मतदाता का मनोविज्ञान - "लोकतंत्र-हित में जारी"

 

चुनावी  लोकतंत्र  में  'मतदाता' का  मनोविज्ञान


 

लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया एक मात्र ऐसी प्रक्रिया होती है जो सही अर्थों में “जनता” को सच्ची शक्ति देती है :- “चुनने की शक्ति”, “चुनने की आज़ादी’ और किसी को भी सत्ता से उखाड़-फेंकने की ताक़त. यही शक्ति तो “लोकतंत्र” को ज़िंदा रखती है.


हमारे देश की “जन-प्रतिनिधियात्मक-लोकतांत्रिक-व्यवस्था” में जनता सीधे CM या PM नही चुनती हैं, बल्कि अपना जन-प्रतिनिधि (MLA/MP) चुनती है. ऐसे में जनता के एक-एक वोट का बहुत महत्व होता है. 

 

राजनैतिक दल हर एक वोट और वोटर के महत्व को समझते हुए चुनाव से ठीक पहले - “हवा” बनाती है, फिर उस हवा में कलाबाज़ियाँ दिखला कर मतदाताओं का मन बहलाती है. परंतु, दुर्भाग्य यह है कि - हम और आप जैसे मतदाताओं ने इन ‘धूर्त-कलाबाज़ियो’ को सत्य मान कर न तो इनसे तार्किक-प्रशन करते हैं और न ही पिछले पाँच साल के काम का हिसाब माँगते हैं । ख़ुद से पूछिए:- क्या आपने पिछले पाँच साल का हिसाब माँगा ? 

 

नेताओं के साथ “सेल्फ़ी” लेना, उन्हें अपना हीरो बना लेना और उनका ‘भक्त’ बन जाना “लोकतंत्र” के लिए बहुत ही ख़तरनाक है और ये तानाशाही को प्रश्रय देती है । इस हवाबाज़ी के खेल में अक्सर मीडिया का भी योगदान रहता है. 

 

चुनावी लोकतंत्र में मतदाता के महत्व को समझते हुए आज हम वोटर/मतदाता के विभिन्न प्रकार पर एक नज़र डालते हैं और उनके मनोविज्ञान को समझते हुए यह समझने का प्रयास करते हैं कि - राजनीतिक पार्टियाँ किस तरह वोटर को अपने पक्ष में करने के लिए ‘वोटर के मनोविज्ञान’ पर अपनी पकड़ बनाए रखते हैं.   

 

वोटर के प्रकार  :-  

 

देश और राज्य स्तर के में व्याप्त वोटर की प्रकृति, सोंच और उनकी प्रजाति (वर्ग) को समझ लेना अनिवार्य है  

 

पहला -  कार्यकर्ता वोटर. 

 

सबसे पहले दल से जुड़े हुए कार्य-कर्ता वोटर । ये अपने अपने दल के प्रति वफ़ादार होते है और तन-मन धन से सालों से पार्टी का झोला उठाते रहते है । अतः इनका वोट अपने इनके दल को जाता । बड़े परिपेक्ष में बात करें तो ऐसे वोटर की संख्या सबसे कम होती है । ऐसे कार्यकर्ता कोंग्रेस के पास भी है और BJP के पास भी है । पिछले 20 सालों में राज्य स्तर पर क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अपने दल के कार्यकर्ता तैयार किए हैं. ये कार्यकर्ता पंचायत स्तर से राज्य स्तर तक सक्रिय रह्तें हैं. इनका वोट बदलता नही है ।   

 

दूसरा -  पारम्परिक वोटर.

 

ये विचार से पार्टी या (नेता) से जुड़े रहते हैं । इन्हें आप “पारम्परिक-वोटर” कह सकते हैं जैसे - “मेरे दादा कोंग्रेस को वोट देते थे तो मैं भी दूँगा” या “मेरे पिता अटल जी को देते थे तो मैं भी BJP को ही दूँगा” । इन्हें “हाथ” या “कमल” या “लालटेन” जैसा छाप दिखलाई देता है । शिक्षा और राजनीतिक जागरुकता  बढ़ने से - इनकी संख्या धीरे- धीरे कम होते जा रही है । 

 

तीसरा  :- जातिगत  वोटर.

