“J.N.U”

अगर आप JNU को सिर्फ एक “University” समझते हैं तो आपको इसे मेरी नज़रों से देखने और समझने की जरुरत है और कम से कम एक बार तो इस आलेख को जरुर पढने की जरूरत है.
              “JNU – JNU  बहुत जानते हो........
            क्या तुम इसकी गहराई पहचानते हो ?”  

तो चलिए, समझते है  - JNU को :-

    आज जीवन में पहली बार मुझे JNU में प्रवेश करने का अवसर मिला मुझे थोड़ी देर में ही पता चल गया कि – क्यों, अभीजीत बेनर्जी ने “Amartya-Sen” और ‘Dr. Manmohan Singh’ जैसे अध्यापकों के अनुभव से लबरेज Delhi school of Economics को किनारे करके JNU को चुना.

    यदि आप JNU के परिसर को मात्र शिक्षा-ग्रहण करने का स्थान, यहाँ के 10 मंजिला पुस्तकालय को “ज्ञानार्जन करने का कक्ष”, और यहाँ के मनोरम वातावरण को “प्रकृतिक सुन्दरता का केंद्र” समझते हो तो माफ़ करे मुझे पर आपको अपने नज़रिए को थोडा सा विस्तृत करने की जरूरत है.

वास्तव में, JNU एक विचार है. एक ख्व़ाब है, एक सपना है. देश के प्रथम प्रधानमंत्री “पंडित जवाहरलाल नेहरु” जी का वो सपना जो उन्होंने देश की लोकतांत्रिक मजबूती और विविधता को बनाए रखने के लिए सन 1969 में देखा था.

    “अभिव्यक्ति की आज़ादी” को जिन्दा रखने का सपना, सकारात्मक आलोचना को स्वीकार करने का सपना. निर्भीक हो कर सत्ता से प्रशन पूछने का सपना. वैचारिक विभिन्ताओ को एक मंच पर बनाए रखने का सपना, जहाँ किसी एक विचार-धारा को ज़बरन थोपा नही जा सके, जहाँ छात्रों की बीच मतभेद तो हो पर मन-भेद न हो. एक ऐसा गुलिस्तां बनान का सपना – “जहाँ हर फूल की अपनी अलग ख़ासियत हो और कांटो का भी अपना वजूद हो”.

“खुली हवा में उड़ना तो फ़ितरत है JNU की
 परिंदा क्यों, किसी शाख-ए-शज़र का हो जाए ?”
                                          (शज़र – पेड़)
    ऐसे लोकतान्त्रिक, बौधिक और जीवन्त परिसर को अब तक जिंदा रखने में जिन छात्र-छात्राओ ने अपना योगदान दिया है, आज वो राष्ट्र ही नही बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर चमचमा रहें है. उनकी चमक देश और JNU को गौरवान्वित कर रहे हैं और निसंदेह आगे भी गौरवान्वित करते रहेंगे.

    JNU की हवा छात्रों को पढ्ने से लड़ने तक का होंसला देती है. यहाँ की पुस्तकालय बच्चों को सत्य के लिए लड़ने (सत्याग्रह करने), और 'ज़ुल्म के खिलाफ़' आवाज़ उठाने की हिम्मत देती है.

“गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे ज़ुल्म देख कर कहा था– “ज़ुल्म करने वाले से ज्यादा बदतर जुल्म सहने वाला है, क्यूंकि इनकी खामोशी ज़ालिमो को ज़ुल्म करने की प्रेरणा देती है.  यहाँ की शांत-लिब्रेरी में गाँधी जी के अल्फ़ाज़ गूंजते रहते हैं. बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था – ‘शिक्षित बनो’, ‘संगठित रहो’ और “संघर्ष करो” . ऐसा लगता है – JNU के पेड़-पौधे 'बाबा साहब' की यह वाणी गुनगुनाते हैं. भगत सिंह ने जिस दिन “एसेम्बली” पर बम फेंका था उसी दिन, अंग्रेजो से माफ़ी मागने के बजाए फँसी के फंदे को चूमना ज्यादा बेहतर समझ लिया था. छात्रों में ऐसे ही संकल्प की दृढ़ता का परिचय JNU के Convention Centre में जाते ही महसूस होता है .

    यह वो जगह है – जहाँ बच्चे दिन गुजारते नही, जीते है. ये वो जगह है जहाँ बच्चे पढ़ते नही सीखते है. JNU वो मंदिर नही, जहाँ शिक्षा का प्रसाद बंटता हो बल्कि ये तो वो प्रकाश-पुंज है जहाँ संघर्षों से लड़ना, विषम परिस्थितियों में अडिग रहना, सच को बेबाकी से बोलने की हिम्मत और झूठ से नजरें मिलकर उसका सामना करने का हुनर समझ आता है. अपने मूल्यों का निर्माण, सहयोग की भावना और सादगी से भरा जीवन-शैली यहाँ का मूलमंत्र है .

“लाख तलवारें बढ़ी आती हो गर्दन की तरफ़
 सर झुकाना नही आता तो झुकाएँ कैसे ? ”

    कहने की आवश्यकता नही है कि – ऐसे बौद्धिक(Intellectual)  परिसर ही किसी देश की लोकतान्त्रिक मूल्य, गरिमा, अखंडता और देश की विविधता को जीवत रख सकते हैं. परन्तु आज यहाँ की अंतरात्मा पर लगातार भावनात्मक प्रहार किया जा रहा है. दिल्ली सल्तनत की विषैली हवाएं चुपके-चुपके यहाँ पैर- पसार रही है.

    हमें पूरी ईमानदारी के साथ इस बात को स्वीकार करना होगा कि – छात्रों के निजीता पर अंकुश लगाने के मकसद से रची जा रही गहरी साजिश के पनपने में विरोधियों की चपलता से ज्यादा गुनाहगार समर्थको की ख़ामोशी और निजी स्वार्थता है. हो सकता है आप मेरी इस बात से पूर्ण सहमत नही हो पर फिर भी मैं आपकी असहमति का सम्मान करता हूँ और पुरे तर्क के साथ अपनी बात को साबित करने का लोकतान्त्रिक तरीका अपनाना चाहता हूँ .

    मैं अपना तर्क लेख के अगले हिस्से में आपके सामने पेश करूँगा, आपकी सहमती के साथ .

विशेष बात :-
     मैं, JNU “में” तो नही जी सका पर JNU “को” जिया हूँ .

 JNU से जुड़े अपने साथियों के व्यवहार में, उनके विचार, आदर्श और सादगी में, उनकी सहजता, सरलता,  एवं शालीनता में, उनकी महत्वकांक्षा, निर्भीकता और उनकी खुशियाँ से लेकर उनके विश्वाश में .

    अंत में, इकबाल साहब से माफ़ी के साथ एक शे'र सुनते जाए :-

“खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकदीर से पहले
दिल्ली सल्तनत बच्चों से खुद पूछे – बता तेरी रज़ा क्या है ?

 ये लेखक के अपने विचार है .


   Dr. Mohammad Ali                                         
       Assistant Professor                               
 Patliputra University, Patna.

Contact: - 7903892791, 9334302001
Email:- janghatfoundation@gmail.com

Blog: - janghat.blogspot.com


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