इश्क़ में शहर हो जाना - (लव नोट + पुस्तक समीक्षा)
Ishq me Shahr ho jaana…...
:-Ravish Kumar.
मेरे ख़याल से इस लप्रेक (पुस्तक) का नाम - “इश्क़ में रवीश हो जाना” आशिक़ों की स्वतंत्रता को एक नई उड़ान देता । ‘रवीश-प्रेम’ में पढ़ी गयी इस लप्रेक को ‘जीने’ के बाद सबको अपनी दास्ताँ अपने ढंग से लिखनी चाहिए । मेरी कोशिश - मेरे लिए .........
मेरा शहर, मेरे शब्द, और मेरे हिस्से का वक़्त ॰॰॰॰॰॰॰ :- Mohammad Ali
कौन कहता है - “शहर” में ‘जान’ नही होती है । इतने सपने, ख़्वाहिशें, अहसास और यादों को अपने अंदर समेट कर लगातार भागते रहने वाला ‘शहर’ रात की ख़ामोशियों में भी बहुत कुछ कह जाता है. बस, उसे सुनने के लिए हमें और आपको ‘इश्क़’ करना होगा. विद्या-बालन की बहु-चर्चित फ़िल्म “कहानी” की सबसे ख़ास बात थी कि - इस फ़िल्म में “कोलकत्ता-शहर” को एक चरित्र की तरफ़ पेश किया गया था । बेशक शहरें बोलती है ...........
नज़र मिला, हाथ मिला, हो सके तो गले मिल
कुछ तो कर शहर में ‘मोहब्बत’ के ख़ातिर ........
शहर को “आशिक़” नही इंसान की नज़रों से देखने की ज़रूरत है. वो इंसान जो हँसता है - रोता है, अपने लिए राहें ढूँढता है, उगते सूरज को महसूस करता है. अंधेरी गलियों के उन बंद कमरों में भी ज़िंदगी तलाश सकता है, जहाँ सूरज भी अपनी रौशनी बिखेरने से पहले सोंचती होगी. ढ़लते शहर को अपनी ज़िंदादिली से देखना और उगते सूरज को तकिए से छिपा लेने वाला इंसान. “खाप’ के सामने अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़े रहने वाला प्रेमी, कैसे मेट्रो के महिला आरक्षण में बिछड़ जाता है. फटफटिया पे ज़ुल्फ़ें लहराने से लेकर ऑटो के मिरर से नज़रें चुराने तक का सफ़र कितने अनुभवों से गुजरता है.
तुम साउथ एक्स सी गुजरती हो
और मैं करावल-नगर सा महसूस करता हूँ .....
तुम मुझसे प्यार करते हो या शहर से ?
मेरा शहर तो तुम ही हो ना......
शहर की सबसे ख़ास बात होती है - “शहर कभी बेवफ़ा नही होता” . इश्क़ में ‘बेवफ़ाई’ मिलने वाले प्रेमी और प्रेमिकाओं के सबसे क़रीब क्या होता है ?
- जवाब - ‘शहर’.
वो गलियाँ, वो चाय की दुकान, नदी का किनारा, पेड़ की ओट, गोलगप्पे का चौराहा, वो स्पीड-ब्रेकर जहाँ प्यार में एक ठहराव हुआ करता था. वो पुल जहाँ उनके साथ हवाओं में एक अजब सी ख़ुशबू महसूस होती थी. वो भीड़ जहाँ आपकी नज़रे उसे हज़ारे नज़रों से बचाने को बेक़रार रहती थी. वो सड़क जिसे क्रॉस करते वक़्त कोई हाथ आपको थाम लिया करत था . वो सनेमा के पर्दे जो आपके साथी को आज भी तलाश रहे होते है . सब कुछ तो होता है, वफ़ा-दारी के साथ, ईमानदारी के साथ, आपके साथ, हमारे साथ . शहर कहाँ बईमान होता है ? ? ?
जैसी अलग हुई थी, वैसी हु-बहु नही लगती
मैं तुझसे क्या बात करूँ ?
अब तो, तू- तू नही लगती॰
बेली-रोड की पहचानी सड़कों से फुलवाड़ी की अनजान गलियों तक जाना ही इश्क़ में शहर हो जाना है . इश्क़ का सफ़र आँखो से हो कर दिल तक जाता हो या नही, सड़कों से हो कर गलियों तक ज़रूर जाता है. शहरों की प्रेम कहानियाँ, डाक-बंग्ला और बोरिंग रोड के जाम से बहुत डरती है . इश्क़ में अजनबी न रहे तो इश्क़, इश्क़ नही रहता............क्यूँकि इश्क़ में सिर्फ़ देखना नही होता, P.W.C (Patna Womens College) के पास अनदेखा भी करना होता है.
भटकते मर्ज़ी से अपनी, कहीं भी खो जाते...
हम अपने ‘बस’ के ही कब थे ?
जो तेरे हो जाते
न जाने कितने आशिक़ों के ‘इश्क़’ की गवाही देता “बिसकोमान-भवन” और कितने घरों को बसाने वाला “गोल-घर” एक दूसरे को देखता हुए कहता होगा कि - “ अपनी खूबसूरती पर इतराने वाले ये “बापू-सभागार” और “ज्ञान-भवन” ने प्यार की उन क़समों को कहाँ सुना जिन्हें हम वर्षों से सुनते आ रहें हैं. “कृष्ण-मीमोरियल” के आँगन में खिलने वाला “क्रांतिकारी-प्यार” “रिज़र्व बैंक” के आँखो का मोहताज नही होता.
(ये सभी गांधी मैदान के चरों तरफ स्थित बहुमंज़िल इमारतें हैं )
(ये सभी गांधी मैदान के चरों तरफ स्थित बहुमंज़िल इमारतें हैं )
तुझे किस-किस जगह से अपने अंदर से निकाले हम....
शहर की हर ‘होर्डिंग’ में तुम नज़र आती हो ....
इश्क़ में दुबारा मुलाक़ात हो, इसके लिए बिछड़ना भी ज़रूरी है, पटना जंक्शन हो या पाटलिपुत्रा, बिछड़ने के लिए तो सफ़र का बहाना चाहिए. वापस आने के भ्रम में जीना “इश्क़ का खूबसूरत अहसास” है. किसे खबर, आउट ओफ़ फ़ोकस होती वो ट्रेन वापस तो आएगी पर उसे लेकर नही........ “अब उसने ट्रेन को छोड़ दिया या ट्रेन ने उसे” ये एक राज़ है, जिसे राज़ ही रहना चाहिए क्यूँकि - भ्रम में जीना - इश्क़ का सबसे खूबसूरत एहसास होता है वो भी बिना किसी ‘शर्त’ के.
वो जो कहता था - “कुछ नही होता”
अब जो रोता है तो - “चुप नही होता”.
अच्छा लगा हो तो लिखें हमें - +91- 7903892791 , 9334302001



Living in the illusion of coming back is a "beautiful feeling of love"
ReplyDelete❤️❤️❤️❤️❤️