The Best Teacher teaches from the Heart, not from the Book
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताए"
कबीर के इस पंजाबी दोहे को यदि इस्लाम धर्म के संदर्भ में व्याख्या करें तो इसका भाव कुछ इस तरह होगा कि - "एक बच्चे को मस्जिद और मदरसे में से एक को बचाने के लिए दौड़ना पड़े तो वो , मदरसे की तरफ दौड़ते हुए अपने अल्लाह से कहेगा कि - "ए, अल्लाह मुझे माफ करना मैं "तेरे घर"(मस्जिद) से पहले मदरसे की तरफ जा रहा हूं क्योंकि मुझे अल्लाह और अल्लाह के घर का सही इल्म (ज्ञान) इसी मदरसे और मदरसे के उस्ताद (गुरु) से मिला है।
भारतीय दर्शन में ईश्वर के ज्ञान और उसके प्रमाण (वजूद) को जिस वेद (ईश्वरीय - वाणी) के द्वारा साबित किया गया है, उस वेद का ज्ञान गुरु के द्वारा ही मिलता है।
इस्लाम धर्म की सबसे पाक किताब और ईश्वरीय वाणी -"कुरान" जो इस्लाम के आखरी पैगंबर पर अवतरित हुईं थी उसका पहला अल्फाज़ है - "एकरा" अर्थात् - "पढ़ो" । पढ़ने और सीखने के महत्व को धर्म से लेकर समाज तक, और प्राचीनता से लेकर आधुनिकता तक सबने स्वीकार किया है ।
आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य के जीवन के प्रथम 25 वर्ष को "ब्रह्मचर्य " में रखा गया जिसके अंतर्गत छात्रों को गुरु के सानिध्य में रहते हुए आने वाले जीवन को सुगम बनाने की कलाओं को सीखना होता है, तभी वो छात्र अपने जीवन के अन्य सभी आश्रमों (गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी आश्रम ) को सुगमता के साथ निर्वहन कर सकता है । आज आश्रम व्यवस्था और गुरुकुल की परंपरा खत्म हो चुकी है . २१वी सदी में पढ़ने और सीखने के कई साधन हो गए है । Google से लेकर You Tube, Wikipedia से लेकर Enciclopedia तक जानकारियों का भरमार है ।
ध्यान दें : -
Information - Knowledge - Understanding -
शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे अनुभवी साथी इस बात को बखूबी समझते होंगे कि - जानकारी प्राप्त करना और ज्ञान हासिल करने में बहुत अंतर है । किसी चीज़ को "जानने" और उसे "समझने" में बहुत अंतर है। जिस तरह नैतिकता से जुड़ी किसी बात को सुन लेना और उसे स्वीकार करते हुए अपने ज़िंदगी में अपना लेना ये दो अलग चीज़ है, उसी तरह जानकारी हासिल करना और ज्ञान अर्जित करना दो अलग बात है ।
सामान्यतः, छात्र जानकारी (Information) पा लेना को ज्ञान (Knowledge) प्राप्त कर लेने की भुल समझ लेते हैं । परंतु यह सत्य नही है। जानकारी सिर्फ़ एक जानकारी होती है । वो एक "वक्तव्य" (Statement) की तरह होता है । इसके सत्य और असत्य दोनों होने की संभावना हो सकती है । जब किसी जानकारी को "तर्क" के सहारे "सत्यता" की कसौटी पर जांचते हैं, तब उसके सत्य और असत्य होने की प्रमाणिकता का पता चलता है । इसके लिए जानकारी के स्रोत, एवं उससे जुड़े सभी तथ्यों के हर पहलु को जांचने की आवश्यकता पड़ती है । इस संदर्भ में भारतीय से लेकर पाश्चात्य दर्शन तक विभिन्न दार्शीनिको और शिक्षाविदो ने विभिन्न तरीके बतलाए हैं ।
किसी वक्तव्य (Statement) की सत्यता को जान लेने के बावजूद भी उसे "ज्ञान" समझ लेना उचित नही है , बल्कि उसे अपने दैनिक जीवन में अपनाना सबसे जरूरी है । इसके लिए आपको उस "सत्य" पर भरोसा भी करना जरूरी है और आपके अंदर नैतिकता होना भी जरूरी है । साथ ही साथ उस सत्य को साथ ले कर चलने का साहस भी होना चाहिए ।
