2019 लोकसभा चुनाव (बेग़ूसराय लोकसभा सीट - विश्लेषण)


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बेग़ूसराय लोकसभा सीट  :     2019  -  विश्लेषण

(Seat Number – 24)

सन 1870 में मुंगेर जिले के उपखण्ड के रूप से स्थित हुआ और 1972 में पहले बेगम-सराय फिर ‘बेगूसराय’ के नाम से जाना-जाने वाला बिहार के पूर्वी भाग और गंगा नदी के उत्तर में स्थित यह ज़िला देश भर में अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग पहचान रखता है। दर्शनिक एवं साहित्य प्रेमी इसे राष्ट्र कवि “राम-धारी सिंह” की धरती के रूप में, ज्ञानी एवं इतिहास-प्रेमी, प्रसिद्ध इतिहासकार “प्रोफ़ेसर राम शरण शर्मा की जन्म-भूमि, राजनीति के जानकार लेनिनग्राद, और आज के युवा इसे “कन्हैया’ का जन्म स्थान के रूप में जानते हैं । यह ऐतिहासिक मिथला क्षेत्र का हिस्सा है, यहाँ गंगा स्थित “सिमारिया-घाट” लोगों की आस्था और ईश्वर-भक्ति से जुड़ा हुआ है ।  

     सन 2011 की जनगणना के आधार पर बेगूसराय’  की कुल आबादी - उनतीस लाख सत्तर हज़ार पाँच सो इकतालिस थी (29,70,541)  

     7 विधान-सभासीटकोअपनेअंदरसमाहितकिएहुएबेगूसराय’  लोकसभासीटमेंकुल- 1,473,263 मतदाताहै,  जिनमे6,87,910 महिला और 7,85,353  पुरुष। 2009 सेअबतकइनकी संख्यामेंवृधिस्वभाविकहै। येमतदातासभी 7 विधान-सभा क्षेत्र में जाति, धर्म, राजनैतिक सोच एवं अन्य विचार- विविधताओं के आधार पर बँटे हुए हैं । छेरिया-बरियारपुर, मटिहानी, बखरी, बछवाड़ा, साहेबपुर-कमल, तेघरा और बेगूसराय’  नामक इन सात विधान सभाओं में “बख़री” अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है ।
        
बेगूसराय’  लोकसभा सीट की कहानी शुरू करें तो - आज़ाद भारत के पहले चुनाव (1952) में देश के लगभग सभी सीट की तरह बेगूसराय’  सीट से भी सफल उम्मीदवार (मथुरा प्रसाद मिश्र) कोंग्रेस पार्टी ने दिए । कोंग्रेस के ‘मथुरा प्रसाद मिश्र’ के हट्रिक जीत के सिलसिले को कॉम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) के ‘योगेन्द्र शर्मा’ ने लोकसभा के चतुर्थ चुनाव (1967) में ब्रेक लगा दिया । इस (1967) में CPI देश भर में 23लोकसभा सीटों पर सफलता प्राप्त करते हुए एक बड़ी बन पार्टी कर उभरी । कॉम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) CPM ने भी 19लोकसभा सीट हासिल किया । इससे पहले आगे बढ़े, पाठकों को बताता चलूँ कि - ‘CPI’ हमारे देश की एक पुरानी राजनैतिक पार्टियों में से एक है, इसकी स्थापना 26 Dec 1925को कानपुर में हुई थी । CPI के वैचारिक मतभेद के फलस्वरूप ही CPM पार्टी का जन्म 1964में हुआ । 


