अकेला आदमी - (भाग -01) कहानी नीतीश कुमार की- (पुस्तक समीक्षा)


 अकेला आदमी -                 पुस्तक समीक्षा
                       ( कहानी  नीतीश  कुमार  की )
   लेखक : संकर्षण ठाकुर. 

{बारीक लिखावट और सूचनाओं के भंडार को अपने अंदर समेटे “279 पृष्ठ” की इस पुस्तक में नीतीश कुमार के जन्म से लेकर पहली बार विधायक बनने और छठी  बार बिहार के मुख्यमंत्री-पद की शपथ लेने की घटना की विस्तृत चर्चा क़िस्सा-गोई अन्दाज़ में दर्ज है.}            

[ मैं चाहता हूँ कि - आपके सामने इस पुस्तक के चेप्टर और इसके अंश हू-बहू न रखे जाए, बल्कि इस पुस्तक का मूल्यांकन बिहार के संदर्भ में सामाजिक और राजनैतिक परिदृश को सामने रखते हुए किया जाए. ]

          आप तमाम पाठकों से अपनी स्वतंत्रता और सुझ-बुझ को शामिल करने की अनुमति लेना चाहता हूँ और अपने शब्दों में इस पुस्तक की समीक्षा करना चाहता हूँ ताकि पढ़ते वक़्त आपके भीतर रोमांच, उत्स्साह, दिलचस्पी और संतोष का भाव बना रहे.]  
                                                                                                                                  :- मोहम्मद अली
लेखक और लेखन के विषय में ‘दो शब्द’ 
सकरात्मक पक्ष - 
·      30 साल के बिहार को 300 पन्नो में क़ैद करना सच में कठिन है. इसके लिए लेखक का धन्यवाद .
सुधार हेतु - 
·      पाठकों के सामने ‘शब्दों से चित्र’ बनाने के प्रयास में बहुत से तथ्यों का इतना विस्तार से लिखा गया है कि पन्ने उबाऊ लगने लगते हैं. 
·      बिहार के 30 साल को इतना उलट-फेर करके प्रस्तुत किया गया है कि - मेरे जैसे रजनीति में दिल-चस्पी रखने वाले पाठक को भी पुस्तक छोड़ कर भाग जाने की इच्छा होने लगती थी . 

(NOTE - समीक्षा  में  केवल ‘लाल रंग’ से लिखे गए शब्द - हू-बहु पुस्तक से उतारे गए हैं )


Ø  पुस्तक ख़ज़ाना -  (पुस्तक में )

नीतीश है-सतीश है, लालू है-चारा है, चोर है-घोटाला है, संघ है-द्वन्द है, निराशा है- निशांत है, संघर्ष है-हार है, अकड़ है-खामोशी है, धेर्य है-निर्णय है, परिवार है-बिहार है, सिनेमा है-शादी है, धोका है-पत्नी है, गठ-बंधन है, ‘जाति’ है जो की ‘ज़ाती’ नही है, महा-गठबंधन है, राज्य से लेकर केंद्र है, कुर्सी है-क़ब्रिस्तान है, अटल से आडवाणी तक राजनाथ से गड़करी तक, मोदी से गोधरा तक और शुशील से जेटली तक,बख़्तियारपुर से दिल्ली तक और 32 विधायक क्लब से 1 अन्ने मार्ग तक लाशें है- आंसू है, बंदूक़ है - क़लम है................ और अंत में 
“ बिहार में बहार है ------- नीतीशे कुमार है ”.

Ø लालटेन  से  तीर तक -
  
किसे पता था, पटना से क़रीब 50 किलोमीटर दूर ‘बख़्तियारपुर’ के एक कच्चे मकान और लालटेन की रौशनी में ‘परमेश्वर देवी’ ने 01 मार्च 1951 को जिस पुत्र को जन्म दिया वो इस राज्य की कुर्सी से लेकर घरों तक लालटने को उखाड़ने के लिए पैदा हुआ है.

      जी हाँ, लालटेन की दुधिया रोशनी को CFL की चमक देने के लिए नीतीश कुमार ने अपने दूसरे शासनकाल में एक दुस्साहसी वादा कर दिया था कि - “अगर वो प्रत्येक घर को बिजली मुहैया कराने में नाकाम रहे तो 2015 के बिहार-चुनाव में वोट माँगने नही जाएँगे. उस वक़्त बिहार की क्षमता 1,300 मेगावाट बिजली उत्पन्न करने की थी जिसे नीतीश के नेतृत्व ने 2,300 मेगावाट के उच्यतम स्तर तक 2015 से पहले पहुँचा दिया था. 

