मधेपुरा लोकसभासीट  :  एक विश्लेषण

(Seat Number – 19)

मधेपुरा लोक सभा सीट की शुरुआत इस चर्चित पंक्ति से  - “रोम पोप का और मधेपुरा गोप का” । जी हाँ, साथियों ‘गोप’ का । ‘गोप’ अर्थात् - ‘यादवों’ का । जिस तरह मुसलमानो की आबादी वाले बिहार के किशनगंज में यदि शिव-सेना भी अपने किसी उम्मीदवार की घोषणा करेगी तो वो नाम किसी मुसलमान का होगा उसी तरह यादवों के गढ़ “मधेपुरा” से यह नाम ‘गोप’ अर्थात् यादवों का होता है । यही कारण है कि - यादवों को छोड़ किसी और जाति ने आज तक मधेपुरा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व संसद भवन में नही किया है । जातिगत राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र को कैसी दिशा दी है ये चर्चा का विषय है पर “जातिगत वर्चस्व”की ऐसी मिसाल को समझने के लिए एक बार मधेपुरा ज़रूर भ्रमण करें । 

मधेपुरा लोकसभा सीट से पहले प्रत्याशीके रूप में संसद भवन जाने वाले बी पी मंडल, फिर चौधरी राजेंद्र प्रसाद यादव,शरद यादव, लालू यादव और पप्पू यादव का नाम आता है । 90 के दशक से इस सीट पर जनता, “शरद यादव”, “लालू यादव” और “पप्पू यादव” को चुनती आ रही है ।

     1990 के बाद लालू यादव ने जिस करिश्माई तरीक़े से पूरे बिहार (अविभाजित झारखंड ) पर अपना वर्चस्व स्थापित किया है, ऐसे में गोप की नगरी - “मधेपुरा” से 1998 और 2004 में उनका विजयी हो कर संसद भवन पहुँचना बहुत सामान्य सी बात कही जा सकती है । अतः आज “मधेपुरा-सीट” को सामने रख कर बात होगी “शरद यादव” और “पप्पू यादव” पर । 

शरद-यादव और पप्पू यादव की चर्चा होगी तो राजनीति के दो अलग तरीक़े की बात होगी, राजनीति के दो अलग आयामों और दिशाओं की बात होगी । तीन अलग- अलग राज्य से 7 बार “लोकसभा चुनाव” जीत कर संसद भवन जाने वाले शरद यादव का राजनैतिक परिचय देना सूर्य के समक्ष दीपक दिखाना जैसा होगा । मध्य-प्रदेश के होशंगाबाद जिले में - जन्मे “शरद यादव” मध्य प्रदेश के जबलपुर से दो बार उत्तर प्रदेश के ‘बदायूँ’ से एक बार और बिहार के ‘मधेपुरा’ संसदीय क्षेत्र से 4 बार जनता द्वारा चुने गए हैं । शरद जी राजनैतिक हलकों में इतनी पकड़ और इतनी गहराई रखता है कि - 7 बार लोकसभा के सदस्य होने के साथ साथ 3 बार “राज्य सभा” के सांसद भी रह चुकें हैं । केंद्र से लेकर राज्य स्तर पर न जाने कितने पदों को अपनी गरिमामय उपस्थिति से शुशोभित किया है ।

     किसान परिवार में जन्मे शरद जी की राजनैतिक पारी संघर्ष से शुरू हुई है और आज तक वो राजनैतिक जीवन में sanghrshमय है । समाजवादी सोंच के पैरोकार शरद जी ने अपने मेहनत और कार्यकुशलता के बल पर अपनी पहचान पार्टी से ऊपर उठ कर बनायी है यही वजह है कि - उनकी छवि और व्यक्तित्व को किसी एक पार्टी के साथ जोड़ कर देखा ही नही जा सकता है । 