     CPI और CPM की कहानी को समझने के लिए 1967 के लोकसभा चुनाव से थोड़ा पहले जाना होगा । हम सभी यह जानते है कि - कॉम्युनिस्ट सोंच समाजवादी सोंच का समर्थन और पूँजीवाद के ख़िलाफ़त की बात करती है । इस विचारधारा का संघर्ष आज़ादी के बाद भी कोंग्रेस सरकार से लगातार चलता रहा । उस वक़्त के तत्कालीन प्रधान-मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वामपंथी विचारधारा से सामंजस्य बिठाने के लिए रूस से अच्छे सम्बंध बनाने के भी प्रयास किए । 1959 से पूर्व केरल के मुख्यमंत्री रहे कॉम्युनिस्ट के मज़बूत नेता “ईएमएस नंबूदिरिपाद” की सरकार को कोंग्रेस द्वारा बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद दोनो के रिश्तों में तल्ख़ी आ गयी । कॉम्युनिस्ट विचारधारा में शुरू से ही ‘नरमपंथ’ और ‘गरमदल’ के लोग रहे हैं । यहाँ तक कि - भारत और चीन की 1962 के युद्ध में भी कुछ कॉम्युनिस्ट नेताओं पर चीन के समर्थन का आरोप लगा था । 1962 में कॉम्युनिस्ट पार्टी के महा-सचिव ‘अजय घोष’ के निधन के बाद ‘एएस डाँगे’ को पार्टी का चेयरमैन और “ईएमएस नंबूदिरिपाद” को महा-सचिव बनाया गया । जहाँ “नंबूदिरिपाद” उदारवादी सोंच रखते थे तो “डाँगे” कट्टरपंती विचारधारा के समर्थक । ‘गरम’ और ‘नरम’ का यह संतुलन ज़्यादा दिन एक साथ नही चला और सन 1964 में डाँगे समूह ने “पी सुंदरैया” की अगुवाई में मार्क्सवादी कॉम्युनिस्ट पार्टी CPI(M) का निर्माण कर लिया । 

     जहाँ 1967 के लोकसभा चुनाव में CPI को 23 और CPM को 19 सीट मिले थे, वही 1971 के आम-चुनाव में इसकी संख्या 23 (CPI) और 25 (CPM) हो गयी थी । इस चुनावी परिणाम से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि - जहाँ कॉम्युनिस्ट विचारधारा की जड़े भारत में जम रही थी वही जनता भी ग़रीबों के हित की बात करने के पक्ष में हो रही थी । देश की बड़ी-बड़ी महासागर पार्टियाँ से लेकर छोटे-छोटे पोखर पार्टियाँ जो आज ग़रीबों के हित में घोषणा-पत्र जारी करती है इन्हें ग़रीबों की राजनीति करने का सूत्र कॉम्युनिस्ट की सफलता से ही मिले थे । इसी सूत्र का प्रयोग कर श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1971लोकसभा चुनाव में - “ग़रीबी हटाओ, इंद्रा लाओ’ के नारे का एलान करते हुए, देश की नही पर अपनी ग़रीबी हटा कर सत्ता पर आसीन हुई थी । इसी नारे के सहारे 1971 के आम-चुनाव में कोंग्रेस ने वापस बेगूसराय’  सीट हासिल कर लिया था । परंतु इंद्रा गांधी की 1971 की ज़बरदस्त जीत और फिर उनके द्वारा 1975 में लगायी गयी आपातकाल (Emergency) का नशा 1977 के आम-चुनाव में टूटा जब इंद्रा गांधी को जनता (जनता पार्टी) ने संसद भवन से सड़क पर ला दिया । 1975 के आपातकाल (Emergency) और इंद्रा गांधी के शोषण और मनमानेपन का जवाब देने के लिए जनसंघ और भारत के मुख्य विपक्षी दल ने मिल कर “जनता पार्टी” का निर्माण किया और 1977 के आम-चुनाव में “जनता पार्टी’ की सरकार बनी जिसके प्रधानमंत्री “मुरार जी देसाई” को नियुक्त किया गया । उस वक़्त देश की जनता ने पार्टी को चुना था आज की तरह मोदी या राहुल को चुनने का होड़ नही थी । जन-प्रतिनिधियात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता अपने जन-प्रतिनिधि को चुनती है और और जन जन-प्रतिनिधि मिलकर प्रधान-मंत्री बनाते हैं । 