Ø  सच में अकेला और हारा हुआ नीतीश - 

यह कहानी है, पथरीले रास्तों पर चलने वाले एक ऐसे इंसान की जिसने लगातार अपना पहला (1977) और दूसरा (1980) विधान सभा चुनाव अपने ही क्षेत्र से हारने के बाद अपनी पत्नी (मंजु जी) और पाँच वर्षीय पुत्र (निशांत) के सामने जा कर तीसरी और अंतिम प्रयास करने की भीख माँगी थी .  

1972 से रजनीति में कदम रखने वाले नीतीश कुमार 1985 में पहली बार  विधायक के रूप में बिहार विधान-सभा में दाखिल हुए. इन 13 वर्षों के संघर्ष और लगातार 2 हार ने नीतीश कुमार को जीतने का हुनर सीखा दिया था. लगातार दूसरी हार के बाद नीतीश कुमार अपने परिवार, बच्चे और बटुए को देखते हुए “रजनीति से सन्यास” ले कर एक सिविल ठेकेदार बनने का निर्णय ले चुके थे. पुत्र का चेहरा देखने अपने पत्नी के पीहर जाने की विवशता और अपने पिता के सामने ख़ाली हाथ आने का दर्द कोई विवाहित बेरोज़गार ही बता सकता है . 

सन 1980 का वो दिन जब नीतीश मायूस हो कर पटना रेलवे स्टेशन से बख़्तियारपुर की ट्रेन पकड़ने वाले थे मानो सदी का महानायक “अमिताभ बच्चन” 12 फ़्लोप फ़िल्म देने के बाद माया-नगरी को अलविदा कह रहा हो. मगर दर्शकों को ज़ंजीर, दीवार, शोले देखना और बिहार की कुर्सी पर नीतीश कुमार को देखना अभी बांकी था. निर्देशक ने बम्बई स्टेशन परसदी के महानायक से ऐसा क्या कहा कि -  अग्निपथ का विजय दर्शकों की तालियाँ बटोरने लगा, ये तो सही से नही पता, मगर टूटे-हुए नीतीश कुमार के कानों में विजय कृष्ण के वो शब्द गुंजने लगे - “ क्या तुम्हारी परिस्थितियाँ कर्पुरी ठाकुर की परिस्थितियों से ज़्यादा ख़राब है”. ये शब्द नीतीश को संतावना तो नही दे सके मगर उनके अंतरात्मा को ललकारते हुए उन्हें चुनौती देने के लिए काफ़ी थे . 1980 की हार के बाद नीतीश कुमार दिल्ली का रुख़ कर गए .  
{ जहाँ कोंग्रेस विरुध टिकट हासिल करना ही आधी जीत मानी जा रही थी, वैसी स्थिति में नीतीश का दो बार हार जाने की घटना बड़ी रोमांचक है जिसकी विस्तृत चर्चा पुस्तक में है. साथही इस हार के पीछे छिपा "बेलछी नर-संहार" की घटना जिसने इंदिरा गांधी को दुबारा केंद्र की सत्ता में वापस लाने में बड़ा योगदना दिया}

Ø  दिल्ली दर्शन - (रजनीति की पाठशाला) 

व्यक्तिगत हालात और हार से सनकी और चिड़चिड़े हो चुके नीतीश ने खुद को पटना की वातावरण से भी दुर कर लिया । दिल्ली में उन्होंने - चौधरी चरण सिंह, देवी लाल, बहुगुणा और शरद यादव जैसे नेताओ से अपना सम्पर्क बढ़ाया. 1983 में चंद्र्शेखर की बहुचर्चित “भारत-यात्रा” के अंतिम चरण में नीतीश भी शामिल हुए थे. इन चार वर्षों में नीतीश ने इतनी रजनीति तो सीख ही लिया था कि - 1984 के लोकसभा में उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. (उन्हें पता थे कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कोंग्रेस को ज़बर्दस्त बहुमत मिलने वाला है) अतः उन्होंने 1985 की बिहार विधान-सभा में “तन-मन-धन-जान-प्राण-ईमान लेकर जुट गए. अंततः 324 सीटों की बिहार विधान-सभा में एक कुर्सी नीतीश के लिए ख़ाली करवा दिया गया.   
दो वादे :- (पत्नी मंजु को दिए वादे का भी ख्याल था ...........   और दूसरे वादे का चर्चा आगे
होगी जिस वादे ने नीतीश को बिहार की ‘कुर्सी’ तक पहुँचाया )


Ø पटना-दिल्ली-पटना (विधानसभा - लोकसभा - विधान-परिषद) - 

    नीतीश कुमार की सफ़लता का सबसे बड़ा राज़ यह है कि - नीतीश को अपने जीवन में कभी 'कुछ-भी' 'यूँ-ही' नही मिल गया . नीतीश के पासपहुँचने से पहले, छोटी सी छोटी सफ़लता ने अपना क़ीमत वसूल किया है. नीतीश ने इन्ही क़ीमत को चुका कर सफ़लताओं को ख़रीदा है. इन क़ीमत कोचुकाते हुए नीतीश ने बहुत कुछ सीखा, और इस सीख के दौरान नीतीश ने बहुत खोया खोया है . खोने और पाने के इस खेल का नाम ही "अकेलाआदमी" या उस "अकेले आदमी की रजनीति" है.   

