International Women's day 2022 :- Get ready for sustainability....

महिला और पुरुष के बीच की तुलना महिलाओं को कहाँ ले कर जा रहा है  ? 




परिचय :-


"महिला",  शब्द पुकारते ही सामान्यतः हमारे दिमाग में क्या आता है ?   "एक औरत” जो-  'माँ' , 'बहन' , 'बेटी' , पत्नी या प्रेमिका है.  इन तमाम भूमिकाओं में महिलाएं  पारिवारिक से लेकर सामाजिक भूमिकाओं को जिम्मेदारी से निभाती नज़र आती है । इन तमाम भूमिकाओं को निभाते हुए एक महिलाएं क़दम-क़दम पर अपने शशक्त(ताकतवर) होने का परिचय देती रहती हैं ।

 

           भारतीय समाज मे कार्य विभाजन (कार्य करने) को लेकर किया गया भेद-भाव पूर्ण विभाजन ने ‘जातिगत-भेदभाव’ के साथ साथ ‘लैंगिक-भेदभाव’(महिला-पुरुष भेद-भाव) को भी उत्पन्न किया है। काम के आधार पर इंसानियत को बांटने वाले भारतीय समाज ने कुछ को महान और कुछ को निकृष्ट(पिछड़ा) बनाने का ऐसा भ्रम फैलाया है कि - आज महिलाएँ  तमाम बंधनो को तोड़ने के बावजूद भी खुद को पिछड़ा और हाशिए पर महसूस कर रही है. 

प्रकृति के नज़रो में महिलाएं उतनी ही नयाब, अनमोल और श्रेष्ठ है जितना पुरूष । सांख्य दर्शन में “प्रकृति” और “पुरुष” के संयोग से संसार की उत्पत्ति मानी गयी है । ‘प्रकृति’(महिला) के बिना ‘पुरुष’ जड़(बेजान) है, उसमें चेतना (Consciousness) का विकास ‘प्रकृति’ के संयोग से ही संभव है. ‘प्रकृति’ को महिला के रूप में स्वीकार करते हुए महिला होने की खूबसूरती को दार्शनिक अन्दाज़ में समझा जा सकता है.        

समस्या की जड़  :-

हर क्षेत्र में अपनी योग्यता, मेहनत, संघर्ष और ईमानदारी के दम पर महिलाएँ सफ़लता के हर मक़ाम को हासिल कर रही हैं, परंतु सफ़लता का प्रयास करने वाली बहुत सारी महिलाएँ अपनी क़ाबिलियत को साबित करने के क्रम में पुरुषों से प्रतियोगिता करने लगती है. महिलाएँ, ख़ुद को पुरुष के समतुल्य होने का संघर्ष करने लगती है. 

 दर-असल समाज में एक भ्रम फैलाया गया है कि - “जो महिलाएँ पुरुष के जैसा कार्य करने लगेंगी या पुरुष के समतुल्य हो जाएँगी या पुरुष से आगे बढ़ जाएगी तो वो महिला सफ़लता के निशान तक पहुँच जाएँगी. 

परंतु, सच्चाई तो यह है कि - इस तरीक़े से महिलाएँ कितनी भी सफल हो जाए वो भीतर से असफल और हारी हुई ही रहेंगी क्यूँकि किसी अन्य से प्रतियोगिता करना और उसे हराने में अपनी जीत समझना एक भ्रम है. कोई भी पुरुष या पुरुषवादी समाज, महिलाओं के  सफ़लता की लकीर खींचने का हक़ नही रखता और साथ में, पुरुष द्वारा बनाए गए लकीर को पा लेना किसी भी मायने में महिला की सफ़लता नही कही जा सकती है.

इसे एक "उदाहरण" से समझे :-  

कुछ माता-पिता गर्व से तर्क देते हुए कहतें है कि - हम पुत्री और पुत्र में समानता का भाव रखते हैं, अतः अपनी “बिटिया-रानी” को भी “बेटा” कह कर पुकारते हैं । इस थोपी हुई समानता को स्थापित करने के चक्कर मे वो अपनी बेटी को अपने मौलिकता (Orignality) से दूर कर देते है, उसे बेटा पुकारते ही वे 'बेटी' के वजूद को समाप्त कर देते है और बचपन मे ही अपनी बेटी पर पितृसत्ता का लेप लगाना शुरू कर देते है. 

समाधान (मेरी समझ से):- 

 पुरुषों से प्रतियोगिता करती महिला भ्रम-वश खुद को पुरूष के समतुल्य होने का संघर्ष करने लगती है, जबकि वो पुरूष से अलग है, अनूठी है, नायाब है और अपने-आप मे कामयाब है । महिलाओं की कामयाबी किसी के परिचय की मोहताज नही है. 