     ख़ैर, 1971 के चुनाव के बाद बेगूसराय’  लोकसभा सीट कभी कॉम्युनिस्ट के हाथ वापस नही आयी । इस सीट पर 1977 से “जनता पार्टी” से अलग हुई - ‘जनता दल, कोंग्रेस, निर्दलीय और फिर 1999 में बिहार के हरफ़नमौला नेता “लालू प्रसाद यादव” की पार्टी RJD का क़ब्ज़ा हुआ । परंतु 2004 से 2019 तक इस सीट को NDA ने अपने पास समेट कर रखा है । बिहार में “नीतीश कुमार” की JDU और BJP के गठबंधन वाली NDA ने 2004 में यहाँ से JDU उम्मीदवार ‘राजीव रंजन सिंह’ को जनता ने लोकसभा भेजा, पुनः - 2009 में JDU के डाo ‘मोनाज़िर हसन’ जीत कर संसद गए। JDU इस सीट पर जीत की हैट्रिक लगा सकती थी पर नीतीश कुमार के अहंकार ने 2014 के लोकसभा से पहले ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी’ को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में ठुकराते हुए NDA से कट्टी कर लिया और 2014 में JDU ने बेगूसराय’  सीट से CPI के उम्मीदवार “राजेंद्र प्रसाद सिंह” के समर्थन की घोषणा कर दिया । 2014 में नीतीश ने “बेगूसराय’ ” और “बाँका” को छोड़ कर बिहार के 38 लोकसभा सीट पर अपने उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह “तीर” के साथ भेज दिया था । ये अलग बात है कि - नीतीश के 36 तीर निशाने पर नही लगे और लोकसभा नतीजे में 02 सीट प्राप्त कर नीतीश ने बिहार की गद्दी से भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफ़ा दिया और राजनैतिक चाल का प्रयोग करते हुए - “जीतन राम माँझी’ को कुछ दिन के लिए ही सही बिहार की कुर्सी सौंपी थी । 

     2014 के उस चुनाव में JDU से अलग होकर BJP ने डाo भोला सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया । 2014 के बेगूसराय’  नतीजे पर नज़र डाले तो पता चलता है कि - जीत का मुकुट पहनते हुए - BJP के ‘डाo भोला सिंह’ - 4,28,227 मत के साथ पहले स्थान पर, RJD के ‘तनवीर हसन’- 3,69,892 मत के साथ दूसरे स्थान पर रहे और नीतीश के समर्थन और कॉम्युनिस्ट के कैडेर वोट के बावजूद CPI उम्मीदवार ‘राजेंद्र प्रताप सिंह’  तीसरे नम्बर पर रहते हुए मात्र - 1,92,629 वोट हासिल कर सके । यहाँ पर प्रश्न यह उठता है कि - क्या JDU के समर्थक नीतीश की हरकत को ना-पसंद करते हुए BJP के भोला सिंह के साथ चले गए, या उन्होंने तनवीर हसन के वोट को इज़ाफ़ा कर दिया या वो नीतीश के नक़्शों-क़दम पर चलते हुए CPI का समर्थन किया ?

     यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है, जो कि 2019 के इस चुनाव के नतीजे की गुत्थी को सुलझा सकता है, क्यूँकि - इस बार फिर से JDU के नीतीश कुमार ने अपने अहंकार को किनारे कर के BJP से हाथ मिला लिया है, परंतु पिछली ग़लती की सज़ा और बिहार में JDU-NDA सीट बँटवारे में यह सीट नीतीश के हाथो से फिसल कर BJP के खाते में चली गयी है । यहाँ से BJP ने अपने फ़ायर ब्राण्ड नेता, कट्टर हिंदुत्व की छवि वाले और अपने पुराने सिपाही - “गरिराज सिंह”को मैदान में भेजा है । बेगूसराय’  के मैदान में दूसरे छोर पर RJD ने “तनवीर हसन” को उतारा है, जो पिछले लोकसभा चुनाव में इसी सीट पर दूसरे स्थान पर रहे थे । इससे पहले कि बेगूसराय’  की जनता उम्मीदवारों के चयन की तरफ़ आगे बढ़े, इस मुक़ाबले को महा-मुक़ाबला बनाते हुए CPI ने अपने उम्मीदवार के रूप में बेगूसराय’  के माटी के लाल “कन्हैया कुमार” को रण-भूमि में भेजते हुए पूरे देश की निगाहे इस लोकसभा सीट पर केंद्रित कर दिया है।

अब आगे……………..……..

2019 का घमासान :

     पूरे देश की मीडिया और राजनैतिक जानकार 2019 “बेगूसराय’  सीट” के मुक़ाबला त्रीकोणीये होने की सम्भावना बता रहें है,पर तीनो दावेदार की ज़मीनी हक़ीक़त और बेगूसराय’  की जनता का रूख समझने के लिए इस सीट के वोट आँकड़े, मतदान प्रतिशत, जातीय झुकाव और यहाँ के विधानसभा सीटों के गणित को समझना आवश्यक है । 

     2019 लोकसभा की चर्चा से पूर्व पिछले कुछ चुनाव की एक झलक पर चर्चा आवश्यक है । हम सब इस बात को जान रहे हैं कि - ‘2004’ और ‘2009’ लोकसभा में नीतीश कुमार की पार्टी (JDU) से खड़े हुए NDA उम्मीदवार ने यहाँ से बाज़ी मारा था, पर समझने की बात यह है कि - दोनो लोकसभा में केंद्र में UPA की सरकार बनी थी, जिसमें मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे । प्रश्न यह उठता है कि - केंद्र में UPA की सरकार बनने के बावजूद दोनो लोकसभा (2004 और 2009) में बेगूसराय’  सीट NDA के खाते में कैसे चली गयी ?

