच है. मतलब - नीतीश और तेजस्वी के बीच. मगर बिहार की राजनीति इतना सरल होती तो फिर न जय-प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण आंदोलन से इंदिरा का सिंहासन डोलता और ना ही देश के दो सबसे बड़े दल (कोंग्रेस & भाजपा) बिहार में छोटे भाई की भूमिका में रहती. अतः बिहार की राजनीति के लिए आपको ज़मीनी धूल भी फाँकने होंगे और राजनीतिक किताबों के वर्क(पन्ने) भी पलटने होंगे.
इस बार के चुनाव में, CM की कुर्सी पर, एक तरफ़ तो तेजस्वी यादव बाज़ की नज़र रखते हुए चुनावी सभा में झप्पटा मार रहें हैं और दूसरी तरफ़ नीतीश की तेज़ी को उसी के सहयोगी “भाजपा” ओवर-टेक करने की कोशिश में लगे हुए हैं.
खुले शब्दों में कहें तो - भाजपा पार्टी, नीतीश को मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर करने के लिए कभी “चिराग़-पासवान” के कंधे का प्रयोग कर रही है तो कभी अलग-अलग मोर्चे को खड़ा करके नीतीश के सीटों को कम करवाने पर लगी हुई हैं. कहीं-कहीं तो भाजपा के नेता खुल कर नीतीश का विरोध कर रहें हैं.
भाजपा का दुर्भाग्य यह है कि - पिछले 15 साल से उप-मुख्यमंत्री रहने के बावजूद भी न तो सुशील-मोदी ख़ुद को बिहार के ‘कुर्सी-लायक़’ बना सके और न ही भाजपा के स्वर्ण-मानसिकता ने ऐसे करने में उनका सहयोग किया. नीतीश कुमार ने अपने नेतृत्व में भाजपाई नेताओं को बड़ा-चेहरा बनेने से कहीं-न कहीं रोकते रहें हैं. आज नीतीश पर इसका पलट-वार होने की पूरी सम्भावना है.
अतः निष्कर्ष का एक पहलु तो यह कहता है कि - जहाँ तेजस्वी यादव ‘मछली की आँख’ पर अपना निशाना लगाए हुए हैं वही नीतीश कुमार अपने ही ‘विभीषण’ से उलझे पड़े हैं.
परंतु यह सिक्के का एक ही पहलु है - क्यूँकि - जहाँ आपका राजनीतिक गणित ख़त्म हो जाता है, वहाँ से नीतिश कुमार का ‘सामाजिक-अभियांत्रिका’ (Social Engineering) शुरू होती है. नीतीश कुमार राजनीति के वो खिलाड़ी है जो ‘जोकर’ पटक कर ‘एक्का’ को मात दे दें.
लेख के अगले पहलु में आपसे चर्चा करेंगे कि - इस चुनाव में नीतीश कुमार के लिए “जोकर” की भूमिका कौन निभा रहा है ?
जाते- जाते यह बता दें कि - जिन्हें लगता है नीतीश कुमार के पास जाति (कुर्मी) के नाम पर सिर्फ़ 3 या 4 % वोट है, वो बिहार की राजनीति से उतने ही दूर है जितना - 'चाँद से चकोर' होता है.
अगले लेख की प्रतीक्षा करें.........आँकड़ो के साथ आपके पास आने वाला हूँ.....
ये लेखक के अपने विचार है :-
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :-
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सही पकड़े हो भाई, ये सचमुच दुर्भाग्य ही है कि आजकल चुनाव विधायक या सांसद का नही बल्कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के लिए हो रहा है, और ये सिर्फ बिहार की नही बल्कि राष्ट्रीय परिदृश्य यही हैं। लेकिन यह स्थिति स्वतः उत्पन्न नही हुई है बल्कि बनाई गई हैं।
ReplyDeleteइसको कंपनियों के ब्रांडिंग स्ट्रेटेजी से आसानी से समझा जा सकता है। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी कैंपेनिंग के लिए अब मार्केटिंग प्रोफेशनल्स की सेवाएं लेनी शुरू कर दी है, और इसमें सबसे आगे है भाजपा जिसने पारंपरिक चुनावी गतिविधियों को बिल्कुल बदलकर रख दिया। कंपनियों की तरह राजनीतिक दल भी अब अपने उम्मीदवारों या सांसद/विधायकों की ब्रांडिंग न कर एक मुख्य चेहरे को मार्केट (आम जनता) में स्थापित (पोजीशन) करती है जो 200-250 चेहरों पर खर्च करने से बहुत ही ज्यादा आसान है। इसके अलावा इन चेहरों को स्थापित करने का खतरा (थ्रेट) भी है कि ये शायद कंपनी (पार्टी) ही बदल लें।
लेकिन दुर्भाग्य ये है कि कंपनियां (पार्टीयां) अपने रणनीति में कामयाब हो गयी और अपने लेबल का ठप्पा लगाकर सड़े-गले प्रोड्क्ट (उम्मीदवार) ही बेच रही है और हम आज भी उस क्रीम को लगाकर चार हप्ते में गोरा होने के ख्वाब में दशकों से लगा रहे है।