अपनी तक़दीर और तस्वीर को बदलने की पहल करते "मुस्लिम युवा" - मोहम्मद अली.
आज़ादी से लेकर आज तक इस देश के मुसलमानों ने कई उतार-चढ़ाव भरे दौर देखें और कई चुनौतियों का सामना भी किया है. इसके बावजूद मुसलमानों के अन्दर एक बेहतर जिन्दगी की उम्मीद की “लौ”(रोशनी) हमेशा जलती रही और उनकी आंखों में इसका ख्वाब सजता रहा है.
परंतु, आजादी के इतने अरसे बाद आज देश का मुसलमान कहाँ और किस हालत में खड़ा है, इसे शब्दों में ब्यान करने की ज़रूरत नही है.
अपनी तक़दीर और तस्वीर को बदलने की पहल करते "मुस्लिम युवा" :-
किसी भी समुदाय के समुचित विकास के लिए तीन महत्वपूर्ण शर्तें हैं - शैक्षिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक स्तरों में सुधार । इन तीनो स्तरों का सुधार उस समुदाय को ना केवल सामाजिक रूप से मज़बूत बनाएगा बल्कि उसकी राजनैतिक भागीदारी ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ने लगेगी. जहाँ तक सुरक्षा का प्रशन है - एक आर्थिक और राजनैतिक रूप से मज़बूत समुदाय सामाजिक और धार्मिक तौर पर ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर ही नही सकता है ।
लोकतंत्र में आपकी तादाद (संख्या) ही आपकी असली शक्ति कहलाती है. यही कारण है की - सभी समुदाय ख़ुद को मज़बूत करने के लिए संगठित होने की कोशिश करते हैं. संगठन और दबाव समूह उस समुदाय को राजनैतिक रूप से शक्तिशाली बनाता है.
देश में धर्म, जाति और वर्ग-विशेष के नाम पर संगठित होना, यहाँ तक की “कार्य-रूपी-संगठन” के कई उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं. लोकतंत्र में संगठन के महत्व को संविधान-निर्माता बाबा-साहब भीम-राव अम्बेडकर जी ने भी स्वीकार किया है और उन्होंने “संगठित होने” पर ज़ोर दिया है, अतः समाज में संघर्ष के लिए एवं अपने सकारात्मक हितों को पूरा करने के लिए संगठित होना कभी भी ग़लत नही है.
परंतु अफ़सोस की बात यह है कि - आज़ादी के बाद भारतीय मुसलमानो का संगठन हमेशा से दूसरों को फ़ायदा पहुँचाता रहा है । हमेशा से हो रहा इनका राजनैतिक इस्तेमाल इस बात को प्रमाणित करता है ।
इस देश की “तथा-कथित” धर्म-निरपेक्ष या पंथ-निरपेक्ष राजनैतिक दलों ने मुस्लिम ‘सुरक्षा’ और ‘उनकी-भलाई’ के नाम पर सत्ता की जितनी ‘मलाई’ खाई है उसे गहराई से समझने के लिए भारतीय राजनीति के दोनो ध्रुवों को समझना ज़रूरी है ।
भारतीय राजनीति में आज़ादी से लेकर 1977 तक कोंग्रेस पार्टी के एकाधिकार को उखाड़ने के लिए देश की जनता ने पहली बार “जनता-पार्टी” के मुरार-जी-देसाई को देश को प्रधान-मंत्री बनाया. सत्ता और कुर्सी के लोभ में उसी “जनता-पार्टी” से एक तरफ़ तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) का निर्माण हुआ वही दूसरी तरफ़ देश के विभिन्न राज्यों में कई छोटी पार्टियों का निर्माण हुआ जो “मुस्लिम-वोट” को अपनी जागीर समझने लगे. सर पर टोपी लगाकर और BJP से मुसलमानो को डरा कर ये छोटी- पार्टियाँ मुसलमान के वोट लेते रहे और ख़ुद को मज़बूत कर लिए पर मुसलमानों को “शिक्षा, पैसा और संस्कृति तीनो से दूर रखा ताकि लंबे समय तक मुसलमानों का शोषण किया जा सके.
भारत में “अनुसूचित-जाति और जनजाति” के लिए लोकसभा और विधान-सभाओं में आरक्षित सीट का प्रावधान होने से इन वर्गों की राजनैतिक पहचान बनती जा रही है और हर राज्य एवं समुदाय में इनके लीडर मज़बूती से संघर्ष करते दिखते हैं. परंतु मुसलमानों के वोट को परिस्थिति और भावनाओं के अनुसार विभिन्न दल इस्तेमाल कर लेते है, एवं राजनीति में सत्ता और भागीदारी के नाम पर “अल्पसंख्यक-प्रकोष्ठ” का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है.