     देश में UPA की लहर और बेगूसराय’  में NDA की जीत का कारण या तो नीतीश कुमार का विकास छविहो सकता है क्यूँकि नीतीश के पास कोई तगड़ा जाति वोट-बैंक नही है या बेगूसराय’  में “भूमिहार वोट-बैंक”की गोलबंदी और उसपर नीतीश कुमार को दिया गया मुस्लिम वोट बैंक का समर्थन हो सकता है । यहाँ पर नीतीश कुमार के राजनैतिक चाल को समझने की ज़रूरत है । नीतीश कुमार से 2004 लोकसभा में बेगूसराय’  सीट पर इन-स्विंगर डिलीवरी देते हुए - ‘भूमिहार उम्मीदवार’ (राजीव रंजन सिंह) की दावेदारी कर मुस्लिम वोट बैंक को जोड़ने पर पूरा ध्यान केंद्रित किया क्यूँकि उन्हें पता था ‘भाजपा का साथ’ और ‘भूमिहार उम्मीदवार’ होने की वजह ‘भूमिहार-वोटर’उनके पक्ष में पहले से हैं । 2009 में ठीक उलट आउट- स्विंगर फेंकते हुए - “मुस्लिम उम्मीदवार” (डाo मोनाज़िर हसन) को खड़ा कर दिया और दोनो डिलीवरी पर विकट चटका लिया । यहाँ पाठकों को यह बता दूँ कि - बेगूसराय’  में सबसे अधिक लगभग 4 लाख मतदाता स्वर्ण हिन्दू के अंतर्गत “भूमिहार” जाति से है और दसरी बड़ी आबादी मुसलमान मतदाता की है ।  

पूरे बेगूसराय’  की बात करें तो यहाँ लगभग 85% हिन्दू और तक़रीबन 15% मुसलमान की आबादी है पर कुछ जगह जैसे - मलहीपरमें 94%, लरौरामें - 74%, बलियामें - 42%, बरौनीमें -30 % , मनसौर-चकमें - 26 % और बख़रीमें - 21 % मुस्लिम आबादी है । ऐसे सघन मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र सारे राजनैतिक गणित फैल कर सकते हैं । अतः नीतीश कुमार ने 2004 में पहली गेंद भूमिहार के नाम पर और 2009 में दूसरी गेंद मुस्लिम के नाम पर खेलते हुए सफलता अर्जित किया था । 

2014 लोकसभा  :

2014 लोकसभा में नीतीश कुमार ने CPI के उम्मीदवार “राजेंद्र प्रसाद सिंह’ को समर्थन करने के बावजूद BJP उम्मीदवार स्वर्गीय भोला जी को 4 लाख से अधिक वोट और RJD के तनवीर हसन को 3 लाख, 70 हज़ार वोट आ जाना दो बातों को प्रमाणित करता है पहला कि - नीतीश कुमार की बेगूसराय’  लोकसभा पर कोई ख़ास पकड़ नही है और दूसरा कि - 2014 का लोकसभा चुनाव साफ़-साफ़ अर्थों में “हिन्दू-मुस्लिम” का चुनाव था जिसमें बेगूसराय’  के लगभग सारे हिन्दू एक तरफ़ हो गए और लगभग सारे मुस्लिम एक तरफ़ । 2014 के चुनाव को सिर्फ़ एक चश्मे से देखा जा सकता है । मैं अपनी बात को साबित करने करने के लिए यह पंक्ति कह सकता हूँ कि - “2014 लोकसभा चुनाव में BJP की लहर में जहाँ साधारण से साधारण उम्मीदवार ने संसद भवन का चेहरा देख लिया वही BJP के जाने-माने नेताऔर केंद्रीय मंत्री रह चुके शाहनवाज़ हुसैनचुनाव हार गए क्यूँकि मुस्लिम चेहरा थे ।”हमारे देश में मुस्लिम- हिन्दू के ध्रुवीकरण वाला ऐसा चुनाव स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज तक नही हुआ था ।  

