देश के गम्भीर मुद्दों को कहाँ ले जाएगा “जातिगत-जनगणना” का जिन्न - मोहम्मद अली.
इस धरती पर “मनुष्य” के रूप में जन्म लेते ही हमें एक पहचान (Identity) मिल जाती है, यह पहचान जानवर होने की पहचान से अलग होती है. पर क्या इस ‘एक-पहचान’ के रूप में हम अपनी ज़िंदगी गुज़ार लेते हैं ?
जन्म होते ही “लिंग” के रूप में दूसरी पहचान और उसके कुछ दिन बाद “नाम” की पहचान मिलती है, फिर राष्ट्रीयता की पहचान, फिर धार्मिकता, जातीयता, भाषा, बोली, रंग-रूप, पहनावा और न जाने किन-किन पहचानों को एक साथ समेट कर हम अपने सामाजिक ज़िंदगी में बढ़ते जाते है.
देश के गम्भीर मुद्दों को कहाँ ले जाएगा “जातिगत-जनगणना” का जिन्न
हम “पहचान” से जुड़े कई पहलुओं को नज़रंदाज़ करते हुए अपने व्यक्तिगत जीवन में आगे बढ़ते हैं परंतु सामाजिक परिस्थिति और आवश्यकताओं के अनुरूप वो पहचान वक़्त-दर-वक़्त हमारे सामने आती रहती है.
इसे एक उदाहरण से समझते हैं :-
भारत और श्रीलंका के बीच खले गए क्रिकेट मैच में एक बिहारी व्यक्ति और मराठी व्यक्ति स्टेडीयम में एक साथ बैठ कर अपनी भारतीय पहचान को उजागर करते हुए, भारत के जीत की दुआ करत है, मगर जब बिहार और महराष्ट्र के बीच क्रिकेट मैच होता है तो वही दोनो व्यक्ति खुद की पहचान भारतीय रूप में नही बल्कि बिहारी और मराठी रूप में करते हुए अपने अपने राज्य के जीतने की प्रार्थना करने लगता है.
एक जैसे लक्ष्य को पूरा करने का उद्देश रखने वाले विभिन्न समुदाय के लोग भी आपस में एक “वर्ग” का निर्माण कर लेते हैं. जैसे - विद्यार्थियों का वर्ग, मज़दूरों का वर्ग, शिक्षकों का वर्ग, इत्यादि. इन वर्गों में एक से अधिक धर्म, जाति, सम्प्रदाय, रंग, लिंग और क्षेत्र के लोग शामिल होते हैं पर ये सभी अपनी अलग पहचान रखते हुए भी एक ही वर्ग के अंतर्गत आते हैं, क्यूँकि इनका लक्ष्य एक ही होता है.
इसी वर्ग के अंतर्गत जब रंग, जाति, लिंग या क्षेत्र के आधार पर किसी के साथ भेदभाव, दुर्व्यवहार या शोषण होता है तो शोषित वर्ग इसी वर्ग के अंदर एक नया वर्ग बना लेते हैं. इसी तरह हमारे समाज में सदियों से हो रहे शोषण ने भारतीय समाज को धर्म के अंतर्गत जाति और भी उप-जाति के आधार पर वर्गीकृत कर दिया है.
जाति और कार्य के आधार पर खुद को दूसरे से “श्रेष्ठ” मानने और दूसरी जाति (अन्य) का तृस्कार करने की मनोवृति ने समाज को “तथा-कथित” अगड़े और पिछड़े वर्ग में बाँट दिया है. इस सामाजिक ग़ैर-बराबरी ने “पिछड़े-वर्ग” की प्रतिनिधितित्वता (Representation) को कम करते करते उसे हाशिए (side-line) पर ले गए.
इस पूरी प्रक्रिया ने समाज के स्वरूप का ऐसा विनाश किया कि - कुछ वर्ग (जाति) के पास सारी सुविधाएँ (शिक्षा, अर्थ, स्वास्थ, राजनीति, सांस्कृति) आती चली गयी और कुछ वर्ग जीने के मूलभूत सुविधा से भी वंचित होते चले गए.
भारतीय संविधान ने क्या किया ?
अंग्रेजों के शोषण से आज़ादी मिलने के बाद देश को संविधान से चलाने का फ़ैसला लिया गया. इस सामाजिक असमानता को ख़त्म करने के लिए संविधान ने “सामजिक न्याय” की स्थापना का सूत्र दिया.
सामजिक न्याय क्या है ?