आख़िर क्या बात है कि - 16% से अधिक आबादी होने के बावजूद हमें हमारी राजनैतिक हिस्सेदारी नही मिलती है. सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को देखने से पता चलता है कि - आज़ाद भारत के 74 वर्षों में “मुसलमानों” की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती ही जा रही है. “मुस्लिम-समुदाय” शोषितोंऔर वंचितो के आख़री पायदान पर जा चुका है.
रोज़ी-रोटी के लिए मुसलमानों को अपना घर-परिवार छोड़ कर मजबूरी-वश दूसरे शहरों एवं मुल्कों में शहर-दर-बदर होना पड़ता है, अपनी नागरिकता को साबित करने के लिए सड़कों पर आना पड़ता है. कभी मांस खाने के नाम पर तो मांस ले जाने के नाम पर तो कभी अपने फ़्रीज़ में मांस रखने के नाम पर उन्हें बीच सड़क मार दिया जाता है. उस वक़्त ये “तथा-कथित-मुस्लिम समर्थक” पार्टियाँ कहाँ रहती है ?
राजनीतिक भागीदारी (आँकड़े के साथ) :-
मुस्लिम- तुष्टिकरण करने वाले नेता (पार्टी) बड़ी ही चालाकी से मुसलमानों को मुस्लिम-बहुल विधान-सभा और लोकसभा से टिकट दे कर मुस्लिम-हितेशी होने का सबूत पेश करते हैं. बिहार के लगभग 40 % से अधिक मुस्लिम-आबादी वाले 4 लोकसभा सीट होने के बावजूद लोकसभा में बिहार से केवल 2 सदस्य हैं और उत्तर-प्रदेश के 35% से अधिक मुस्लिम-आबादी वाले 13 लोकसभा सीट होते हुए भी लोकसभा में केवल 06 सदस्य वर्तमान में उपस्थित हैं.
आज 18% से अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद उत्तर-प्रदेश के विधान-सभा में एक भी मुस्लिम विधायक सत्ता से जुड़े नही है.
Ø क्या मुसलमान भाई और बहने केवल वोट देने के लिए इस देश में रह रहें हैं ?
Ø क्या आबादी के हिसाब से सत्ता में हमारी भागीदारी नही होनी चाहिए ? क्या हम भी संगठित हो कर अपने वोट से सत्ता और कुर्सी को हिलाने की हिम्मत नही रखते हैं ?
Ø क्या हमें भी राजनीतिक दलों से अपने वोट के हिसाब से सत्ता में अपनी भागेदारी का प्रस्ताव नही रखना चाहिए ?
समाधान की कोशिश :-
इसके लिए मुसलमानों को राजनैतिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से एक हो कर संगठित होना पड़ेगा, शिक्षा से दूर रह कर बनाया गया कोई भी संगठन सार्थक तो हो सकता है परंतु दूसरों के हित के लिए । आज़ादी के बाद भारतीय मुसलमानो का संगठन हमेशा से दूसरों के हित साधता रहा है ।
आज मुसलमानो को आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री - मौलाना अबुल-कलाम आज़ाद को याद कर उनके कर-कमलों पर चलने की ज़रूरत है । शिक्षा से उनका जुड़ाव और उनके व्यक्तित्व को समझने की ज़रूरत है । जब देश बँटवारे की आग से झुलस रहा था और दंगाई वातावरण में देश के लाखों मुसलमान पाकिस्तान की तरफ़ रूख कर चुके थे, ऐसी विषम-परिस्थिति में मौलाना अबुल-कलाम के इंक़लाबी भाषण को कौन भूल सकता है ? उनके अल्फ़ाज़ों की सच्चाई और देश-प्रेम की भावना ने लाखों मुसलमानो को भारत और पाकिस्तान में से ‘भारत’ को चुनने पर विवश किया था । यह जीत केवल मुसलमानो की जीत नही, पूरे भारत की जीत थी. भारतीय प्रेम- सौहार्द और आपसे भाईचारे की जीत थी । इस जीत का श्रेय एक ऐसे व्यक्ति को जाता है जो ख़ुद भी शिक्षित था और शिक्षा की पैरोकर (तरफ़दारी) करता था
साथ ही साथ हमें सत्ता से ज़ुड़ कर अपने लिए नीतियाँ बनाना शुरू करना होगा, कोई और हमारे लिए नीतियाँ क्यूँ बनाएगा? उसे तो केवल हमारे वोट से मतलब है. अपने निजी स्वार्थ से उठ कर एक राजनैतिक मंच बना कर सत्ता से सवाल करना होगा, अपना हक़ माँगना होगा, संघर्ष करना होगा. अपनी मूलभूत सुविधाओं (शिक्षा, स्वास्थ, रोज़गार, सुरक्षा इत्यादि) के लिए संवैधानिक रूप से सड़क पर आना होगा और चुनाव में अपनी एकता का प्रदर्शन करके सत्ता में हिस्सेदारी लेना होगा.
