पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ


अगर सारे जहान के दरख़्तों को क़लम बना दिया जाए और सातों समंदरों के पानी को स्याही बना दिया जाए, तब भी हम पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की शख़्सियत और क़ाबिलियत को मुकम्मल तौर पर बयान नहीं कर सकते। हमारी कोशिश हमारी नाक़िस (incomplete)अक़्ल और इल्म की तरह ही अधूरी रह जाएगी।


पैग़म्बर ﷺ ने फ़रमाया:


“मज़दूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मज़दूरी अदा कर दो।” दुनिया में इससे बेहतर इमानदारी और इंसाफ़ की तालीम और क्या हो सकती है?


रहमत-ए-आलम ﷺ के यौमे-विलादत पर अगर हम उनकी सिर्फ़ एक तालीम को भी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लें, तो यक़ीनन हम उन्हें हक़ीक़ी मायनों में याद करेंगे और पूरी दुनिया के सामने एक सकारात्मक पैग़ाम पेश करेंगे।


लेकिन जो लोग उन्हें याद करने के नाम पर उनकी तालीमात से हटकर इस्लाम में नयी बिदअत (Innovation) लाने की कोशिश करते हैं, उनके लिए मेरा यह पैग़ाम है:


दुनिया के हर खेल का एक ज़ाब्ता (नियम) होता है। फ़ुटबॉल हाथ से नहीं खेल सकते, क्रिकेट में पाँव से गेंदबाज़ी नहीं कर सकते, टेनिस में क्रिकेट का बैट इस्तेमाल नहीं कर सकते और बॉक्सिंग में लोहे का दस्ताना नहीं पहन सकते।


जिस तरह ज़िंदगी जीने के कुछ उसूल (नियम /क़ानून ) होते हैं ठीक उसी तरह दुनिया के हर मज़हब भी उसूल और कायदे से चलते हैं ये नियम(उसूल) उस मज़हब की असल किताबों में दर्ज होते हैं, ना कि हर कोई चलता फिरता अपनी तरह से इसकी व्याख्या करता रहे । 


जिस तरह आपको खेल का क़ायदा पसंद नहीं, तो आप उस खेल से बाहर हो सकते हैं ठीक उसी तरह  अगर आपको किसी मज़हब के उसूल पसंद नहीं, तो आपको उस मज़हब से अलग होने की पूरी आज़ादी है – कोई ज़ोर- ज़बरदस्ती नहीं।


इस्लाम में जश्न-ए-मिलाद या यौमे-पैदाइश को तअत (इबादत) की तरह मनाने का तसव्वुर (रिवाज) नहीं है।

क्योंकि इस्लाम का नज़रिया है कि:- 


“हम अल्लाह की तरफ़ से आए हैं और हमें उसी की तरफ़ लौट कर जाना है।”


इस्लाम के अनुसार , जनमत दिन की व्याख्या का संदर्भ कुछ इस तरह है कि-  जन्म-दिन का मतलब है कि हमारी ज़िंदगी का एक और साल कम हो गया। अब हमें ग़ौरो-फ़िक्र के साथ सोचना है कि बीते/गुज़रे हुए साल में हमने अपने मक़सद-ए-हयात को कितना पूरा किया। हम अपने मंजिल तक पहुँचने में कितने कामयाब हो सके ? 


क़ुरआन-ए-करीम में साफ़ कहा गया है:

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया, अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को मज़हब के तौर पर पसंद किया।”

इसके बाद इसमें राई के दाने जितना भी इज़ाफ़ा या कमी करने की गु़ंजाइश नहीं।


रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

“सब इंसान बराबर हैं, किसी को किसी पर फ़ज़ीलत (फ़ौक़ियत) नहीं है।”


किसी को चाहत में याद करने का असल मतलब है – उनका ज़िक्र करना, उनके लिए दुआ करना, उनकी सीरत और अच्छाइयों को बयान करना। और यह किसी ख़ास दिन ही नहीं बल्कि हर रोज़ हो सकता हैं, जब भी दिल चाहे, करना चाहिए।


इसलिए , आप सभी से गुज़ारिश है कि- “इस्लाम और कुरान को  देश की उस किताब की तरह मत बनाए, जिसकी व्याख्या करने के बाद - कभी सुप्रीम कोर्ट माफ़ी माँगता है तो कभी चुनाव आयोग। 


धन्यवाद :- 


डॉ० मोहम्मद अली ।


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