     इसी ध्रुवीकरण में स्वर्गीय भोला जी ने भी BJP के खाते में बेगूसराय’  को पहुँचा दिया और नीतीश द्वारा किया गया CPI समर्थन धरा का धरा रह गया । हमें इस बात को नही भूलना चाहिए कि - स्वर्गीय भोला जी बेगूसराय’  विधान सभा सीट से 8 बार विधायकरह चुके हैं, अतः बेगूसराय’  में उनकी पकड़ को अनदेखा नही किया जा सकता है । वो एक ज़मीनी नेता थे जिन्होंने 2009 में BJP को नवाद सीट भी तोहफ़े में दिया था । पर गिरिराज की स्थिति ऐसी नही है । 

     गिरिराज सिंह, भड़काऊ भाषण देने वाले ऐसे नेता है जिन्हें न तो कभी जन समर्थन मिला और ना ही पुराने दौर से जनता के प्रतिनिधि रहे हैं। गिरिराज सिंह ने अपने राजनैतिक सफ़र की शुरुआत ही विधान-परिषद के सदस्य के रूप में किया था । 2014 में नवाद के लोकसभा सीट से उनके जीत का श्रेय पहले तो नरेंद्र मोदी के साम्प्रदायिक लहर को और दूसरा स्वर्गीय भोला जी के नवाद में किए गए कार्यों को जाता है । मुस्लिमों पर धार्मिक-टिप्पणी, भड़काऊ और संविधान विरोधी भाषण देकर और मोदी जी के गुण-गा कर चर्चा में आए गिरीराज सिंह की बेगूसराय’  पर अपनी कोई ज़मीनी पकड़ नही मानी जा सकती है । यही कारण है कि- बिहार में जहाँ भाजपा के कई वर्तमान सांसद लोकसभा टिकट के लिए दफ़्तर-दफ़्तर चक्कर काट रहे थे, गिरिराज बेगूसराय’  से टिकट लेने को राज़ी नही हो रहे थे । चूँकि नवाद सीट नीतीश कुमार के (JDU) खाते में चली गयी थी, अतः अमित शाह के Tweet के बाद अंत्ततः गिरिराज को बेगूसराय’  सीट स्वीकार करना पड़ा । 

गिरिराज के लिए मज़बूत बातयह है कि - बेगूसराय’  में 4 लाख “भूमिहार” मतदाता हैं और कमज़ोर बात यह है कि - सबसे पहले युवा वोटर का कन्हैया से लगाव, उनका बड़बोलापन, कन्हैया कुमार का भूमिहार जाति से होना जो उनके ‘भूमिहार’ ख़ास कर ‘युवा-भूमिहार वोटर’ में सेंध लगा सकता है और मुस्लिम ही नही बल्कि वो हिन्दू मतदाता जो कट्टरपंत से नफ़रत करते हैं, वो गिरिराज से दूर रहेंगे । 

     गिरिराज का मुश्किल पक्ष: -  सबसे पहले उनका विपक्ष “कन्हैया कुमार” है जो उनकी ही जाति का है और उनके स्थापित “भूमिहार वोट बैंक” में सेंध लगा सकता है, कन्हैया युवा वोटर है अतः युवा मतदाता को अपनी तरफ़ खींच सकता है, गिरिराज को डर है कि - कन्हैया के पास मुस्लिम समर्थन भी है जो उनके पास नही है, गिरिराज को डर है कि - - कन्हैया के पास CPI के कैडर वोट है जो उनके पास नही है । कन्हैया का वार BJP पर सीधे तौर पर होता है जो उनके लिए ख़तरा है। कन्हैया तनवीर जी के लिए थोड़ा नरम हो सकते हैं पर गिरिराज के लिए बिलकुल नही । गिरिराज को डर है कि - भोला सिंह जैसे ज़मीनी नेता के सामने तनवीर साहब 4 लाख के क़रीब वोट ला सकते है वो भी मोदी लहर में तो इस बार पिछले बार जैसा मोदी लहर भी नही है ।  
     अब बात करते है - दूसरे उम्मीदवार RJD के तनवीर हसन की । बेशक, तनवीर हसन एक पुराने और मंझे हुए नेता रह चुके है । 70 के दशक से युवा राजनीति करने वाले तनवीर हसन की धाकड़ पकड़ RJD और मुस्लिम कैडर वोट-बैंक पर है । तनवीर जी जनता दल युवा मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल युवा मोर्चा के अध्यक्ष एवं महासचिव रह चुके हैं । सन 2005 से लगातार RJD के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं, साथ ही 24 वर्ष (1990 से 2014) तक RJD की तरफ़ से बिहार विधान सभा के सदस्य भी रह चुके हैं । इतने पुराने और राजनैतिक अनुभव को अनदेखा बिलकुल भी नही नही किया जा सकता है । 2014 लोकसभा में हुई उनकी हार संसदीय हार तो मानी जा सकती है पर इसे राजनैतिक और सामजिक हार कहना भूल होगा । ध्रुवीकरणके उस माहौल में 3 लाख 70 हज़ार वोट समेट लेना बेशक प्रशंसनीय है ।  