मैं, उम्मीद करता हूँ कि - राजनैतिक रूप से सजग मुस्लिम युवा को इस पहल को आगे बढ़ाना होगा ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी आबादी के हिसाब से सत्ता में अपनी जगह बना सके ताकि देश का मुसलमान राजनैतिक रूप से मज़बूत हो कर अपने जीवन स्तर को बेहतर करते हुए मुख्य-धारा से जुड़ सके.
इक़बाल के इस शे-र’ से अपनी बात को ख़त्म कर रहा हूँ :-
कभी ए, नौ-जवाँ मुस्लिम तदब्बुर भी किया तूने
वो क्या गरदूँ था, जिसका तू है एक़ टूटा हुआ तारा .
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
RLSY College, Bakhtiyarpur
(PATLIPUTRA UNIVERSITY)
Ph:- 7903892791 Email :- ALI2011PF@GMAIL.COM



बहुत ही महत्वपूर्ण पहल जिसकी जरूरत आज के समय में बहुत ही ज्यादा है । जिसके बारे में ख़ासकर मुस्लिम समुदाय को सोचना चाहिए , और एक जुट होकर आगे आना चाहिए । और ये तभी हों पाएगा जब किसी भी प्रकार के निर्णय लेने में मुस्लिम समुदाय के लोगो की भागीदारी होगी । क्योंकि हम सभी जानते है जिनके मुद्दे है वही बेहतर तरीके से उसे समझ सकते है , और उसमे सुधार ला सकते है ।
ReplyDeleteShukriya ☺️
Deleteबहुत ही नेक कार्य सर ,आप जैसे नेक,सामाजिक,और जिंदादिली वयक्ति हो तो समाज के साथ-साथ देश का कल्याण हो जाएगा।👌👌
ReplyDeleteThank you so much
Deleteबिल्कुल सही कहा सर किंतु ये आश्चर्य होता है हमारे मुस्लिम समुदाय में सबसे ज्यादा सभा,काफी लम्बी लम्बी तकरीरें होती है लेकिन लोगो के दिलो दिमाग में क्यों नहीं उतरती है ? दूर दृष्टि वाले अब हमारे समुदाय घोर कमी हो गई है और जो आगे आते भी हैं मात्र 4% ब्राह्मण वाद वाले इतना प्रतारित करते हैं तरह तरह का इल्जाम लगा कर उलझा देते हैं और हमारे समुदाय वाले लोग मजे लेते हैं
ReplyDeleteमें आपका बहुत आदर सम्मान करता हूं मुझे फख्र भी होता रहता हैं आप भी मुझे जानते और समझते हैं में अल्लाह से दुआ गो हूं आप खूब तरक्की करे और इसी तरह समाज को जगाते रहे !
I and Ali have been good friends since 2011 and have been quite connected except these few months. We often shared our agreements as well as disagreements whenever we talked on any such issues...and I often disagreed with him whenever we talked about religion, cast. I do not think when we are talking about education and social empowerment we should divide the under-privileged into further divisions of religion and cast. By doing this, we actually provide a label to the group for others to target us. I strongly believe that whichever community or cast is lagging behind, they are the sole reasons for their underdevelopment. Strategically speaking, it is easier for any government or party to nominate a person from the same community to show that they care for you. When people come along on the basis of development issues, it becomes hard, very hard for any government to deal with. Remember Delhi CAA protest, when it was only a Muslim mob government was blaming them as anti-national, pro-terrorist groups, and even pro-Pakistan. But when academicians, activists, reporters and social organizations got amalgamated with the protest, the government went on sleepless nights because they were running out of the "labels". It was only the COVID19 which saved them from their disastrous future. So let us talk about education, social awareness (rather than religious awareness), and get united all of us without any label except "Democratic Indians". Till we keep on uniting under the banners of regions, religions, cast, community, colour we will only produce opportunistic "Netas" (do not confuse with Leaders) who make their fortune out of our suffering.
ReplyDeleteWill discuss about it at next meeting
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