     जानकार कहते है - लालू जी को बिहार की कुर्सी तक पहुँचाने में शरद जी का योगदान है । 08 मार्च 1990 को पटना के गंगा नदी के तट पर स्थित ब्रिजकिशोर हॉल में जनता दल के विधायक दल के नेता चुनने और उसे बिहार के मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बिठाने की क़वायद चल रही थी तो ऐसे में शरद यादव ने लालू जी का समर्थन किया था । केंद्र से विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा भेजे गए पर्वेक्षकों की टीम में शरद यादव भी शामिल थे । उस वक़्त शरद यादव वी पी सिंह की सरकार में मंत्री के पद पर थे । ऐसे दिग्गज नेता जो लालू जी को बिहार का मुख्यमंत्री बनने में सहयोग करते हों और फिर 13वी लोकसभा चुनवा में JDU की टिकट लेकर बिहार के ही ‘मधेपुरा सीट’ से लालू जी को मात देने की योग्यता रखते हों । 

     राजनीति का खेल देखिए, जनता दल युनाइटेड (JDU) की नीव रखने वाले और पार्टी के निर्माण से ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे “शरद यादव” को ही सन 2016 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद सेनिष्काषितकर बाहर निकाल दिया जाता है, और उनकी राज्य सभा की सदस्यता भी छीन ली जाती है । इसके बाद उन्होंने अपनी नयी पार्टी का निर्माण किया और अभी वर्तमान में RJD के चुनाव चिन्ह ‘लालटेन’ के आधार पर मधेपुरा लोकसभा से उम्मीदवार बन कर मैदान में डटें हुए हैं ।  

     मधेपुरा के चुनावी मैदान में उनके सबसे निकटतम प्रतिद्वंदी के रूप “कोसी के सपुत्र”- राजेश रंजन उर्फ़ “पप्पू यादव” का नाम सामने आता है । बिहार के  पूर्णिया जिले में जन्मे “पप्पू यादव”  नेता जी के नाम से पूरे कोसी क्षेत्र ही नही बल्कि पूरे बिहार में चर्चित हैं । शरद यादव से बिलकुल भिन्न इनका राजनैतिक सफ़र निराला और निजी ज़िन्दगी भी काफ़ी उतार-चढ़ाव से भरी है । सुखी-सम्पन्न परिवार में जन्मे पप्पू यादव को शुरू ही लोगों के बीच रहना और समाज में कुछ अलग करने की मंशा थी । बिहार में पहले बाहुबली, फिर रॉबिन हुड और अपने कार्यों से समाजसेवी की अलग- अलग छवि बनाने वाले नेता जी ने अपने दम, क़ाबिलियत और जनता के प्यार के बदौलत देश भर में चर्चित हो चुकें है । 
    
     ये जनता के प्यार का ही सबूत है कि - कोसी के अलग अलग लोकसभा सीट से कुल पाँच (5) बार सांसद बन कर जनता का प्रतिनिधित्व किया है । पप्पू यादव ने अपने राजनैतिक सफ़र की शुरुआत 1990 में मधेपुरा जिले के सिंघेश्वर विधान सभा से विधायक बन कर किया था । 1991, 1999, 1996, 2004 और 2014 में अलग अलग पार्टी के टिकट से लोकसभा पहुँचने वाले पप्पू यादव ने यह दिखला दिया कि - उन्हें राजनीति करने के लिए और सफल होने के लिए किसी पार्टी के रहमो-क्रम की ज़रूरत नही है । 

     पिछले लोकसभा चुनाव में, RJD पार्टी से लालू जी की धर्म पत्नी राबड़ी देवी और उनकी सुपुत्री मीसा भारती मोदी लहर में सिमट गयी वही पप्पू यादव ने RJD की साख बचाते हुए मधेपुरा लोकसभा में NDA के उम्मीदवार और क़द्दावर नेता शरद यादव को पटखनी दे दिया । इस चुनाव बिहार के कुल 40 सीट से मात्र 4 सांसद RJD के खाते में गए थे और RJD के सहयोगी के रूप चुनाव लड़ने वाली कोंग्रेस पार्टी के केवल 2 सांसद चुने गए, जिसमें एक सुपौल से पप्पू यादव की धर्म-पत्नी रंजीत रंजन का नाम है । रंजीत रंजन कोंग्रेस की एक महत्वपूर्ण नेत्री के रूप में बिहार से उभर कर सामने आयी है जो इस बार (2019) के चुनाव में भी सुपौल लोकसभा से महा-गठबंधन की उम्मीदवार है । 

