“Demographical Evaluation of Indian Economy”

“भारतीय अर्थ-व्यवस्था का जनसंख्यकीय मूल्याँकन”


अगर कोई मुझसे यह पूछे कि - अर्थ-शास्त्र की सबसे आसान परिभाषा बताएँ ?तो मेरा उत्तर होगा  :- “अनुमान/उम्मीद का शास्त्र”। यह वह शास्त्र है जहाँ व्यक्ति अपना पैसा लगाने से पहले भविष्य में उस पैसे के बढ़ने की उम्मीद और अनुमान करता हैं । 

अर्थ-शास्त्र की पूरी परिधि में जितने भी संसाधन है, उनमे सबसे महत्वपूर्ण -“मानव-संसाधन”को समझा जाता है । यह “मानव-संसाधन” ही है, जो किसी देश के उत्पादनसे लेकर उपभोगतक में अपनी भूमिका के माध्यम से उस देश की GDP पर सकारात्मक असर डालते हैं । 

देश के कार्यरत जनसंख्या अपने कार्यों से GDP को आगे ले जाने में लगे होते हैं और बेरोज़गार युवा, सेवानिवृत बूढ़े और वो तमाम लोग जो किसी तरह का कार्य नही करते हैं वो देश की GDP पर निर्भर या आश्रित रहते हैं । 

भारत के संदर्भ में समझते हैं :-  

पिछले 20 वर्षों से अर्थात् (सन 2000)से हम सब यह सुनते आ रहे हैं कि - भारत - “युवाओं का देश है”। स्वभाविक है वो सभी युवा अब वयस्क हो चले हैं, जिन्हें हर हाल में काम चाहिए । यदि उन्हें रोज़गार और काम नही मिलता है तो वो देश की GDP को बढ़ाने के बजाए किसी न किसी रूप में GDP पर निर्भर हो जाएँगे ।  

भारतकीअर्थव्यवस्थाकेइतनीतेज़ीसेबढ़नेकेसबसेबड़ाकारणथा- भारतकी “युवा-आबादी”। अब यह युवा आबादी वयस्क हो चली है और देखते देखते 15 से 20 वर्षों में बूढ़ी हो जाएगी । 

एक आँकड़ा देखें :- 

1970- 1980 की तुलना में हमारे देश की जनसंख्या वृधि की दर अपेक्षाकृत बहुत कम हुआ है । आज देश का प्रजनन दर बहुत कम हो चुका है । दस वर्ष बाद (2030-2041) प्रजनन दर 1 % हो जाएगा । 

0 से 19 साल के युवा :- 

2011 से 2020 में - 40 % है । देश की प्रजनन दर कम होने से  2041तक ये - 25 % हो जाएँगे । 

2020 – 2031 तक :- 

काम-गार लोग की आबादी हर साल 97 लाखकी दर से बढ़ेगी । इससे काम करने वाले लोग रोज़गार की ज़बरदस्त माँग करेंगे जो अभी भी कर रहे हैं । अतः 2020 से 31 तक हमारे देश में भयंकर बेरोज़गारी होने वाली है ।  

परंतु 2031 से 2041 के बीच यह 42 लाख की तेज़ी से घटने लगेगी । 
समस्या

असुरक्षित रोज़गार

भारत में क़रीब 70 % से ज़्यादा लोग Contractualरोज़गार से जुड़े है । अब तो सरकार ने सरकारी-नौकरी में भी पेन्शन बंद कर दिया है और कई सरकारी नौकरी भी अनुबंधपर लग रहे हैं जिसे - “Ad-Hoc”नाम दिया गया है ।    
अभी कॉलेज से पढ़ कर निकलने वाले जो युवा है उन्हें - 2020 से 2031 के बीच जो नौकरी लगेंगे उन्हें किसी प्रकार की कोई social sec नही होगी, कोई पेन्शन नही, कोई gratuity नही, परिवार का चिकित्सा नही, कोई भविष्य की सुरक्षा नही । रोटी के लिए उन्हें नौकरी तो करनी ही होगी ।  