     तनवीर हसन का मज़बूत पक्षहै - उनका पुराना राजनैतिक अनुभव, उनकी सामजिक छवि, RJD का मुस्लिम-यादव(MY) समीकरण और भोला सिंह जैसे ज़मीनी नेता का लड़ाई में मौजूद न होना ।

     तनवीर हसन का मुश्किल पक्षहै - सबसे पहले कन्हैया कुमार की मौजूदगी जो उनसे उनके मुस्लिम वोट और सामान्य युवा मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है, दूसरा बिहार के हरफ़नमौला राजनेता लालू जी का जेल में रहना, तेज़-प्रताप और तेजस्वी यादव की आपसी लड़ाई और गुटबाज़ी का ख़ामयाजा, और पिछली हार से मनोबल में थोड़ी कमी ।         
     अब बात करते है - तीसरे उम्मीदवार CPI से रण-भूमि में उतरे बेगूसराय’  के छोटे से गाँव ‘बीहट’ के लाल - “कन्हैया कुमार”, जिनका नाम ही अपने आप में एक परिचय हो चुका है । राजनीति कर रहे हर युवा उनकी तरह बनना चाहते हो या ना हो पर उनके जितना नाम ज़रूर कमाना चाहते हैं । CPI से जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी (JNU) के छात्र-संघ अध्यक्ष जो JNU में हुए FEB 2016 की एक घटना से अचानक पूरे देश और देश की मीडिया के नज़र में आ जाते हैं । 2014 में केंद्र में बनी BJP (मोदी) की सरकार के सामने पूरी कोंग्रेस पार्टी ने जो विपक्ष धर्म नही निभा सके वो अकेले इस छात्र-नेता ने निभा दिया । सामजिक से लेकर राजनैतिक मुद्दों पर अपनी समझ के सहारे, अपनी भाषण शैली और और ग़ज़ब की हाज़िर-जवाबी के दम पर उसने करोड़ों दिल जीते, सांप्रदायिकता फैलाने वाले नेताओ के सर को झुका दिया और देश में ग़रीब, किसानो, बेरोज़गारों और वंचितो से जुड़े परेशानियों को मुद्दा के रूप सीधा और सटीक तरीक़े से उठाया । जातीयता और धार्मिकता के कुएँ में डूबे हुए लोगों को छोड़ दें तो युवाओं का एक बड़ा वर्ग कन्हैया कुमार को संसद भवन में ग़रीबों के हक़ में अपनी आवाज़ बुलंदी से उठाते हुए देखना चाहता है । 

     परंतु वास्तविकता यह है कि - जिस संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में लोकतंत्र में चुनाव होता है, यहाँ कन्हैया कुमार को मत देने का अधिकार केवल उनके नामांकित क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मतदाताओं के पास ही है। बेगूसराय’  के मतदाता ही उन्हें संसद भवन का रास्ता दिखला सकते हैं चाहे पूरा भारत पक्ष में हो या विपक्ष में । और इस बात से शाएद ही कोई इनकार कर सकता है कि - भारत में ख़ास कर बिहार की राजनीति में जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग, वर्चस्व, बाहुबल, पैसा, शराब, और अन्य प्रोलभन के प्रभाव के बिना नतीजे आ जाते हों यदि अपवाद को छोड़ दें तो । यहाँ जातीय समीकरण चलते हैं, शराब की नादिया बहती है, बाहुबल का ज़ोर चलता है और पैसों  का नंगा खेल चलता है । बेशक इसमें कमी आयी है क्यूँकि - सांप्रदायिकता और धार्मिक ध्रुवीकरण ने अपने पैर जो पसारे हैं । 