 

तीसरे प्रकार के वोटर जो जाति से प्रभावित होते हैं । इनके लिए जाति ही सबकुछ है । विचार- और विकास से इनको कोई मतलब नही है । जैसे - किसी दल के नेता ने अपने IDEOLOGY से समझौता कर दूसरे दल से मिल गए तो भी ये उस नेता का ही साथ देंगे क्यूँकि - वो इनकी जाति का है ।  

 

इनमे एक और प्रजाति है - जो उम्मीदवार की जाति पर ख़ास ध्यान देते हैं । अपना चहेता दल भी यदि उनके जाति का उम्मीदवार को टिकट नही दिया तो इनके वोट बदल सकते हैं । यही कारण है कि - सभी दल उम्मीदवार का नाम घोषणा करने से पहले जातीय समीकरण पर ख़ास ध्यान देते हैं । 

 

चतुर्थ  :- धार्मिक वोटर.

 

     इनकी पूरी दुनिया, सामजिक और राजनीतिक जीवन “धर्म” पर आधारित है । ये हर चीज़ को धर्म के चश्मे से देखते हैं । वोटर की ऐसे प्रजाति को राजनेता अपनी तरफ़ खींचने के लिए “शमशान-क़ब्रिस्तान”, “अली-बजरंगबली” जैसे शब्दों का प्रयोग करते है । 

          भारत में ‘भयंकर-आशिक्षा’ होने के कारण ऐसे वोटर की तादाद अच्छी ख़ासी है और लगातार ऐसी प्रजाति को बढ़ाने का प्रयास उन राजनैतिक दलों और उन नेताओ द्वारा किया जा रहा है, जिन्हें धार्मिक वोटर से फ़ायदा मिल सकता है और जिनका आधार ही धर्म की राजनीति करना है ।    

 

पाँचवा  :- भक्त / चमचा वोटर.  

 

     इस वर्ग के वोटर की संख्या पिछले 5 से 10 सालों में बहुत बढ़ी है । इस वर्ग के वोटर होते तो सामान्य जनता हैं , पर ये ‘अर्ध-शिक्षित’ होते हैं और वो कहावत तो पता है  - “ A Little Knowledge is a dangrous thing”. Whats app यूनिवर्सिटी एवं सोशल मीडिया के माध्यम  से इनके अधूरे-ज्ञान में सेंध मार कर इन्हें बरगलाया जा सकता है । इनकी पूरी दुनिया झूठे ज्ञान और मायाजाल तक सीमित होती है और ये अंध-भक्ति में हो कर वोट देते है । इनकी संख्या दोनो तरफ़ होती है । इनके लिए पार्टी से बड़ा होता है  - “एक नेता” । 

 

सच कहें तो, इनके लिए ‘नेता’- नेता नही भगवान हो जाता है और भगवान ग़लतियाँ नही करता है वो जो भी करता है अपने भक्तों के लिए अच्छा ही करता है । अधूरे ज्ञान की वजह से इनकी संख्या भी लगातार बढ़ी है । 

 

छठा  :- सामान्य वोटर.

 

देश में इनकी संख्या भी अच्छी- ख़ासी मानी जा सकती है । ये सामान्य वोटर होते हैं । ये आख़री वक़्त तक चुप रहतें हैं । ऐसे वोटर सरकार के 5 वर्षों के कार्यों का मूल्यांकन करते हैं. ऐसे मतदाता अपने सांसद और विधायक द्वारा किए गए कार्य को अवलोकन करते हैं और यदि उनके कार्यों से ख़ुश नही हैं तो, चुप-चाप जा कर वर्तमान सांसद/विधायक के विपक्ष को अपना क़ीमती मत देते हैं और यदि उनके कार्यों से ख़ुश है तो उनके पक्ष में मतदान करते है । 

 