“सामाजिक-न्याय” वह स्थिति है, जहाँ समाज के सभी वर्ग (सामाज़िक, राजनैतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक) सभी स्तर पर समान अवसर को पाने के योग्य हो सके. “सामाजिक-न्याय” के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए - “समाज के हर वर्ग/समुदाय को प्रतिनिधित्वता () का समान अवसर मिलना चाहिए. प्रतिनिधित्वता का समान अवसर ही समाज में “सामजिक न्याय” स्थापित कर सकता है.
प्रतिनिधित्वता का अवसर कैसे मिलेगा ? - जवाब - आरक्षण
इस ग़ैर-बराबर वर्तमान समाज में “पिछड़ो” को प्रतिनिधित्वता का अवसर देने के लिए “आरक्षण” का जन्म हुआ.
आरक्षण का उद्देश्य :- आरक्षण एक अवसर है, जो पिछड़ो को इसलिए मिलता है ताकि उनका वर्ग/ उनका समुदाय/ उनका समाज, इस अवसर से लाभ पा कर अपनी प्रतिनिधित्वता को बढ़ा कर उन तक पहुँच सके जो पहले से ही हर जगह अपनी प्रतिनिधित्वता क़ायम कर चुके हैं. जब पिछड़े वर्ग की प्रतिनिधित्वता या पहुँच उनकी आबादी के अनुसार वहाँ तक चली जाएगी तब हम समाज में “सामजिक-न्याय” की स्थित पर पहुँच जाएँगे.
आरक्षण के उद्देश और भारत में आरक्षण के पुरे खेल को समझने से पहले इस उदाहरण को समझ लेते हैं :-
एक राजा के पास तीन रानियाँ है और उसके 100 पुत्र है. राजा के पास 100 महल है. उसे अपने महलों का बँटवारा अपने पुत्रों के बीच करना है :-
पहली रानी से - 22 बच्चे हैं - राजा ने 22 बच्चों को 22 महल दिया.
दूसरी रानी से - 52 बच्चे हैं - राजा ने 52 बच्चों को 27 महल दिया
तीसरी रानी से- 26 बच्चे हैं - राजा ने 26 बच्चे को 51 महल दे दिया.
क्या राजा ने अपने बच्चों के साथ न्याय किया ? क्या राजा ने अपने राज्य में “सामजिक-न्याय” स्थापित किया. क्या राजा के पुत्रों कि आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनैतिक स्थिति एक जैसी होगी या इनमे भेद-भाव होगा ?
उदाहरण से वास्तविकता की तरफ़ बढ़ते है:-
ऊपर लिखी राजा की कहानी ही इस देश की सच्चाई है. इस कहानी में पहली रानी के जो 22 बच्चे हैं, वो SC और ST की 22.5% आबादी है, जिसे अम्बेडकर जी के प्रयासों से 22.5% आरक्षण मिला हुआ है. दूसरी रानी के 52 बच्चे हैं, जो OBC कहलाते हैं, इन्हें 1992 में मंडल कमीशन लागु कर के सिर्फ़ और सिर्फ़ 27% आरक्षण मिला हुआ है. तीसरी रानी के 26 बच्चे हैं जो इस देश के उच्य-वर्ग(Hindu+Non-Hindu) हैं जिन्हें 51% सीट की खुली छूट मिली हुई है.
अब आप तय करें कि - किसको कितना मिला किसके साथ न्याय हो रहा है और किसके साथ अन्याय.
यहीं से शुरू होता है - जातीय-जनगणना की माँग ?
जातीय जनगणना की पूरी कहानी, इसके पीछे के सामाजिक एवं राजनैतिक दांव को आसान-भाषा में समझने के लिए - अगले लेख की प्रतीक्षा करें.
Reference with Data :- (Picture अभी बांकी है, मेरे दोस्त....)
आज़ादी मिलते ही भारतीय संविधान ने SC(अनुसूचित जाति) और ST(अनुसूचित जनजाति) की बदतर हालत देखते हुए उनकी आबादी के अनुसार उन्हें 22.5% आरक्षण दे दिया.
परंतु आज़ादी के 30 वर्षों बाद भी देश में जाति एवं वर्ग के आधार पर समाज में लगातार ग़ैर-बराबरी बढ़ती जा रही थी और OBC (अन्य-पिछड़ी जातिको ) की स्थित बद-से बदतर होती जा रही थी. ऐसी स्थित में मुरार जी देसाई के प्रधानमंत्री -काल में Bindheshwari Prasad Mandal की अध्यक्षता में "मंडल-कमीशन" बनाया गया इसके अंतर्गत FEB 1980 में पुरे देश में (405 district) सामाजिक और आर्थिक सर्वेक्षण (socio-economic field survey) करवाया गया.