कन्हैया कुमार का मजबूत पक्ष:- राष्ट्रीय स्तर पर युवा नेता के रूप में पहचान, युवाओं के लिए उम्मीद, उनक जन्म-स्थल होना, उनका साधारण परिवार से होना, JNU जैसे प्रतिष्ठित संस्थाओ से पढ़ा-लिखा होना, CPI का कैंडिडट होना क्यूँकि बिहार में यदि CPI कहीं सबसे मज़बूत है तो वो बेगूसराय’  में है , उनका भूमिहार होना क्यूँकि बेगूसराय’  में 4 लाख से अधिक भूमिहार वोट है । देश के तमाम पढ़े-लिखे, जानकार, फ़िल्मकार और नामचीन हस्तियों का सहयोग, एवं देश के अन्य युवा रजनेताओ का सहयोग  

कन्हैया कुमार का मुश्किल पक्ष: - सबसे महत्वपूर्ण महागठबंधन का समर्थन नही मिलना और तेजस्वी का साथ नही मिलना, राजनीति में और ख़ास कर बिहार की ज़मीनी राजनीति में कम अनुभव होना, RJD के तरफ़ से मुस्लिम उम्मीदवार का खड़ा होना क्यूँकि कन्हैया के पास अच्छा ख़ास मुस्लिम वोट का समर्थन हो सकता था यदि मुस्लिम उम्मीदवार विपक्ष में नही होते । राजनैतिक और आर्थिक ताक़तों की आभाव । 1967 से CPI का बेगूसराय’  सीट पर नही होना । गिरिराज जैसे विपक्ष जिसके पास कैडर वोट है और वो साम्प्रदायिक माहौल बनाने की क्षमता रखता है  । 


बेगूसराय’  के सात विधान-सभा को और वहाँ के जातीय समीकरण को समझने का प्रयास करते हैं :- 

     लगभग 17 लाख मतदाताओं में बाँटा 7 विधान सभा क्षेत्र में सबसे अधिक आबादी  भूमिहारों (स्वर्ण हिन्दू) की है, इसके बाद मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्गों में कोईरी (कुशवाह) की संख्या ज़्यादा है, उसके बाद यादव और अन्य पिछड़ी जाति भी है । अनुसूचित जातियों की भी अच्छी संख्या है । बख़री विधान-सभा “आरक्षित वर्ग” के लिए है ।  साहेबपुर कमल विधानसभा का निर्माण 2010 में हुआ है जहाँ मुस्लिम और यादव की पकड़ है । तेघरा को परिसीमन के बाद फिर से 2010 में विधान-सभा बनाया गया है यहाँ भूमिहार तो हैं पर CPI के कैडर की संख्या भी है । बख़री में अनुसूचित जाति की संख्या है और मटिहानी एवं बेगूसराय’  में भूमिहारों का वर्चस्व है ।  

भूमिहारों का CPI से BJP का सफ़र          :- कन्हैया की मुश्किल ।  

इसमें कोई शक नही है कि - पूरब के लेनिनग्राद समझे जाने वाला बेगूसराय’  वामपंथियो का गढ़ माना जाता था । 1995 तक बेगूसराय’  के 7 में से 4 विधानसभा CPI के नियंत्रण में था, परंतु बिहार में लालू राज आने के बाद भूमिहारों और स्वर्णों को सत्ता द्वारा कुचलने का सिलसिला प्रारंभ हो गया । भूमिहारों की रणवीर सेना और माले के बीच कई जातीय नरसंहार हुए,इससे बेगूसराय’  के भूमिहारों का भी वामपंथ से दूरी होती गयी , और भूमिहारों का झुकाव कोंग्रेस् की तरफ़ होने लगा परंतु 1997 में जब उस वक़्त के कोंग्रेस अध्यक्ष “सीताराम केसरी” ने बिहार की राबड़ी सरकार (RJD) को समर्थन दे दिया तो भूमिहार कोंग्रेस से नाराज़ हो कर उस वक़्त की समता पार्टी (ज़ोर्ज फ़र्नांडिस और नीतीश वाली) जो BJP के गठबंधन के साथ थी उसके साथ चले गए ।   

