मन-के-हारे- 'हार' है - मन-के-जीते- 'जीत'......
भूमिका (Background)
खुश रहना का प्रयास :-
इस नए साल की शुरुआत करते हैं - एक बेहतरीन फ़ीलिंग से, एक ऐसे ख़ुशनुमा एहसास से जिसे हर कोई हासिल करने की तमन्ना रखता है. ज़िंदगी की भाग-दौड़ हो या पैसा कमाने की होड़, सेहतमंद रहने की मशक़्क़त हो या कामयाबी हासिल करने की चाहत, किसी को पाने की लालसा हो या किसी के साथ ज़िंदगी गुज़ारने की तमन्ना, सारी मेहनत और सारी कोशिशों के पीछे एक ही मक़सद होता है :- “कैसे खुश रहा जाए ?”
आइए, लेख की शुरुआत एक फ़िल्म के सारांश से करते हैं :-
सन 2005 में “इरफ़ान-खान” की एक बेहतरीन फ़िल्म आई थी - “रोग”. इस फ़िल्म की सबसे ख़ास बात यह थी कि - फ़िल्म में ‘इरफ़ान खान’ एक लड़की की तस्वीर देख कर उससे प्यार करने लगते हैं, जिसका वास्तविक दुनिया में कोई वजूद नही है. उसके प्यार में खुश रहने वाले 'इरफ़ान' (hero) के ज़िंदगी में दुःख, तकलीफ़ और परेशानी तब शुरू हो जाती है, जब उसे पता चलता है कि - "उसकी कल्पना वाली लड़की का वास्तविकता में वजूद है"
(Great Power Comes with Great Responsiblity)
“खुश रहना” और अपनी ख़ुशी को बरकरार रखना जितना आसान दिखता है, उतना है नही. दुनिया की तमाम सुख-सुविधाएँ को हासिल करने के पीछे का एक ही मक़सद होता है - “ख़ुशियाँ पाना और उन ख़ुशियों को बनाए रखना".
ख़ुशियाँ तलाशने और ख़ुद को खुश रखने के लिए, लोग कभी संगीत का सहारा लेते हैं तो कभी खेल का. कोई दुनिया की सैर कर के अपने लिए ख़ुशियाँ समेटना चाहता है तो कोई घर पर आराम फ़रमा कर. कोई ज़रूरतमंदों का सहयोग कर के ख़ुशियाँ बटोरना चाहता है तो कोई पैसे खर्च करके. ये तमाम कोशिशें, इंसान ख़ुद को खुश करने के लिए करता रहता है. शिद्दत से की गई इन कोशिशों से इंसान ख़ुशियों के कुछ लम्हों को अपने दामन में ज़रूर समेट सकता है पर कुछ ही पल गुज़ारने के बाद, उसका लगातार खुश रहने का भ्रम टूट जाता है.
आज से 2500 साल पहले महात्मा बुद्ध ने संसार में व्याप्त (मौजूद) दुःख की चर्चा करते हुए कहा था कि - “हम जिस सुख को पा कर खुश हो जाते है, उसके अंदर कहीं न कहीं दुःख ही छिपा हुए है. अज्ञानता (Ignorance) के कारण हम इस क्षणिक (मिट जाने वाले) सुख को पा कर थोड़ी देर के लिए तो आनंद की अनुभूति पा लेते है पर वास्तविकता(Truth/Reality) का पता चलते ही वो सुख भी हमसे दूर हो जाता है, क्यूँकि न तो वो ख़ुशी सच्ची है और न ही उसे हासिल करने का तरीक़ा.
अब सवाल उठता है कि - स्थिर सुख(Permanent Happiness) या स्थायी सुख, जो हमेशा बना रहे, उसको कैसे हासिल किया जाए ? कैसे कोई इंसान हमेशा सुख की अनुभूति करते हुए खुश और आनंदित रहे ?
इसके जवाब के लिए या तो हमें भारतीय दर्शन कि गंगा (Ganga) से लेकर पाश्चात्य - दर्शन के थेम्स (Thames) तक डुबकी लगानी होगी या दूसरा तरीक़ा है - आसान भाषा में लिखे इस लेख को गहराई से समझते हुए पूरा पढ़ने की ज़हमत उठाएँ.
सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि - इंसान, “खुश-रहने” और ख़ुशियों को बनाए रखने के लिए जितने प्रयास कर रहा है, उनमे कितनी वास्तविकता है? और उसकी दिशा कैसी है ?
जिन तमाम चीजों से हम ख़ुद को और दूसरों को खुश करने का दावा करते है, क्या कभी हमने उनके वजूद (Base) के बारे में सोंचा है ?
आइए, कुछ उदाहरण से समझते हैं :-
कुछ लोग लज़ीज़ (Tasty) भोजन में अपनी ख़ुशी तलाशते है. पर कभी हमने इस बात पर गौर किया कि - दुनिया के किसी भी भोजन का अपना स्वाद नही होता है, स्वाद तो हमारे अंदर है. जो भोजन एक व्यक्ति को बहुत तीखा और अप्रिय लग सकता है वही भोजन दूसरे व्यक्ति को बहुत स्वादिष्ट (Tasty)लग सकता है. एक ही चाय की मिठास विभिन्न व्यक्तियों को अलग-अलग लग सकती है, क्यूँकि अलग-अलग व्यक्ति अपने अंदर अलग-अलग स्वाद रखता है. सच तो यह है कि - दुनिया में किसी भी भोजन का अपना कोई टेस्ट नही होता है. जब हमारी सेहत ठीक नही होती या हम परेशान रहते हैं तब हमें स्वादिष्ट भोजन भी ख़ुशी नही दे सकता है. क्यूँकि 'ख़ुशी’ भोजन में नही बल्कि हमारे अंदर छिपी है.
ठीक उसी तरह, उगता-सूरज या बहते-झरने को देख कर किसी व्यक्ति को ख़ुशियों की अनुभूति हो सकती है, परंतु किसी दूसरे व्यक्ति को ऊँचाई से गिरते झरने को देखकर डर/भय महसूस हो सकता है. अतः ख़ूबसूरती उस झरने या उगते सूरज में नही बल्कि देखने वाले की आँख में होती है, उसके नज़रिए में होती है.
वो कहते हैं ना :-
सोंच को बदलो - सितारे बदल जाएँगे
नज़र को बदलो - नज़ारे बदल जाएँगे
कश्तियाँ बदलने की ज़रूरत नही है ,
दिशाओं को बदलो किनारे बदल जाएँगे..........
कुछ सामान्य उदाहरण से समझते हैं :-
प्रकृति, स्वाद, गंध और रंग से आगे बढ़ते हुए यदि सामान्य-जीवन की बात करें तो कोई इंसान नमक-रोटी से पेट भर कर ज़मीन पर सोते हुए भी खुश रह लेता है और कोई सारी सुविधाओं के बावजूद भी परेशान और बेहाल रहता है. हम पैसे से सुविधाएँ ख़रीद सकतें है, “सुख” नही. हम क़ीमत देकर “आराम” पा सकते हैं पर “ख़ुशी” नही.
कुछ लोग ‘सुविधाओं’ और ‘आराम’ को ‘सुख’ और ‘ख़ुशी’ समझ लेते हैं पर ऐसे लोगों का भ्रम जल्दी ही टूट जाता है. वो तमाम चीजें जिसके माध्यम से हम और आप खुश रहने का या दूसरों को खुश करने का दावा करते है वो सभी चीज़ें “छण-भंगुर” और अस्थायी (Temporary) है. अतः अस्थाई चीज़ से 'स्थाई-ख़ुशी’ पाने की कल्पना करना भी बेवक़ूफ़ी ही मानी जा सकती है.
वो तमाम चीज़ें जिसके माध्यम से हम ख़ुशी पाने की कोशिश करते है वो सभी ख़त्म हो जाने वाली बाहरी चीज़ें है, जो हमें थोड़ी देर के लिए उलझा कर रखती है, और हम उस उलझन को ख़ुशी मान लेते हैं. सच तो यह है कि - जिस ख़ुशी को पाने और खुश रहने के लिए इंसान “कस्तूरी-मृग” की तरह इधर-उधर भटकता रहता है, वो उसके भीतर ही मौजूद है. दुनिया की हर बाहरी चीज़ हमें थोड़े पल के लिए आकर्षित ज़रूर करती है, परंतु आकर्षण का पर्दा हटते ही हमारी ख़ुशी पहले ‘उदासीनता’ फिर ‘दुःख’ में बदल जाती है.