         13 साल से विधान सभा में दाखिल होने के लिए तरस रहे 'नीतीश-कुमार' ने अपने शब्द, शैली और गंभीरता का परिचय देते हुए न केवलराजनैतिक गलियारों में अपनी पहचान बनाने में सफ़ल हुए बल्कि मात्र चार वर्ष के अंदर "लोक-दल" के 'बिहार-राज्य अध्यक्ष' और फिर 'जेनरल-सेक्रेटरी' भी बन गए. 

 1980 से 1984 के दिल्ली दर्शन ने नीतीश को यह इल्म दे दिया था कि - दिल्ली की हवा-खोरी के बिना बिहार की रजनीति में अपनी जड़ेमज़बूत करना मुश्किल है. 1985 में MLA बनते ही अगले संसदीय चुनाव की योजना बनाने लगे. बिहार में बढ़ती लोकप्रियता का ही असर था कि - 1989 की नवी(9th) लोकसभा चुनाव में 'बाढ़-लोकसभा' से उन्होंने कोंग्रेस के क़द्दावर नेता "राम लखन सिंह यादव" को 75000 वोटों से हरा दिया.

   हमारी और आपकी तरह "संसद-भवन" को भी शाएद ही यह इल्म होगी कि - नवी(9th) लोकसभा में संसद की कुर्सी पर बैठने वाला यह"अकेला-आदमी" संसद-भवन को तब ही अलविदा कहेगा जब बिहार के मुख्य-मंत्री की कुर्सी उसे बुलाएगी. जी हाँ, 1989 से 2004 तक लगातार 6 बार बिहार के सांसद के रूप में जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले नीतीश कुमार ने संसद भवन से स्तीफ़ा देकर 2005 में बिहार के "मुख्यमंत्री" का पदसम्भाला और अब तक 6 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके है .  

    6 बार 'सांसद' और 6 बार 'मुख्यमंत्री' पद की शपथ लेने की कहानी को परत-दर-परत समझने के लिए आपको संकर्षण ठाकुर की इसपुस्तक के एक-एक पृष्ठ को दिलचस्पी से पलटना होगा.

Ø  लालू चेप्टर -  ( ई त ज़रूरी है ना ? )

      बिहार के रजनेताओं के लिए लालू प्रसाद यादव उस "राजनैतिक चार्वाक" की तरह जिसके शासन का राजनैतिक-खंडन करके ही कोई आगेबढ़ सकता है. नीतीश कुमार भी उससे अछूते नही हैं. "लालू प्रसाद यादव" को 1990 में मुख्यमंत्री की कुर्सी हेतु सहयोग करने वाले नीतीश कुमार यह बात कहाँ जानते थे कि ये 'कुर्सी' वापस लेने में उन्हें न केवल खून-पसीना एक करना होगा बल्कि साम्प्रदायिक सोंच (ख़ुद नीतीश के शब्दों में) को खादडालने वाली "BJP" से भी हाथ मिलाना होगा.

  08 March 1990, गंगा- किनारे का ब्रिज-किशोर भवन, जहाँ "लालू प्रसाद" विधायक दल के नेता चुने गए और राज्य के "मुख्यमंत्री" के रूप में उनके नाम पर मुहर लग गयी. 
(ये क़िस्सा भी दिलचस्प है, जो फिर कभी..........)

  लालू-प्रसाद ने "मुख्यमंत्री" और "मुख्यमंत्री-पति" के रूप में 1990 से 2005 तक बिहार की दिशा और दशा में कैसा परिवर्तन लाया येतो चर्चा का विषय है, मगर इस 15 सालों में लालू ने बिहार में कुछ ऐसा जातीय समीकरण बना दिया, जिसे भेदना अभिमन्यु के चक्रव्यू से भी कठिन था. 

  बिहार के तथा-कथित उच्य-जाति के वर्चस्व को तोड़ने और समाजवादी सोंच को स्थापित करने के उद्देश से नीतीश कुमार ने जिस ‘लालूयादव’ का समर्थन किया था. नीतीश के चश्मे से वो 'लालू-यादव' बदल चुके थे. लालू के साले - "सुभाष और साधु यादव" के अतरिक्त रंजन यादव,प्रेम-गुप्ता और 'कबाब-मंत्री’ के नाम से चर्चित "अनवर-अहमद" जैसे मंडलियो के बीच बैठने वाले लालू को राज्य और राज्य की चिंता कहाँ थी ? 