देश में इनकी संख्या बहुत है और नेता इन्हें अपने जाल में फँसाने का प्रयास बहुत करते है पर इनकी सबसे बड़ी विशेषता है ये शांत रहते हैं और अपना कार्य कर के आगे बढ़ जाते हैं । इन्हें अपना और समुदाय का लाभ दिखता है जहाँ लाभ और विकास की बात होगी वही सही है । ये ज़िद्दी नही होते है । इनमे शिक्षित और अशिक्षित दोनो वर्ग के लोग है पर इनकी विशेषता शांत और सरल स्वभाव है । 

 

सातवाँ  :- कन्फ़्यूज़ वोटर । 

 

ये अपने- आप को बहुत चालक समझते है पर होते confuse है, इन्हें लगता है - हम तो अपने “एक-वोट” से सत्ता बदल देंगे । अपने वोट के महत्व को समझना अच्छी बात है पर अपने वोट पर अति-आत्मविश्वाश और घमंड कर लेने से ऐसे वोटर सही समय पर सही निर्णय नही ले पाते हैं । 

 

पाँच साल में एक बार मिलने वाले इस अधिकार को वो ख़ज़ाना समझने लगते है अतः उन्हें समझ में ही नही आता है कि - इस खाजने को किसे समर्पित किया जाए । ऐसे वोटर अंतिम वक़्त तक प्रतीक्षा करते हैं । यहाँ तक मतदान की पंक्ति में खड़े होकर भी ये उलझन में ही रहते है ।

 

 उनका वोट ख़राब न हो जाए, इस डर से कई बार मतदान-केंद्र पर जिसे उस वक़्त सबसे ज़्यादा वोट मिलने की चर्चा हो रही होती है उसे ही अपना वोट दे कर चले आते हैं. कई बार तो सोंच कर कुछ जाते है और कन्फ़्यूज़न में बटन कहीं और दब जाता है । 

 

ऐसे वोटर वोट देने के कई दिन बाद तक ये सोंचते रहते हैं की - उनका फ़ैसला सही था या नही ?  ये अपने वोट को तभी सार्थक मानते हैं - जब इनके द्वारा दिया गया वोट का निशान सरकार बना ले । 

 

आठवाँ  :-  डरपोक वोटर. 

 

     ऐसे वोटर अपने मत के अधिकार को सही अर्थों में समझ ही नही पाते हैं । ये अंदर से डरे होते है । इन्हें लगता है मुझे इतना बड़ा अधिकार मिल गया है, अब मैं क्या करूँगा ? इनके दिमाग़ में कई तरह के सवाल चलते है जो डर  उत्पन्न करते है :- 

Ø कही मैंने अपना क़ीमती वोट ग़लत उम्मीदवार को दे दिए तो ?

Ø आख़िर मैं सही उम्मीदवार को कैसे चुनूँगा ?

Ø ग़लत को दे दिया तो लोग क्या कहेंगे ? 

Ø मेरा निर्णय लोकतंत्र के लिए हितकारी होगा या नही ?

 

इन्ही ड़र के कारण ये अंतिम दिन तक किसी नतीजे पर नही पहुँच पाते हैं । वोट के दिन जिसकी तरफ़ हवा/माहौल दिखता है उसे ही अपना मत दे कर चले आते हैं । ऐसे वोटर व्यक्ति और परस्थिति के अनुसार - बतलाते है कि - उन्होंने अपना मत किसे दिया ?  

 

[ नोट -   कन्फ़्यूज़ और डरपोक वोटर को अपनी तरफ़ करने के लिए ही राजनैतिक दलों द्वारा आख़री वक़्त में हवा बनाया जाता है ये अफ़वाहों को भी सच माँ लेते हैं क्यूँकि इनके अंदर डर और कन्फ़्यूज़न रहता है ] 

 

नौवाँ :-    उत्साहित वोटर.