वो तमाम लोग जो बड़े बड़े पदों पर विराजमान हो कर "भ्रष्टाचार की गंगा" में नहा रहे हैं, क्या उन्हे सत्यता और नैतिकता की जानकारी नहीं है ? क्या उन्होंने गांधी से अंबेडकर तक, बुद्ध से महावीर तक और मंडेला से मार्टिन लुथर किंग तक को नहीं पढ़ा है ? उन्होने नैतिकता, ईमानदारी और सत्यता को पढ़ा भी है, जाना भी है, पर उन्हे समझा नही है , उसे स्वीकारा नही किया और अपने जीवन में अपनाया नही ।
क्या हम इन "तथा-कथित डिग्रीधारी" को "ज्ञानी" कह सकते हैं जिन्होंने किताबी जानकारी लेकर बड़े-बड़े पद तो हासिल कर लिया है, जीवन के तमाम सुख-सुविधाएं तो पा लिया है, परंतु ऐसे लोग न अपने पद के प्रति जिम्मेदार हैं न अपने कार्यों के प्रति ईमानदार हैं और न ही अपने पढ़ाई के वफादर हैं । इन पढ़े लिखे महा - मूर्खो से बेहतर तो वो अनपढ़ इंसान है जो अपने तर्क-शक्ति और नैतिकता के आधर पर सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखता है ।
वो कहते हैं ना -
"दुनिया बुरे इंसानों से बुरी नही है , बल्कि अच्छे इंसानों के चुप रहने से है"
नन्हे-मुन्हे बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?, मुट्ठी में है तकदीर हमारी.... इसी प्रसिद्ध गीत के तर्ज पर आज दुनिया की तमाम किताबे और जानकारियों का भंडार इंसान की मुट्ठी में कैद है । परंतु सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य यह है कि - इन जानकारियों को आज के बच्चों और युवाओं के सामने किस तरह पेश किया जा रहा है ? आधुनिकता और तकनीक ने ज्ञान का भंडार हमारे सामने परोस दिया है पर इन बिखरे हुए ज्ञान को समेटने की ज़रूरत है, इन्हे क्रमबद्धता से सजाने की ज़रूरत है । इन जानकारियों और किताबी ज्ञान को व्यवहारिकता से जोड़ कर बच्चों के सामने पेश करने की ज़रूरत है ........ और यहीं पर एक शिक्षक की भुमिका समझ आती है । शिक्षक वर्षो से समाज निर्माण के इस कार्य को करते आ रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे ...........
आज फेसबुक , whatsApp और YouTube के दौर में कुछ लोगो को ऐसा भ्रम हो गया है की - अब छात्रों को शिक्षक की क्या ज़रुरत है मगर सच तो यह है कि - समाज और बच्चों को शिक्षक की सबसे ज्यादा जरूरत आज के दौर में है, जो उसे सही और गलत के बीच के फर्क को समझा सके, उसे Fake Information के जाल में फंसने से रोक सके, उसमे नैतीकता का बीज बो सके, उसके ज्ञान को व्यवहारिकता से जोड़ सके, आने वाली पीढ़ी को स्कारत्मकता से जोड़ सके तभी हम एक सुंदर, शांत और सहिष्णु समाज की कल्पना कर सकते हैं । एक समाज निर्माता और एक देश - निर्माता के रुप में शिक्षक की ज़रुरत आज सबसे ज्यादा है । यदि ऐसा नही हुआ तो गलत और झूठी जानकारियां न सिर्फ़ बच्चों के भविष्य को बल्की समाज और देश के भविष्य को भी अंधकार में ले जाएगी ।
