बिहार में जाति जनगणना के आँकड़ो से मुस्लिम राजनीति की तस्वीर कितनी बदलेगी ?
अंग्रेजों के शासन काल में सर्वप्रथम सन 1881 से शुरू किए जाने वाले “जातिगत-जनगणना” को 1931 में अंतिम बार प्रकाशित किया गया था और 1941 की जातिगत आँकड़े सार्वजनिक नही किए गए. आज़ाद भारत को आगे बढ़ने के लिए जातिगत आँकड़े नही बल्कि “सबका-साथ सबके विकास” की ज़रूरत थी, अतः महात्मा गांधी से लेकर संविधान निर्माताओं की पूरे समूह को “जातिगत-जनगणना” की आवश्यकता नही पड़ी.
आज़ाद भारत की पहली जनगणना 1951 में हुई जहां आरक्षण की संवैधानिक बाध्यता को देखते हुए केवल SC/ST के आँकड़े सामने लाए गए. 1980 के बाद देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ जिसने सामाजिक न्याय और विकास की माँग के लिए पिछड़े और अति-पिछड़ों के लिए आरक्षण की माँग को मज़बूती से उठाना शुरू किया. एक दशकीय संघर्ष के बाद 1990 में वीo पी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की कुछ सिफ़ारिशों को लागु कर देश में OBC आरक्षण का जिन्न चिराग़ से बाहर निकाल दिया. OBC और पिछड़ो की राजनीति को हवा देने वाले लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे नेता के दबाव के बाद 2011-2013 (मनमोहन सरकार) में सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना की गई परंतु इसका आँकड़ा जनता के समक्ष प्रस्तुत नही किया गया.
बिहार में भाजपा सरकार का दामन छोड़ लालू यादव और कोंग्रेस के साथ महागठबंधन सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार की नेतृत्वता में जाति जनगणना पर ज़ोर-शोर से चर्चा होने लगी और गांधी जयंती के ऐतिहासिक दिन (02 oct 2023), जाति-जनगणना के आँकड़े बिहार-समेत देश के सामने प्रस्तुत कर दिए गए.
आँकड़ो की माने तो बिहार में 27.12% पिछड़ा वर्ग एवं 36.01% अति-पिछड़ा वर्ग की तादाद है. 19.65% आबादी अनुसूचित जाति एवं 1.68% अनुसूचित जनजाति की है. सामान्य वर्ग की आबादी 15.52% है जिसमें सभी धर्म के लोग शामिल है. धार्मिक दृष्टिकोण से बिहार में 82 % हिंदू धर्म और 17.7 % मुस्लिम धर्म का आँकड़ा है. 0.3% में अन्य धर्म के लोगों का प्रतिनिधित्व है.
बिहार में 63% (27+36%) से अधिक आबादी वाले OBC समाज के नेता अपने-अपने जातिगत वोटबैंक से रजनीतिकि रोटियाँ सेंकते हुए कभी पक्ष तो कभी विपक्ष की मलाई खाते आ रहें हैं. OBC जातियाँ राजनैतिक दृष्टिकोण से इतनी महत्वपूर्ण होती चली गयी कि- क्षेत्रीय दलों के साथ साथ कोंग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय दल भी OBC आरक्षण पर अपना मुँह खोलने से बचती है.