इस सर्वे के अनुसार :-
"The Mandal Commission concluded that India's population consisted of approximately 16 percent non-Hindus, 17.5 percent Brahmans and "forward castes," 44 percent "other backward classes," and 22.5 percent scheduled castes and tribes. However, since the 16 percent non-Hindus presumably included approximately the same proportion of "other backward classes" as did the Hindus (i.e., another 8%), the total proportion of "other backward classes" (Hindu and non-Hindu) came to 52 percent (44% + 8%) of India's population."
इस आधार पर मंडल कमीशन ने कहा कि - देश की सभी सरकारी पदों/नौकरी में 52% OBC आरक्षण मिलना चाहिए. परंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को ग़लत मान कर ऐसा करने से इनाकर कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यूँ किया ?
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा इसलिए किया, क्यूँकि - भारतीय संविधान ने SC+ST समुदाय को 22.5% आरक्षण दे रखा है. यदि मंडल कमीशन के अनुसार OBC को 52% आरक्षण दे दिया जाए तो देश में कुल 74.5% आरक्षण हो जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि :- देश में 50% से अधिक आरक्षण देना संविधान की धारा 15(4) और 16(4) का उलंघन माना जाएगा. अतः आरक्षण की सीमा को 50% के अंतर्गत ही रखा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को मानते हुए - 52% OBC को सिर्फ़ 27% आरक्षण देने का विकल्प सामने आया.
1980 के मंडल कमीशन (27% OBC आरक्षण) को देश में लागू करने में 10 वर्ष से ज़्यादा का वक्त लग गया. 07 August 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री "विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P.Singh) ने इसका एलान देश की संसद में किया और फिर 2 वर्ष बाद 16 November 1992 को देश की सुप्रीम कोर्ट ने OBC के 27% आरक्षण को स्वीकार करते हुए पुरे देश में लागू किया.
साथ में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण बातें भी कही -
Ø देश में (SC+ST+OBC) आरक्षण 50% से अधिक नही होगा.
Ø कोई भी जाति/वर्ग, “OBC-आरक्षण” का लाभ अपने “सामाजिक-पिछड़ापन” के आधार पर पा सकेगा. ध्यान दें, यहाँ आर्थिक पिछड़ापन की बात नही है, क्यूँकि आरक्षण का आधार हमेशा से सामाजिक-पिछड़ापन होता आया है, आर्थिक कभी नही.
Ø OBC जाति से आने वाले “Creamy-Layer” के लोग, इस 27% आरक्षण का लाभ नही उठा सकते हैं. (“Creamy-Layer” की सीमा राज्य अपने हिसाब से तय करत है)
जाते-जाते रोचक बात और आपके सामने एक सवाल :-
देश के प्रधानमंत्री रह चुके, “नरसिम्हा-राव” ने Sep 1991 में "आर्थिक-पिछड़ापन" के आधार पर तथाकथित उच्य जाति (स्वर्ण-जाति) को 10% आरक्षण देने का फ़ैसला किया था, परंतु "सुप्रीम-कोर्ट" ने इस फ़ैसले को लागू नही होने दिया और कहा की - देश में 50% से अधिक आरक्षण नही हो सकता है. यह संविधान के Article 15(4) और 16(4) का उलंघन माना जाएगा.
परंतु आपको पता होगा कि - वर्तमान प्रधानमंत्री ने 72 घंटे में ही देश में 10% स्वर्ण-आरक्षण लागू कर दिया और आज भी इसका पालन हो रहा है.
ऐसा कैसे हो सकता है ? सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी के फ़ैसले को ग़लत साबित क्यूँ नही किया.
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अगले लेख की प्रतीक्षा करें...............
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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें
धन्यवाद ।
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College
Patliputra University, Patna
सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :- (Janghat.blogspot.com)



अति सुंदर लेख सर आप तो तर्क के साथ जबाब दे रहे है
ReplyDeleteधन्यवाद. साझा कर दें ताकि अन्य साथियों को भी पढ़ने का अवसर मिल जाए.
Deleteबहुत अच्छे , आजकल कुछ लोगो में आरक्षण को लेकर बहुत ही नकारात्मकता भरी हुई है , ख़ासकर युवाओं में । जब भी आरक्षण की बात आती है वो(उच्च वर्ग) इसे भेदभाव के रुप में देखते है । वे कभी इस रूप में सोच नही पाते कि बराबरी का दर्जा देने की लिए जिनके पास संसाधन पहले से उपलब्ध है , उनपे काम करने की बजाय जिनके पास कमी है उसपे काम किया जा रहा है/ किया जाना चाहिए । आशा करती आपके इस लेख द्वारा उन्हे ये समझने में मदद मिले।
ReplyDeleteThank you for this article
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