बिहार विधान सभा ( “2020 में चुनाव - 2025 में सत्ता”)
“2020 में चुनाव - 2025 में सत्ता”
चुनाव आयोग के शंखनाद के बाद बिहार में सियासी गर्मी अपने उफ़ान पर है. इस बार का विधान-सभा चुनाव सिर्फ़ Covid-19 के मामले को लेकर नही बल्कि राजनैतिक मामले को लेकर भी
बहुत ही अलग और अनूठा होने वाला है.
“सिंहासन ख़ाली करो कि- जनता आती है” जैसे क्रांतिकारी नारे गढ़ने वाली बिहार और बिहार की रजनीति में इस बार एक अजीब तरह का ख़ालीपन देखा जा सकता है. यदि आप राजनैतिक सूझ-बुझ से बिहार के वर्तमान राजनैतिक-परिदृश को देखें तो आपके पता चलेगा कि- इस बार के चुनाव (विधान-सभा 2020) में कोई भी राजनैतिक-दल या नेता, सत्ता पाने के लिए संघर्ष नही कर रहा है.
बिहार में “लालू प्रसाद के 15 साल बनाम नीतीश राज के 15 साल” के बाद, आज युवा पीढ़ी के रजनेताओं के बीच संघर्ष सत्ता-पाने का नही बल्कि ख़ुद को स्थापित करने और अपनी पार्टी के जनाधार को बचाने और बनाने का है. अपनी राजनीतिक साख को बचाए रखते हुए लगभग सभी विपक्षी पार्टियों की निगाहें 2020 नही बल्कि 2025 के विधानसभा पर है.
नीतीश कुमार 15 साल से बिहार के सत्ता पर विराजमान हैं. लोकतंत्र में थोड़ी सी लचर प्रशासनिक व्यवस्था होने पर 05 साल में Anti-Incumbency (विरोधी-लहर) का असर दिखने लगता है, पर यहाँ 15 साल से नीतीश सत्ता पर होने के बावजूद भी पुनः “CM की कुर्सी” के लेकर आश्वस्त नज़र आ रहें है. इसका सीधा कारण है कि - विपक्ष “कुर्सी” की नही, बल्कि ख़ुद को स्थापित करने की होड़ में लगा है.
अगर RJD (राजद) की बात करें तो, लालू प्रसाद की ‘लालटेन’ को जब से तेजस्वी ने पकड़ा है तब से उसे आँधियों से बचाते आ रहें हैं. पिछले तीन साल से बिहार में नेता प्रतिपक्ष की कमान को सम्भालने वाले “तेजस्वी-यादव” के नेतृत्व-क्षमता पर विरोधी ही नही बल्कि राजद के सहयोगी दल भी प्रशन-चिन्ह उठाते रहतें हैं. गाहे-बगाहे ऐसी आवाज़ राजद के अंदर से भी आ जाती है जिस पर लालू प्रसाद अपने तरीक़े से शिकंजा भी कसते आ रहे है. ऐसी प्रस्थिति में, तेजस्वी यादव की बेचैनी अपने नेतृत्व-क्षमता को मज़बूत बनाने और राजद के जनाधार को बचाए रखने की है, जिसका लाभ उन्हें 2025 में मिल सकता है.
अब बात करते हैं, LJP (लोक-जन-शक्ति) के चिराग़ पासवान की. जब से चिराग़ पासवान LJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, उनकी नज़र दिल्ली से हट कर बिहार की तरफ़ हो चली. ‘चिराग़-पासवान’ के नज़रों में 2020 का विधान सभा चुनाव वो कड़ी है जिसके माध्यम से LJP पार्टी बिहार में अपना जनाधार बना सकती है और ‘चिराग़-पासवान’ की छवि ‘दलित-नेता’ से आगे बढ़ते हुए ‘युवा-बिहारी-नेता’ के रूप में उभर सकती है, जिसका लाभ उन्हें 2025 में मिलेगा. अतः इनकी लड़ाई भी 2020 की नही 2025 की है.
जाप (जन-अधिकार पार्टी लोo) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू-यादव पिछले 2 वर्षों से बिहार में तीसरे मोर्चे की क़वायद में अपना हर सम्भव प्रयास कर रहें हैं. कभी चिराग़ पासवान तो कभी माँझी के नेतृत्व में बिहार की अगुवाई को स्वीकार करने वाले “पप्पू-यादव” ने अंततः बिहार में तीसरे मोर्चे के रूप में चंद्र्शेखर-आज़ाद की (ASP), BMP(बहुजन मुक्ति पार्टी) और SDPI (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी) के साथ मिल कर PDA (Progressive Democratic Alliance) नामक तीसरे मोर्चे का निर्माण कर लिया.
RLSP (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) के उपेन्द्र कुशवाह, VIP(विकाशील इंसान पार्टी) के मुकेश-सहनी और HUM (हिंदुस्तानी-अवामी-मोर्चा) के जीतन-राम-माँझी जैसे नेता अपनी पार्टी को उस तरफ़ ले जाने के फ़िराक़ में हैं, जहाँ रह कर उनकी और उनकी पार्टी की दाल-रोटी चलती रहें. अतः इन्हें न तो 2020 के चुनाव से मतलब है और न ही 2025 के चुनाव से.
(लेखक का स्वतंत्र नज़रिया)
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :-
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