          आज महिला, परिवार, समाज, दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य, युद्ध-कौशल और खेल-कूद जैसे तमाम क्षेत्रों में कामयाबी का झंडा फहरा चुकी है, क्योंकि उनमें हर वो कार्य को करने की क्षमता है जिसके लिए उसका निर्माण हुआ है । दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि - महिलाओं की हर कामयाबी को हमारा समाज पुरूष के पैमाने से मापने के बाद उनकी प्रशंसा करता है । पुरूष को एक मापक के रूप में स्थापित करना ही महिलाओं का सामाजिक तृसकार (नीचता) है.         

          आज 21वी सदी में महिलाओं को इसी थोपी हुई पितृसत्ता से ऊपर उठना होगा, बेवकूफ़ी से भरे इस समानता का बहिष्कार करना होगा जिसमें शोषण की बदबू आती है । अपनी मौलिकता को समाप्त कर किसी दूसरे से तुलना करने का विचार ही आपको उससे नीचे या पीछे ला कर खड़ा कर देता है । ये कोई व्यक्तिगत लड़ाई नही है जहां हमें अपने प्रतिद्वंद्वी के हर पैमाने से ऊंचा उठना है ।

          महिला होना अपने आप मे कितना खूबसूरत है,  इस पक्ष को निखारने की जरूरत है, हर महिला को अपने मौलिक (Orignal) होने पर गर्व करना होगा उसे अपनी ‘मौलिकता’ को समझना होगा,  अपने वजूद से प्यार करना होगा, अपने ‘होने का’ सम्मान करना होगा । आने वाली पीढ़ियों को एक संदेश देना होगा कि - महिला हर वो कुछ कर सकती है जो करने की क्षमता कुदरत ने उसे दिया है । उन्हें उन प्रयासों के पीछे नही भागना चाहिए जो उसे पुरुष से बेहतर बनाती है. पुरूष से बेहतर बनाने की होड़ ‘महिला’ को कभी ‘महिला’ होने की समझ नही दे सकती है. 

पुरुष और महिला के बीच की तुलना (उदाहरण) :- 

पुरुष- महिला के बीच की जाने वाली तुलना (Comparison) को एक 'बंदर और मछली' के उदाहरण से समझते हैं :- 

जंगल में सबसे काबिल(योग्य) जानवर कौन है ?, इसके लिए यदि "तैराकी की प्रतियोगिता"(Competition) रखी जाए तो मछली से ज़्यादा योग्य कोई नही होगा और इसी योग्यता के लिए "पेड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता" रखी जाए तो बंदर को कोई नही हरा सकता. 

       बंदर और मछली दोनो अपने- अपने हिसाब से योग्य है, जो योग्यता उन्हें कुदरत ने दिया है. किसी एक प्रतियोगिता से न तो किसी की योग्यता साबित होती है और न ही किसी की अयोग्यता. दोनो जानवर की श्रेणी () में आते हैं और दोनो अपने- अपने हिसाब से अनूठे और योग्य है. ठीक इसी तरह "पुरुष" और "महिला" दोनो इंसानो के श्रेणी में आते हैं और दोनो अपने आप में उत्कृष्ट (लाजवाब) है. पुरुष का स्त्री से तुलना और स्त्री का पुरुष से तुलना एक घटिया मानसिकता का सूचक है. जितना सम्मान पुरुष को उसके कार्य पर मिलना चाहिए उतना ही हक़ एक महिला अपने कार्य को लेकर रखती है चाहे वो गृहणी हो, नौकरी-पेशा हो, व्यवसाय सम्भालती महिला या खेत-खलिहान में कार्य करने वाली महिला. 

महिला दिवस का विषय-वस्तु :- 


वर्ष 2020 में महिला दिवस पर - “Each for Equal”  के लक्ष्य को वैश्विक स्तर पर अपनाने का प्रयास किया गया.   वर्ष 2021 में - “Choose To Challenge” अर्थात - “चुनौतियों को चुनना और उससे भिड़ने" को महिला सम्मान से जोड़कर देखा गया.  इस वर्ष - "Gender Equality today for a sustainable tomorrow" को महिलाओं के सम्मान हेतु एवं उनके साथ हो रहे ग़ैर-बराबरी को कम करने के लिए ऐसे प्रयास बहुत ज़रूरी है . इन सब प्रयासों को मज़बूती से बल देने के बावजूद  हमें विश्व स्तर की इस रिपोर्ट पर ध्यान देना चाहिए जो कहती है कि - “जिस तरीके, नज़रिए और चाल से हम आगे बढ़ रहे हैं,  ऐसे में महिलाओं को सम्मान और बराबरी का हक़ पाने के इस सपने को हकीकत करने के लिए  “99 वर्ष” से अधिक का समय लगने वाला है.