     2014 में मधेपुरा से सांसद बन कर RJD की लाज बचाने वाले पप्पू यादव को 7 मई 2015 को पार्टी से निकाल दिया गया है । शरद यादव की तरह पप्पू यादव ने भी 9 मई 2015 को बिहार में “जन-अधिकार पार्टी(लोo)” का गठन कर लिया और 2015 की विधान सभा चुनाव में 64 सीट पर चुनाव लड़े । इस 2019 लोकसभा चुनाव में अपनी ही पार्टी के चुनाव चिन्ह “हॉकी और बॉल” पर मधेपुरा लोकसभा सीट पर शरद यादव के सामने उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए है । 

मधेपुरा लोकसभा की चर्चा होगी तो 2019 में इसी रण- भूमि से दो-दो हाथ करने वाले तीसरे उम्मीदवार - की चर्चा भी बनती है । शरद - यादव और पप्पू यादव के बीच ख़ुद को स्थापित करने की कोशिश करने वाले “दिनेश चंद्र यादव” का जन्म सहरसा जिले में हुआ है । मधेपुरा लोकसभा चुनाव में “दिनेश चंद्र यादव” और उनका जन्म स्थान “सहरसा” के महत्व का पता जल्द ही लगने वाला है ।   

     क़रीब 30 वर्ष पहले सन 1990 में बिहार विधान सब के सदस्य के रूप में अपनी राजनैतिक पारी की शुरुआत करने वाले “दिनेश चंद्र यादव” 1996, 1999 और 2009 में लोकसभा चुनाव भी जीत चुके हैं । 2009 में बिहार के ख़गड़िया लोकसभा सीट से JDU के टिकट पर जीत कर लोकसभा पहुँचे थे । JDU पार्टी में काफ़ी पकड़ रखते हैं और वर्तमान में नीतीश सरकार के मंत्री भी रह चुके हैं । 

मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र  :- 

यादव लैंड से मशहूर मधेपुरा लोकसभा के बारे में अधिक लिखने की आवश्यकता नही है । बेशक यहाँ यादवों की भरमार है और यादव समर्थन के बिना कोई उम्मीदवार अपने सफ़ल होने का सपना नही देख सकता है । महत्वपूर्ण बात यह है कि - 6 विधान सभा को अपने अंतर्गत समाहित किए हुए मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र ‘मधेपुरा’ और ‘सहरसा’ दो जिले तक अपना पैर पसारे हुआ है ।
2008 के परिसीमन के बाद मधेपुरा और सहरसा दोनो जिले में 3 – 3 विधान सभा क्षेत्र हैं, जिसे मिला कर मधेपुरा लोकसभा की रेखा खींची गयी है । बिहारी-गंज, आलम-नगर, और मधेपुरा नामक तीन विधान-सभा मधेपुरा जिले में स्थिति है और सहरसा, महेसी और सोनबरसा नामक तीन विधान सब सहरसा जिले के अंतर्गत आता है । इनमें सोनबरसा को 2015 में आरक्षित विधान-सभा क्षेत्र घोषित कर दिया गया है । 

6 विधान सभाओं का परिचय :- 

     मधेपुरा ज़िला के अंतर्गत आने वाले तीन विधान सभा में पहला - बिहारीगंज  विधान सभा की रूप-रेखा 2008 के परीसीमन में तय हुई है अतः यहाँ 2010 और 2015 में दो विधान सभा चुनाव हुए है । दोनो बार यहाँ से JDU के उम्मीदवार ने बाज़ी मारी है । यह क्षेत्र NDA के समर्थकों के पक्ष में झुकी हुई नज़र आती है । दूसरे विधान सभा ‘आलम-नगर’ की बात करें तो आलमनगर विधान सभा की सीट भी JDU के खाते में जा रही है पर यादव मतदाताओं की बहुलता के कारण पिछले 20 वर्षों से नरेंद्र नारायण यादव यहाँ से विधायक बनते आ रहें हैं । मधेपुरा विधान सभा क्षेत्र से पिछले 2 चुनाव से RJD के चंद्रशेखर के सर पर जीत का सेहरा बंध रहा है । 