अतः सच्ची ख़ुशी हासिल करने और ख़ुशियों को लगातार बनाए रखने के लिए हमें स्थिर सुख को पाने का प्रयास करना होगा.
इस बारे में मेरी समझ :-
दर्शन के छात्र और जीवन के अनुभव के आधार पर एक लेखक के रूप में मेरी समझ यह कहती है कि - सुख को पाना, उसे बनाए रखना और हमेशा खुश रहना :- “एक स्थिति है”(It's a moment). इस स्थिति को बनाए रखने के लिए हमें “यात्रा” करनी होगा. एक ऐसी यात्रा जो कभी ख़त्म ना हो, एक ऐसी यात्रा, जिसमें हम हमेशा चलते रहें, जहाँ कोई मंज़िल न आए. यह यात्रा ही इतनी सुखद और ख़ुशियों से भरी हो जिसका कोई अंत नही हो, क्यूँकि लक्ष्य (मंज़िल) को पाते ही भ्रम टूट जाएगा और "सुख का पर्दा" हट जाएगा.
अतः रोग फ़िल्म के इरफ़ान खान की तरह हमें उस लड़की से प्रेम करना होगा जो वास्तव में है ही नही. जो वास्तव में है ही नही उसके खोने का ग़म भी नही और मिलने की ख़ुशी भी नही. बस उसे प्रेम करते रहने का आनंद मिलता रहेगा जो कभी ख़त्म नही होगा.
इसे वास्तविक जीवन से जोड़ कर देखे तो हम कह सकते हैं कि - हमें अपने जीवन में आने वाले सभी व्यक्ति से प्रेम करते रहना है, यथा-संभव सबका सहयोग करते रहना है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि - हमें बिना आशा रखे (Without Expectation) दूसरों का सहयोग अपने लिए करना होगा, अपनी यात्रा को बनाए रखने के लिए करना होगा, ताकि यात्रा चलती रहे और आनंद मिलता रहे. साथी-यात्री (Co-Travellers) बदलते रहें पर यात्रा चलती रहनी चाहिए.
जिस दिन लक्ष्य से मिल जाएँगे, उस दिन फिर दुःख से सामना हो जाएगा. अतः यह कभी न ख़त्म होने वाली यात्रा है. जिसे महात्मा-बुद्ध के शब्दों में जीवन-मरण चक्र कह सकते है.
सम्भवतः गीता में भगवान कृष्ण ने आनंदित रहने के उद्देश से ही कहा होगा कि - “कर्म करते रहो, फल की चिंता नही करो”. क्यूँकि फल ‘लक्ष्य’ है और कर्म ‘यात्रा’. जिसने लक्ष्य की चिंता की उस यात्री की "यात्रा" प्रभावित होगी और यात्रा प्रभावित होने का अर्थ है - "सुख में बाधा". (यह लेखक का Personal Interpretation है)
मैं तो यह मानता हूँ -
अगरआपका मन उस यात्रा से खुश है तो आप खुश है क्यूँकि -
मन-के-हारे- 'हार' है और मन-के-जीते- 'जीत'
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Patliputra University Patna.
(नव-वर्ष की बधाई के साथ....... खुश रहें, सेहतमदं रहें और अपनी यात्रा को बनाए रखते हुए मेरे ब्लॉग की प्रतीक्षा करते रहें.)
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That's very Knowledgeable and enhancing and mind blowing post .
ReplyDeleteThanks sir for great post
Well said ...
ReplyDeleteVery very Nice Line sir
ReplyDeleteIt's an amazing post, purely absolute abstract kind of thinking, which we all people know deep inside, but not able to recognise, through your writing any one can feel their inner motivation for their "happiness*😊 it's the journey from materialistic world to inner quest, expectation to acceptance.
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