      बड़े सरकारी अफ़सरों से पीत-दान उठवाने और खैनी लगवाने वाले लालू को जब एक बार नीतीश समझाने गए तो लालू ने कहा :- "सरकारहथियाना चाहता है क्या नीतिश्वा"? लालू ने कहा :- "गवरनेंस से पाँवर मिलता है क्या ? पाँवर मिलता है वोट-बैंक से . तुम हमको राज-पाटसिखाओगे ?   

{यहाँ पर मैं पाठकों से कहना चाहता हूँ कि - जब आप मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार के शासन के तरीक़े और कौशल को बारीकी से समझने का प्रयास करेंगे तो आपको लालू औरनीतीश का (उपर लिखा) सँवाद ज़रूर याद आएगा.}

 फ़िल्वक्त, इतना समझें कि - लालू-प्रसाद ने 1990 में अडवाणी की रथ-यात्रा (राम-मंदिर वाली) को समस्तीपुर में रोक कर एवं 1992 में हुए सीतामढ़ी दंगे में अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण कर के बिहार में “मुस्लिम-यादव”(MY) समीकरण बना लिया. इस दोनो घटना के वक़्त नीतीश कुमार अपनी टीम और अपने समाजवादी सोंच के साथ लालू-यादव के समर्थन में खड़े थे. नीतीश कुमार को इस समीकरण से कोई परेशानी नही थी परंतु वक़्त के साथ नीतीश और नीतीश के गुट को यह अहसास होने लगा कि - (MY)-समीकरण और वोट बैंक का नशा लालू के व्यक्तित्व को ‘राजा’ की तरफ़ ले जा रहा है . एक ऐसा राजा जो सत्य और असत्य को अपने अनुसार परिभाषित करता हो . 

बस, यहीं से शुरू होता है - महाभारत के उस “चक्रव्यू” को भेदने की कहानी. लालू यादव के जेल जाने से लेकर नीतीश कुमार के सत्ता में आने की उठा-पटक.  

ü  नीतीश कैसे तोड़ेंगे (MY)- समीकरण के चक्रव्यू को ?
ü  इस चक्रव्यू को भेदने में अभिमन्यु की भूमिका निभाते हुए कौन शहीद होगा ?
ü  इसमें भाजपा की क्या भूमिका होगी ?
ü  1995 – 2000 और 2005 के विधान-सभा चुनाव की झलकी कैसी होगी ?
ü  सन 2000 में नीतीश को 10 दिन का मुख्यमंत्री क्यों बनना पड़ा ?
ü  बिहार में 2005 में दो बार विधान-सभा चुनाव क्यों हुआ ? 
ü  नीतीश के मुख्य-मंत्री बनने में “राम-विलास पासवान” की क्या भूमिका रही ?
ü  बिहार में RSS ने अपनी जड़े कैसे मज़बूत किया ? 
और
ü  नीतीश ने अपना 15 साल तक अपनी कुर्सी को किस समीकरण से बनाए रखा ?
ü  बिहार में 15 साल में कैसे, क्यों और कब विकास हुआ ?  

     उत्सुकता से भरे, ऐसे तमाम दिल-चस्प और हैरत-अंगेज़ करने वाले प्रशनों का उत्तर पाने के लिए आपको ध्यान-मगन हो कर या तो इस किताब को पढ़ना होगा या मेरे समीक्षा के अगले अंक की प्रतीक्षा करनी होगी.  
क्रमशः..................

अब आपकी बारी !!! 

यदि, आपको लगा आपने कुछ अच्छा पढ़ा और समझा तो अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर भेजें, ताकि- अगली बार आपसे सीख कर हम आपके लिए और बेहतर प्रस्तुत कर सकें. आपके ‘शब्द’ लेखक के प्रेरणा-स्रोत होते हैं.   

राजनीति से जुड़े नए पाठकों को उबासी महसूस न हो इसलिए इस पूरी समीक्षा को टुकड़ों में तोड़-तोड़ कर लिखने का फ़ैसला लिया है. मैं चाहता हूँ - आप अन्य मित्रों को भी इसे अथवा इस पुस्तक को पढ़ने का मशवरा दें क्यूँकि - मैं मानता हूँ की - “हर सामजिक व्यक्ति को एक हद तक राजनीति से जुड़ाव रखना चाहिए. समाज और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलु है”. और यहाँ तो मामला बिहार का है . 

अपना Feedback देने के लिए :- 

janghatfoundation@gmail.com              +91- 7903892791 (W)
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Note :- टंकण संबंधी दोष के लिए क्षमा करें

 धन्यवाद ।
Mohammad Ali 
Assistant Professor 
Patliputra University, Patna. 

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