     अब बात करते 3 और विधान सभा पर जो मधेपुरा लोकसभा के अंतर्गत आता है पर सहरसा जिले में स्थित है । सबसे पहले बात करते हैं - सहरसा विधान सभा सीट पर । 2005 से 2010 के बीच हुए 3 विधान सभा चुनाव में यहाँ से जीत की हैट्रिक BJP के उम्मीदवार ने लगायी है, परंतु 2015 में नीतीश कुमार की BJP और लालू प्रसाद की RJD के संयुक्त चुनाव लड़ने से BJP का पलड़ा कमज़ोर हो गया था और यह सीट RJD के उम्मीदवार अरुण कुमार के झोली में चली गयी । महेसी विधान सभा सीट पर मुस्लिम और यादव मतदाताओं की मज़बूत पकड़ है, अतः पिछले 2 विधान सभा चुनाव से यह सीट RJD के खाते में जा रही है और उम्मीदवार रहे हैं - “डाo अब्दुल गफ़ूर”। मधेपुरा लोकसभा का अंतिम विधान सभा “सोनबरसा” को भौगौलिक रूप से काफ़ी सुदूर और बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र के माना जाता है । ये आर्थिक रूप से भी काफ़ी पिछड़ा है और यहाँ शिक्षा की स्थिति भी काफ़ी दैनीय है , इन्ही कारणो की वजह से सन 2015 में इसे आरक्षित विधान सभा घोषित कर दिया गया है । यहाँ मुस्लिम, यादव, पिछड़ा वर्ग और अति-पिछड़े वर्ग की बहुलता है । 1990 में लालू प्रसाद के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस सीट पर कोंग्रेस और RJD का दबदबा रहा है पर 2015 में इसे SC सीट घोषित होने के बाद और लालू नीतीश के साथ होने पर यादव वोट का जादू एक बार फिर चला और यहाँ से विधायक बने महा-गठबंधन के - “रत्नेश सदा”  । 

2019 लोकसभा :-

     विधान सभाओं के समीकरण से साफ़ दिखता है कि - यादव समर्थित मतदाता ही यहाँ से लोकसभा सीट पर भी बाज़ी मारेगा पर मज़ेदार बात यह है कि - 2019 के इस चुनावी मैदान में जो तीन धुरंधर मैदान में है - वो तीनो ‘यादव’ है । महगठबंधन उम्मीदवार - “शरद यादव”,  NDA उम्मीदवार - दिनेश चंद्र यादव और जन- अधिकार पार्टी से - ‘पप्पू यादव’ । 

     तो कल होने वाले मतदान में असली परीक्षा उम्मीदवार की नही बल्कि - मतदाताओं की होने वाली है । यादवों को तीन टुकड़े में बँटना है या एक जुट हो कर मतदान करना है । 

उम्मीदवारों के पक्ष - विपक्ष  । 

पहला :- 

NDA के दिनेश चंद्र यादव की बात करें तो - इनके पास मोदी का नाम और नीतीश का साथ है । कमल की बात करने वाले किसी की नही सुनते और जो मोदी के साथ है वो इनके साथ है । सहरसा के जन्मे “दिनेश चंद्र यादव” सहरसा के तीन विधान-सभाओं में अच्छी पकड़ रखते है और इन तीन लोक सभाओं में मौजूद मतदाताओं के सहारे पप्पू से लेकर शरद तक सब का खेल बिगाड़ सकते हैं । साथ में - “ एक बार फिर मोदी सरकार का नारा और RSS का कैडर वोट इनकी तरफ़ झुका है । यादव तो वो है ही । जिनती मज़बूत लड़ाई पप्पू और शरद के बीच होगी उतने प्रसन्न “दिनेश” जी नज़र आएँगे । 
     इनका एक ही नारा है - “ आधे पप्पू में बँट जाओ और आधे शरद में” 