बिहार में OBC की 63% से अधिक आबादी का ही परिणाम है कि बिहार की राजनीति में सक्रिय लगभग सभी दलों के शीर्ष नेतृत्व में OBC चेहरा देखने को मिलता है. RJD के लालू यादव, JDU के नीतीश कुमार, RLSP के उपेन्द्र कुशवाह, VIP के मुकेश सहनी, JAP के पप्पू यादव एवं भाजपा के सुशील मोदी या सम्राट चौधरी समेत सभी बड़े नाम OBC समाज से ही आते हैं. इसके अतरिक्त 19.65% की प्रतिनिधित्वता करने वाले अनुसूचित समाज की तरफ़ से राम विलास पासवान और उनके बाद बेटे चिराग़ पासवान एवं जीतन राम माँझी बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
OBC में सबसे बड़ी जाति के रूप में 14.26% यादव समाज का स्थान है. इतना बड़ा और मज़बूत वोटबैंक यादव समाज के पप्पू यादव और भाजपा के भी निशाने पर बना रहता है, परंतु लंबे अरसे से लालू प्रसाद यादव और अब उनके बेटे तेजस्वी यादव इस समाज का प्रतिनिधित्व करते नज़र आ रहे हैं. इसके अतिरिक्त नीतीश कुमार कुर्मी समाज से आते हैं जिनका आबादी 2.87% है, उपेन्द्र कुशवाह कोईरी समाज से आते हैं जो 4.21% है. 5.31% वाले पासवान समाज को नेता के रूप में राम विलास पासवान मिले और 3.08 % आबादी वाले माँझी समाज को जीतन राम माँझी का नेतृत्व प्राप्त हुआ.
जाति-विशेष पर अपनी ख़ास पकड़ रखने वाले नेताओं को राजनीतिक लाभ देने में बिहार की 17.7 % मुस्लिम आबादी का बड़ा योगदान रहा है या यूँ कहे कि बिहार के लगभग 18% मुस्लिम आबादी को टुकड़ों में बाँट कर सभी नेता-विशेष ने अपनी राजनैतिक रोटी सेंकी हैं, परंतु दुर्भाग्यवश कई दशकों से इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के पास न नेतृत्व है, न पार्टी है, न पहचान है और न ही अपना कोई एजेंडा.
बिहार की बात करें तो लगभग 4% उच्य मुस्लिम जाति (शेख़, सैयद और पठान), जिसे “अशराफ” के नाम से भी जाना जाता है और लगभग 14% आबादी के अंतर्गत पसमंदा या निम्न मुस्लिम जाति के लोग आते हैं जिनमे अजलाफ (दर्ज़ी, धोबी, धनिया, हजाम, जोलाहा, कुंजरा,लोहार जैसे अनेक) और अरजाल (हलालखोर, भंगी, लालबेगी, मेहतर, नट इत्यादि) शामिल हैं. इस्लाम में सभी प्रकार के जातिगत वर्गीकरण को नकारा गया है परंतु भारतीय समाज में हिंदू धर्म की तरह ही कार्यों एवं धर्म परिवर्तन के आधार पर मुस्लिम समाज में भी उच्य और निम्न जातियों का वर्गीकरण पुरे देश में देखने को मिल जाता है.
भारतीय समाज में जाति की सच्चाई और भारतीय राजनीति में जाति-विशेष के महत्व ने जाति-आधारित नेतृत्वता को अगली पंक्ति पर ला कर खड़ा किया है परंतु आज़ादी के बाद से बिहार ही नई बल्कि पुरे देश की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक न तो धार्मिक रूप से एकजुट हो सका और न ही जाति-विशेष के रूप में किसी मुस्लिम नेता का उदय हो सका है. बिहार के राजनीतिक इतिहास में इसका भरपूर फ़ायदा RJD, कोंग्रेस पार्टी और यहाँ तक कि राम विलास पासवान जैसे नेताओं ने उठाया है जिन्हें वक़्त दर वक़्त मुस्लिम वोटों का सहयोग मिलता रहा और बदले में इन्होंने अपनी पार्टी में कुछ मुस्लिम चहरे ज़रूर शामिल किए परंतु “जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ से मुस्लिम समाज महरूम (वंचित) रहा है.
पिछड़ो और वंचितो की बात करने वाले लालू प्रसाद यादव की RJD पार्टी के लगभग सभी मुस्लिम चहरे (अली अशराफ फ़ातमी, अब्दुल बारी सिद्दीक़ी, तसलीमद्दीन एवं शहाबुद्दीन) 4% उच्य मुस्लिम वर्ग से आते हैं, जिन्होंने MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण के सहारे RJD और लालू परिवार को राजनीतिक गलियारे में महत्ता दिलाई है.