निषकर्ष की तरफ़ बढ़ते कदम ................

          क्या ये चुनौती इतनी गहरी और गंभीर है कि - हमें अपने सपनों को सच करने में 'एक-सदी' का वक़्त लगने वाला है या हम अपने प्रयासों में ईमानदार नही है ?  

महिलाओं के साथ भेद-भाव का होना एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज़ कहीं बाहर नही है, न ही इस समस्या का हल कोई अन्य वर्ग या लिंग के पास है । ये मानसिकता से, निर्भरता से, और सम्मान से जुड़ी समस्या है । मानिसकता के इस बंधन को तोड़ने का प्रयास महिलाओ को ख़ुद करना होगा, स्व-निर्भर बनने से लेकर अपने आत्म-सम्मान को प्राथमिकता देने की पहल खुद करनी होगी । इसके लिए तुलनात्मक दृष्टिकोण छोड़ कर अपनी ऑरीजनलिटी को समझना होगा और अपनी श्रेष्ठता को पहचानना होगा । समाज एवं  समुदाय का कोई दूसरा वर्ग या लिंग अधिक से अधिक ऐसी संभावनाएं पैदा कर सकता है जिसमे महिला अपनी श्रेष्ठता और संपूर्णता को हासिल कर सकें, परंतु महिलाओं को ही आगे आ कर दूसरी महिला का साथ देना होगा, उसके लिए लड़ना होगा, आवज उठानी होगी और विषम-परिस्थितियों से लड़ रही महिलाओं को न्याय दिलाना होगा. 

          हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि - समाज मे ऐसी तमाम संभावनाएं और अवसर उत्पन्न करने पड़ेंगे ताकि हम 99 साल के इस लक्ष्य को एक या दो दशक में हासिल कर सकें । इसके लिए जितने भी प्रयास किये जा सकें वो कम ही माने जाएंगे । आज हमारे देश मे ऐसे कई प्रयास किए जा रहें है जो महिलाओं को आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहा है और बेशक इसके अनुकूल परिणाम भी देखे जा रहें है.

 पंचायती राज व्यवस्था में महिला आरक्षण से लेकर विभिन्न सरकारी पदों पर मिलने वाले आरक्षण कुछ ऐसे ही प्रयास है जो महिलाओं को मुख्यधारा में आने को प्रेरित कर रहा है । प्राथमिक शिक्षा में विद्यालय जाने हेतु "साइकल-योजना" और "कन्या पोशाक योजना" किशोरियों को इसलिए नही दिए जाते की वो महाविद्यालय में पुरूष की संख्या से तुलना करे बल्कि ये उन तमाम किशोरियों की जरूरत है जिसके बिना उनका पठन-पाठन बाधित होता है ।

           अतः पितृसत्तात्मक सोंच से ग्रसित इस समाज को समझना होगा कि -- महिलाओं को मिलने वाली तमाम सुविधा महिलाओ की ज़रूरत और उनका हक़ है न कि उनपर कोई रहम या दया । इन सुविधाओं से लाभान्वित हो कर मुख्यधारा से जुड़ने के बाद उन्हें (महिलाओं को) अपनी वास्तविकता और अपने अस्तित्व पर गर्व करना होगा बिना किसी अन्य जाति, धर्म, वर्ग या लिंग से तुलना किया बिना ।

          शिक्षा, स्वास्थ, सरकारी एवं गैर-सरकारी रोज़गार, जैसे मूलभूत क्षेत्रों में महिलाओं को विशेष सुविधा दे कर ही हम उन्हें सम्मान दे सकते हैं, और एक हद तक उन्हें दिया भी जा रहा है । मगर हमें यह नही भूलना चाहिए कि - अभी हम अपने लक्ष्य से मिलों दूर है ।

अंग्रेज़ी  की इस पंक्ति के साथ अपनी बात को समाप्त कर रहा हूँ -- 

“Miles to go before we stop...........

धन्यवाद ।

 

Mohammad Ali
Assìstant Pŕofessor

RLSY College, Bakhtiyarpur.
Patliputra University, Patna.
7903892791/ 9334302001

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JANGHATFOUNDATION@GMAIL.COM

 

 

Comments

  1. Well articulated... hope you believe in it and it is not just an article or post for you

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