दूसरा :- 

RJD के शरद यादव की बात करें तो - 4 बार मधेपुरा से सांसद रह चुके हैं तो गली- मोहल्ले का नक़्शा से लेकर वोट बैंक का अड्डा भी पता है । गले में लालटेन है तो मुसलमान पीछे - पीछे आने की सम्भावना है । NDA गठबंधन से 4 बार जीत दर्ज किया है तो - NDA के वोट बैंक को भी तोड़ना आता है । मंझे हुए नेता है, राष्ट्रीय छवि है । 
     इनकी मुश्किल यह है कि- इन्हें समझ में नही आ रहा है कि- मतदाताओं को “दिनेश चंद्र यादव” और पप्पू यादव में कैसे बाँटा जाए । आज तक लालटेन के मतदाताओं को अपने पास लाने का अनुभव नही रहा है । 4 बार MP रह छुए है पर काम गिना कर वोट माँग ले तो कहीं ज़मानत न ज़ब्त हो जाए । मधेपुरा के अंतर्गत जो विधान सभा यादव और मुस्लिम बहुल नही है वहाँ इनकी हालत ख़राब हो सकती है । सहरसा के तीन विधान-सभा पर वोट प्रतिशत कम रहने की सम्भावना है । 
       
तीसरा - 

कोसी का बेटा, जनता का लाल और ग़रीबों के मसीहा के नाम से अपने क्षेत्र के मतदाताओं में चर्चित पप्पू यादव की राह सिर्फ़ लालटेन ने बढ़ाई है । जनता का सहयोग ऐसा है कि - लालटेन ले कर आते तो मधेपुरा से नया कृतिमान लिख देते पर धाराओं के विपरीत चलने वाला पप्पू- यादव शुरु से असम्भव को ही सम्भव बनाता रहा है । 

     इनके समर्थकों की ना कोई जात है, न कोई धर्म और न कोई बोली, समाज के हर वर्ग के लिए दोनो हाथ खोल कर और उनके दुःख में उनके गले लग कर रोने वाला देश का प्रथम सांसद कहा जा सकता है । मतदाता कहते है-  आँसू सूखने से पहले दरवाज़े पर पप्पू यादव की गाड़ी लग जाती है । उसी वक़्त न्याय की प्रक्रिया शुरू हो जाती है । जो पप्पू के है वो न “नरेंद्र दामोदर दास मोदी” से हिलने वाले है और ना “राहुल- गांधी” से पर जो नियत और नीति से हट कर अपने वंशानुगत परंपरा को वोट देते है उनका कुछ कहा नही जा सकता है । विरोधी भी इनके काम को स्वीकारते है, इनके मेहनत को स्वीकारते है पर अतीत का बोझ दूसरी तरफ़ झुका देता है - ये वहाँ की जनता के शब्द है। 

     इस त्रिकोणीय लड़ाई में - जनता अगर अपना संसद चुनने के लिए मत देगी तो पप्पू यादव को मधेपुरा से कोई नही रहा सकता है , अगर मोदी को प्रधान-मंत्री बनवाने के लिए मतदान करेगी तो - “शरद चन्द्र यादव” को और अगर लालू जी के सुपुत्र के भविष्य निर्माण का ठेका मधेपुरा की जनता ने ले रखा है तो - “शरद यादव” को पाँचवी बार मधेपुरा से सांसद बना कर दिल्ली भेजेगी और उनसे मिलने के लिए दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जा कर उनका प्रतीक्षा करेगी । 

“इस ताले की चाभी जनता के पास है - यही लोकतंत्र का मूल मंत्र है”

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ये सम्पूर्ण लेख लेखक ने अपनी समझ और अपने राजनैतिक विश्लेषण के माध्यम से लिखा है , जीत और हार तो भविष्य के गर्भ में है . 
                                                       : धन्यवाद 

विशेष :- 
जो साथी सामजिक और राजनैतिक रूप से ख़ुद को अपने आस- पास के साथियों को जागरूक करना चाहतें हैं, वो मेरा YOU-TUBEका कार्यक्रम -“लोकतंत्र का मूल-मंत्र” ज़रूर देखें जो हर रविवार - “JANGHAT FOUNDATION” नामक YOU-TUBE चैनेल पर प्रस्तुत होता है । 



आपकाप्रिय, 
डाo मोहम्मद अली 
राजनैतिक एवं सामाजिक विश्लेषक । 
सहायक प्राचार्य, पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी, पटना । 
Email :- janghatfoundation@gmail[dot]com ; ali2011pf@gmail.com

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