नीतीश की रोशनी को बुझाने वाला “ चिराग़ ”
“क्या इस बार भी नीतीश कुमार ?
जोड़ से लेकर तोड़ तक, चाणक्य की बुद्धि से लेकर बुद्ध के मौन तक, 2005 से लेकर 2020 तक, बिहार की गद्दी पर ‘नीतीश-कुमार’ विराजमान है.
दलितों को तोड़ने वाला, जातियों को फोड़ने वाला, महिलाओं को अपना वोट-बैंक से जोड़ने वाला, विपक्ष को हथिया कर, दुश्मनों को अपना कर और विरोधियों को मिलाकर जिसे कुर्सी पर बने रहना आता हो, उसका नाम है - ‘नीतीश कुमार’. सत्ता पर बने रहने की अद्भुत कला के इस स्वामी को क्या इस बार ‘कुर्सी’ नसीब होगी ? क्या विपक्ष में इतनी एकजुटता और इतना जनाधार है, जो नीतीश के तिलिस्म को तोड़ सकेगी?
बिहार में तीसरे मोर्चे की क़वायद इस बात का सबूत है कि - विपक्ष एक-जुट तो हो सकी है मगर गोलबंद नही. PDA (Progressive Democratic Alliance) नामक तीसरे- मोर्चे में JAP, SDPI, ASP और BMP जैसी पार्टी एक जुट हुई है और इन्होंने कोंग्रेस, LJP और VIP जैसी पार्टियाँ को अपने पाले में आने के लिए निमंत्रण दिया है, जिससे नीतिश कुमार की चिंता बढ़ायी जा सके.
तीसरे मोर्चे PDA को अच्छे से पता है कि - कोंग्रेस जैसे बड़े ब्रांड का साथ मिलने से नीतीश पर वार भी किया जा सकता है और तेजस्वी को कमजोर भी किया जा सकता है. LJP का जुड़ाव तीसरे मोर्चे को “चिराग़” जैसा युवा नेतृत्व और “मुख्यमंत्री-चेहरा” दोनो प्रदान कर सकता है. कोंग्रेस पार्टी, तेजस्वी का साथ और लालू का विश्वास तोड़ कर किसी अन्य के साथ चली जाए इसकी सम्भावनाए कम ही दिख रही है, मगर “चिराग़-पासवान” पिछले एक साल से ख़ुद को बिहार की राजनीति में स्थापित करते हुए नीतीश पर लगातार हमलावार रहे हैं. तीसरे मोर्चे से चिराग़ पासवान का जुड़ाव, एक-साथ नीतीश और भाजपा दोनो को चोट पहुँचा सकता हैं. इसका सीधा असर बिहार में UPA गठबंधन को भी हो सकता हैं.
इस विधान-सभा चुनाव में ‘चिराग़-पासवान’ वो कड़ी है, जो चुनाव-पूर्व (Pre-Election) और चुनाव-बाद (Post-Election) नीतीश के अश्वमेघ-रथ को रोक सकते हैं. 15 साल से सत्ता में रहते हुए भी “कुर्सी” का वनवास काट रही भाजपा इस बार “चिराग़” के सहारे “महल” में प्रवेश करने का सपना देख रही है. भाजपा के शीर्ष नेता (मोदी-अमित) बिहार में ‘नीतीश’ के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है, परंतु अंदर-ही-अंदर भाजपा का “कुर्सी-प्रेम” छलक-छलक कर बाहर आ रहा है. NDA का हिस्सा रहते हुए चिराग़-पासवान जितनी जोश के “नीतीश” पर गरज रहें है उसके पीछे की ऊर्जा उन्हें भाजपा से ही मिलती आ रही है.
भाजपा अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है और नीतीश को कम से कम सीटों पर जीतते हुए देखना चाहती है. NDA के सहयोगी दलों [LJP,HUM, RLSY(संभवतः)] को जितनी अधिक सीट आएगी, नीतीश उतने कमजोर नज़र आएँगे. चुनाव के बाद, भाजपा अपने सहयोगी दलों को, निर्दलीय विधायकों को और अन्य दलों को तोड़-मरोड़ कर नीतीश से “कुर्सी” छोड़ने का दबाव देगी और मोदी जी उन्हें दिल्ली में एक अच्छा सा मंत्रालय तोहफ़े में भेंट कर देंगे. भाजपा की इस योजना को कामयाब बनाने में ‘चिराग़-पासवान’ एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं. भाजपा की इस सहयोग का इनाम उन्हें ‘राज्य’ और ‘राष्ट्र’ दोनो स्तर पर मिल सकता है.
बिहार चुनाव में NDA गठबंधन के साथ LJP(चिराग़) जितने अधिक सीटों से लड़ेगी, नीतीश कुर्सी से उतने दूर होते जायंगे, अतः चिराग़ बार-बार- लगातार स्वतंत्र हो कर या तीसरे मोर्चे के साथ मिलकर बिहार के 143 सीटों पर चुनाव लड़ने का दबाव बनाते आ रहें हैं. चिराग़ का यह दबाव, नीतीश को दोनो तरफ़ से घेर रहा है और भाजपा अंदर-ही-अंदर खुश होती नज़र आ रही है.
भाजपा अपने चक्रव्यू में नीतीश को फँसाने के लिए “चिराग़” का इस्तेमाल करना चाहती है मगर चिराग़ चाहे तो एक साथ भाजपा और नीतीश को पटखनी दे सकती है. चिराग़ यदि कोंग्रेस आला-कमान से चर्चा कर तीसरे मोर्चे में कोंग्रेस को अपने-साथ ले आए तो बिहार की राजनीति में NDA (नीतीश+भाजपा) और राजद (तेजस्वी+अन्य) दोनो को सत्ता के लिए लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं.
चिराग़-पासवान के पास वो अवसर है जिससे वो बिहार की रजनीति में ख़ुद को स्थापित भी कर सकतें हैं, और विपक्ष को मज़बूत बनाते हुए तीसरे मोर्चे का नेतृत्व भी कर सकतें हैं. बिहार की सीट से दो बार लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाले “चिराग़-पासवान” को बिहार की जनता हाथो-हाथ स्वीकार कर सकती है.
(लेखक का स्वतंत्र नज़रिया)
Dr. Mohammad Ali
Assistant Professor
Dept. of Philosophy
RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक मुद्दों पर लिखे अन्य लेखों के लिए :-
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