पसमंदा मुस्लिम समाज की तरफ़ से अली अनवर अंसारी, कहकशा परवीन, एजाज़ अली और ग़ुलाम गौश जैसे नेताओं ने संघर्ष करके बिहार की रजनीति में अपनी जगह बनाने में एक हद तक कामयाबी हासिल की है. सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक रूप से वंचित पसमाँदा मुसलमानों की स्थिति के सुधार हेतु अली अनवर अंसारी ने “ऑल इंडिया पसमाँदा मुस्लिम महाज”, एवं एजाज़ अली ने “ऑल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा” जैसे मंच से आवाज़ बुलंद करने का प्रयास किया है. ‘सच्चर कमिटी’ से लेकर ‘कुंडू कमिटी’ जैसे कमीशनों ने पसमाँदा मुसलमानों की स्थिति में सुधार हेतु कई रिपोर्ट पेश किया है परंतु मुस्लिम समाज में नेता, नेतृत्वता और एकजुटता की कमी ने इन रिपोर्ट्स को काग़ज़ तक ही सीमित रखा है.
जीतन राम माँझी, उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश सहनी, राम विलास पासवान जैसे नेताओं ने अपने जाति-विशेष की नेतृत्वता करते हुए अपने समाज को एकजुट भी किया और बिहार में राजनीतिक दल के रूप में उनका प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं जबकि मुस्लिम समाज के अशराफ नेताओँ ने RJD के नेतृत्वता के सहारे मंत्रालय से लेकर संसद भवन की यात्रा कर ली परंतु न तो अपने समाज के नायक बन सके और न ही मुस्लिम समाज के लगभग 18% वोट को एकजुट करने में कामयाब हो सके.
बिहार में जाति जनगणना की रिपोर्ट ने मुस्लिम जातियों की संख्या को साफ़ कर दिया है, जिसमें पसमाँदा मुसलमानों की संख्या “अशराफ़ों” से लगभग तीन-गुनी देखी जा सकती है जिससे एक तरफ़ तो मुस्लिम अशराफ नेता पसमाँदा मुसलमानों को दरकिनार कर आगे नही बढ़ सकते और दूसरी तरफ़ मुस्लिम वोट बैंक पर नज़र रखने वाले बिहार की अन्य पार्टियों को पसमाँदा नेताओं को अपने साथ आगे लेकर बढ़ना होगा जो कार्य नीतीश कुमार एक हद तक करते आएँ हैं.
मुस्लिम जातियों की जनगणना और प्रतिशत, पसमाँदा मुसलमानों को समाजिक और राजनैतिक रूप से मज़बूत बनाने के लिए सहायक साबित हो सकती है क्यूँकि जाति-जनगणना के पक्षधर सभों नेता “जिसकी जिनती हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी” के समर्थक हैं.
अब देखना यह है कि - बिहार में जाति जनगणना से मुस्लिम समुदाय के राजनैतिक समीकरण का लाभ ‘अशराफ, अजलाफ और अरजाल, संयुक्त रूप से मिलकर उठाते हैं या अपने अपने समूहों की नेतृत्वता करते हुए बिहार की वर्तमान राजनीतिक पार्टियों के साथ अपनी हिस्सेदारी मज़बूत करने का प्रयास करते हैं.
डाo मोहम्मद अली
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय पटना.
Gmail :- ali2011pf@gmail.com
Phone :- 9334302001


आप सर अच्छा विश्लेषण किया है ये आंकड़ा से अच्छे अच्छों की नींद हराम हो गई विशेष कर स्वर्ण जाती में कुछ संघी लोग जो कहते थे मुस्लिम ज्यादा बच्चे पैदा करते है 1931 में मुस्लिम 16 प्रतिशत थी अब 1प्रतिशत का वृद्धि हुई जबकि अन्य में बहुत आंकड़े समझ आ गई होगी...
ReplyDeleteHindu or Musalman ki Jo agrim jaati hai unhone hi jade rajnitik or economical
ReplyDeleteLabh uthaen Hai