 

     ऐसे वोटर “मतदान” को लेकर बहुत उत्साहित होते हैं । इन्हें अपना वोट के लिए अधिकतर दूसरे से मशवरा लेना होता है । अधिकतर घर वाले या दोस्त-रिश्तेदार । उत्साहित वोटरों में पहली बार मतदान कर रहे लोग की संख्या ज़्यादा होती है । इन्हें प्रभावित वोटर भी कह सकते हैं । पर ये अपनो पर ज़्यादा भरोसा करते है । इसे लगता है कि - मैं जिसे वोट दूँ, बस उसकी सरकार बन जाए तो मज़ा आ जाएगा । 

 

दसवाँ  :-   शोषित वोटर.  

 

     ऐसे वोटर की संख्या गाँव में ज़्यादा होती है, ये अधिकतर ग़रीब होते हैं, इनका शोषण करके वोट लिया जाता है । हमारा देश केवल दिल्ली या मुंबई नही है, अतः देश में ऐसे वोटर की भी संख्या भी है । इन्हें अलग -अलग तरीक़ों से वोट के लिए शोषित किया जाता है । कई बार तो इन्हें पता भी नही चलता है और इनका वोट किसी और द्वारा दे दिया जाता है । जागरुकता के कारण, बेशक, ऐसे वोटरों में भारी कमी आयी है । 

 

इग्यारह :- चालक वोटर.

 

ऐसे वोटर चालाक माने जा सकते है, ये पैसा पर अपना वोट बेचते हैं । पैसा, दारू, सामान इत्यादि की लालच में अपना वोट किसी दल या नेता को बेचते भी है और अपने आस पास के वोट दिलवाते भी है । परंतु इन्हें लालची वोटर नही कहा जा सकता है क्यूँकि - ऐसे वोटर पैसा तो लगभग सभी दलों से ले लेते हैं परंतु अपना क़ीमती वोट सही उम्मीदवार को देते हैं, जिन्होंने अच्छे से कार्य किया हो या उनके हक़ में आवज़ उठाई हो. अतः ये चालाक वोटर कहे जा सकते हैं । 

 

बारह  :-   उदासीन वोटर 

 

     ऐसे वोटर समझदार माने जा सकतें हैं. ये राजनीति में पनप रही गंदगी को गहराई से समझतें हैं. ऐसे वोटर, कई बार तो वोट देना ही नही चाहते है पर समझदार होने के कारण और लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के कारण ये वोट देने चले जाते है । इन्हें राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय पार्टी से भी कोई ख़ास मतलब नही होता है । ये न किसी के भक्त होते है और न किसी के चमचे । ये हमेशा चाहते है कि - क्षेत्र से एक अच्छा विधायक या सांसद जीत कर क्षेत्र की तरक़्क़ी करे । 

 

पार्टी की तरफ़ से आसमान से आया उम्मीदवार इन्हें कभी पसंद नही होता है पर पक्ष- विपक्ष दोनो तरफ़ अमूमन ऐसे ही उम्मीदवार होते हैं । अतः - ये “नाग-नाथ” और “साँपनाथ’ में से किसी एक पर बटन दबा कर लोकतंत्र की गरिमा रख लेते हैं ।  

 

 वोटरों की इस अनोखी-प्राणली की चर्चा को हम यहाँ ख़त्म नही कर रहें हैं बल्कि आप सभी पाठकों को यह ज़िम्मेदारी दे रहें है कि - “आप अपने अनुभव से "वोटर के प्रकार" की इस ऋंखला को और भी आगे बढ़ा सकते हैं”. आपका विचार, अनुभव और सुझाव हमारे लिए सदैव उपयोगी और प्रेरणदायक रहें हैं.  

 

                                                                                      लेखक

                                                                               डाo मोहम्मद अली  

 

आप ख़ुद के बारे में सोंचे - आप किस तरह के वोटर हैं  ? 

 

यदि,  आपके नज़रों में इसके अतिरिक्त भी वोटर की कोई प्रजाति है या कोई वर्ग है तो हमें ज़रूर बताएँ ? 



ये लेखक के अपने विचार है :-

Dr. Mohammad Ali 

Assistant Professor 

Dept. of Philosophy

RLSY College, Bakhtiyarpur.

Patliputra University, Patna


 

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