सच पूछें तो शिक्षक बच्चों के ज्ञान में वृद्धि नही करते है, बल्की उनके ज्ञान को प्रासंगिक और व्यवहारिक बनाने का कार्य करते है । शिक्षक की भुमिका उस कुम्हार की तरह है जो गीली मिट्टी में ही "घड़े" के आकर को देख लेता है और अपने हुनर से उसे घड़ा की आकृति में ढाल देता है । उस गीली मिट्टी को भी नही पता होता है कि - वो "घड़ा" बनने वाला है या "प्याला" मगर कुम्हार को उसका भविष्य पहले दिख जाता है । ठीक उसी तरह एक बच्चे का भविष्य "शिक्षक" को पहले ही दिख जाता है । इस क्रम में शिक्षक एक "मूर्तिकार" की तरह है जो मूर्ति को "देवता" भी बना सकता है और "दानव" भी । शिक्षक बच्चों के भविष्य को मूर्तिकार की तरह तराशता है और उसे एक सुंदर भविष्य देता है ।
एक शिक्षक के रुप मैं यही कभी नही सोंचता कि - मैं बहुत ज्ञानी हूं और बच्चों को कुछ नया ज्ञान दे रहा हूं । मैं तो यह सोंचता हूं कि - आज बच्चों से क्या नया सीखा ? ये सीखते रहने का गुण ही मुझे अच्छा शिक्षक बनने में हमेशा मदद करता है और करता रहेगा ।
ब्रैड हेनरी के शब्दों में, "एक अच्छा शिक्षक आशा को प्रेरित कर सकता है, कल्पना को प्रज्वलित कर सकता है और सीखने के प्यार को बढ़ा सकता है।" "हेनरी" के शब्दों को गहराई से समझें तो -- एक छात्र के ज़िंदगी में नकारात्मकता और संघर्ष के दौर में "आशा" ही किरण ही उसे स्कारत्मकता की तरफ ले जाएगी। अपने देश और समाज के सुंदर भविष्य की कल्पना एक कल्पनाशील छात्र ही कर सकता है और सीखने के प्रति प्यार ही उसे जीवन के अंत तक कुछ नया सीखने के प्रति प्रेरित कर सकता है ।
शिक्षा दुनियां की एक मात्र ऐसी पूंजी है , जिसे जितना अधिक खर्च करेंगे उतना अधिक बढ़ता जाएगा । रुपए - पैसा, जमीन - जायदाद सब बांटने से कम हो सकता है पर शिक्षा कम होने के बजाए बढ़ता जाता है । शिक्षा एक - मात्र ऐसी "दौलत" है जो न तो हमसे कोई छीन सकता है और न ही बाज़ार में मनचाहे कीमत पर खरीद सकता है , उसके लिए तो सम्मान के साथ झुकना होगा चाहे वो राजा हो या रंक.
यही कारण है कि - अंबेडकर जी ने - "शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था जो इसे पी लेगा वो शेर की तरह दहाड़ेगा । गांधी ने स्त्री शिक्षा पर भी जोर दिया है। एक स्त्री को शिक्षत करना कई पीढ़ी और कई परिवार को शिक्षित करने के बराबर है ।
अपने लेख का अंत सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के इन पंक्तियों से कर रहा हूं कि -- - यदि शिक्षा को "सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दिया गया तो, लोकतंत्र में किए जाने वाले सभी प्रयोग असफल रहेंगे ।
इसलिए, देश, समाज और लोकतंत्र को ज़िंदा रखना है तो - शिक्षा और शिक्षकों को सम्मान देना होगा .
धन्यवाद .
Dr Mohammad Ali
Assistant professor
Ram Lakhan Singh Yadav college
Patliputra University, patna.
7903892791
ali2011pf@gmail.com.


Nice 🥰❤️
ReplyDeleteHappy teacher's day sir
उत्तम लेखनी
ReplyDeleteNice sir
ReplyDeleteHappy teacher's day
Outstanding line happy teacher's day Ali sir 💐
ReplyDelete💐💐💐💐
ReplyDeleteVery nice sir
ReplyDeleteActually this article make us understand about the value of teachers n how we have to respect our teachers
Very nice😊
ReplyDeleteअत्यंत उम्दा लेख ,शानदार सर , मुझे अपने पीएचडी टॉपिक के आब्जेक्टिव नज़र आए।
ReplyDeleteBhout achche likhe ho happy Teachers day's
ReplyDeleteHappy teacher's day sir
ReplyDeleteबेहतरीन लेख
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