गरिराज सिंह के पास उपाय  :-

गिरीराज के पास बेगूसराय  जीतने के दो ही मंत्र है- एक तो वो अपनी कट्टर हिन्दू छवि को भूमिहारो और अन्य हिन्दू जातियों में भजाने की कोशिश करे और नरेंद्र मोदी के नाम पर BJP मतदाताओं को इकट्ठा करें, 
या अंत में बेगूसराय  के मतदाताओं में साप्रदायिकता का विष घोलने का प्रयास करते हुए वोटिंग को 2014 की लोकसभा की तरह हिन्दू-मुस्लिम में बदलने की कोशिश करे । BJP और RSS का कैडेर वोट ही गिरिराज सिंह की नैया को पार लगा सकता है । 
और अंतिम उपाय - कन्हैया के माध्यम से तनवीर हसन के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगवाने की कोशिश करे ।  

तनवीर हसन के पास उपाय :- 

·      कन्हैयाकेसमर्थनमेंजारहेमुस्लिमवोटरकोअपनेपक्षमें करने का प्रयास

·      युवा वोटर को अपने पक्ष में करने का प्रयास करना । 

·      मुस्लिम - यादव (MY) समीकरण को मज़बूत करना । 

·      अपने पुराने राजनैतिक संबंधो का प्रयोग करना क्षेत्र से लेकर बाहर तक  

·     साथ ही साथ कोशिश करना कि - कन्हैया कुमार को अधिक से अधिक से भूमिहार वोट मिल सके ताकि गिरिराज और कन्हैया आपस में उलझ जाए ।

·      अपने पूरे मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखना  

कन्हैया कुमार के पास उपाय:- 

     Ø    बेगूसराय के मतदाताओं के बीच एक हवा बहाने की ज़रूरत है कि - इस बार नया, अच्छा और सच्चा को चुने   
              यदि, जाति- धर्म और पैसे-बाहुबल से ऊपर उठ कर मतदान हुआ तब ही कन्हाई की जीत सम्भव है ।  

Ø बेहदही शांत तरीक़े से सारे युवा वोटर को अपने पक्ष में करना ।

Ø       हिन्दू - मुस्लिम की राजनीति से ऊपर उठे हुए अपने छवि को बरकरा रखने की कोशिश करना ताकि अधिक से       अधिक मुस्लिम वोट मिल सके । 

Ø      गिरिराज के सांप्रदायिकता के माहौल को बनने से रोकना ताकि - भूमिहार वोट ज़्यादा से ज़्यादा मिल सके । 

Ø      अपने CPI के अंतर्गत जितने कैडर वोट है उसे पूर्ण तरीक़े से अपने लिए सुरक्षित करना । 

Ø      अपनी युवा छवि से ज़्यादा से ज़्यादा युवा और सामान्य वोटर को अपने तरफ़ खींचना । 

Ø     बख़री जैसे अनुसूचित क्षेत्र के विधान-सभा क्षेत्र है उनमे जा कर अपने ग़रीब और साधारण परिवार वाली छवि से उनके दिल को जीतना ।



अंत में 

इस सारे समीकरण और वोट के खेल को जो चीज़ें प्रभावित कर सकती है उसे बिंदुवार लिख रहा हूँ :- 

-    गिरिराज का नीतीश के पास जा कर उसने क्षेत्र में जा कर प्रार्थना करना और नीतीश जी का इस बात को गम्भीरता से न लेना । 
-    नीतीश कुमार का अभी- अभी कन्हैया कुमार के पक्ष में सकारात्मक बयान देना । 
-    तेजस्वी का बेगूसराय’  में कैम्प लगा कर चुनाव प्रचार नही करना । 
-    तेजस्वी यादव का कन्हैया कुमार से राजनैतिक भविष्य हेतु डर । 

कन्हैया की राहें इतनी आसान नही है पर अगर कन्हैया की जीत होती है तो यह जीत कई दशकों तक याद रखा जाएगा और हो सकता है यह भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा और दशा दें ।
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ये सम्पूर्ण लेख लेखक ने अपनी समझ और अपने राजनैतिक विश्लेषण के माध्यम से लिखा है , जीत और हार तो भविष्य के गर्भ में है . 
                                                      :  धन्यवाद 
नोट :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा


आपकाप्रिय, 
डाo मोहम्मद अली 
राजनैतिक एवं सामाजिक विश्लेषक । 
सहायक प्राचार्य, पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी, पटना । 

Email :- janghatfoundation@gmail[dot]com ; ali2011pf@gmail.com

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