बड़ी समस्या :- 

देश के बेरोज़गारों को छोड़ दें, देश में रोज़गार लोगों की बात करें तो देश की 40 से 45 %कामगार लोग की मासिक पगार 10 से 15 हज़ारमात्र है । (मज़दूर वर्ग) ।  

मुख्य समस्या को समझें ।

ऐसे लोग जो अधिकतम 20 हज़ार और न्यूनतम 10 हज़ार महीना कमा रहे हैं या कमाएँगे, ये तो जैसे- तैसे अपना रोटी-कपड़ा-दवाई का जुगाड़ कर अपने वर्तमान का गुज़रा कर रहे हैं इनसे भविष्य के लिए पैसे बचाने की उम्मीद क्या रखी जा सकती है??  
आने वाले 10 से 15 साल में ये बूढ़े हो जाएँगे । इनकी निर्भरता किस पर होगी । इन्हें अस्पताल, रोटी, और मूलभूत-सुविधा कौन देगा ???? इनके पास अपने भविष्य के लिए तो कुछ बचा ही नही ???

हमारे देश की आबादी 1 अड़्ब 40 करोड़ है जो बढ़ती जा रही है और आने वाले 20 से 30 साल में देश की आबादी का बहुत बड़ा % बूढ़ा होने वाला है । वो भी ऐसा बूढ़ा-वर्ग जिनके पास अपनी जान-माल, रोटी- कपड़ा और मकान के लिए ख़ुद का बचाया हुआ कुछ नही नही होगा । ये न तो GDP को बढ़ाने के लिए अपना योगदान दे सकते हैं और न ही अपने बचाए हुए पैसे से अपना गुज़ारा कर सकते हैं । ये पूर्णतः सरकार पर निर्भर होंगे ? 

सरकार की दिक्कत 

करोड़ों- करोड़ की इस ‘बूढ़ी-आबादी’ को इलाज के लिए मुफ़्त अस्पतला, रहने के लिए घर और 2 वक़्त की रोटी सरकार नही दे सकती है । क्यूँकि इनकी संख्या इतनी ज़्यादा होगी और सरकार ने अभी से इसके लिए न तो कोई बचत (saving) किया है और ना ही कोई योजना (प्लान) बनाया है ।   

Alvin Toffler एक अमेरिकी लेखक और Futurist हैं। उन्होंने अपनी एक पुस्तक - “Future Shock” में लिखा है कि :- 

“भविष्य हमारे उम्मीद से बहुत पहले आ जाता है और वो वैसे नही आता है जैसा हम सोंचते है” 
अब भारत को ही देख ले, कुछ वर्ष पहले हम भारतीय सोंच रहे थे कि - हम दुनिया की सबसे तेज़ भाग रहे - अर्थ-व्यवस्था हैं और आज हमारी सरकारी आँकड़े बता रहे है कि - “हमारी हालत ख़राब है” 

अतः आज हमारे देश को अपने आर्थिक सुधार भविष्य को ध्यान में रख कर करना होगा । ऐसी योजना बनानी होगी कि - बूढ़े हो रहे करोड़ों- करोड़ लोग के मूलभूत सुविधा की व्यवस्था हो सके, क्यूँकि इन्होंने तो अपना जीवन GDP को बढ़ाने में गुज़ार दिया और आने वाले समय में इनके पास कुछ नही होगा । ऐसी स्थिति में इनका आसरा कौन होगा ? यदि उस वक़्त ये GDP पर केवल बोझ बन कर रह जाएँगे तो ऐसी हालत में हमारे देश की GDP भविष्य में और नीचे गिरने लगेगी चाहे आज हम कितने भी आर्थिक सुधार कर लें । 


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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें  . 


धन्यवाद ।                                                     सम्पर्क  
डाo मोहम्मद अली ।                                 7903892791     
सहायक प्राध्यापक,                        (janghatfoundation@gmail॰com)
पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी, पटना ।             (Janghat.blogspot.com)

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