Eid-ul-Adha (कुर्बानी वाली ईद):-
जिनसे आप शिद्दत से प्यार करते हैं, उनकी खुशियों के लिए आप किस हद तक "कुर्बान" होने का हौंसला रखते हैं - इस जज्बे को उत्सव के रुप में मनाने का नाम - "ईद उल -अज़हा" है*.
आज #ईद-अल-अज़हा है, जो हर साल आता है और हमें याद दिलाता है कि:- #क़ुर्बानी_ही_असल_जिहाद हैं ।
'मोहब्बत' का दूसरा नाम है- 'क़ुर्बानी' , जो हमें मुस्कुरा कर बलिदान देते हुए जीवन में आगे बढ़ जाने का संदेश देता है.....
ईद का अर्थ है - #ख़ुशी और कुर्बानी का अर्थ है - #त्याग. अतः, ईद-उल-अज़हा का मतलब - "त्याग के लिए ख़ुशी मनाना".
सामान्यतः हम लोग त्याग, अलगाव में ग़मगीन या दुःखी होते हैं । कुछ लोग अपनों के बिछड़ने पर अवसाद और पीड़ा से घिर जाते हैं । वहीं दूसरी तरफ़ जमा करने, बटोरने, समेटने पर हमें ख़ुशी होती है।
कभी हमने यह सोंचा कि:- हम #त्याग पर #खुश क्यों नहीं होते ?
क्योंकि बचपन से हमें जमा करना, हासिल करना , समेटने और बटोरने का प्रशिक्षण मिलता है। हमें ‘माँ की गोद’ से विद्यालय के कक्ष तक, ‘मित्र को टोली से रिश्तेदारों की हम-जोली तक, यह सिखलाया गया कि - “जहां से मिले समेट लो, इकट्ठा करो, यही असली सफलता है । इस भौतिक-जगत(मिट जाने वाली दुनिया) को हासिल करने के झूठे प्रपंच की वजह से #त्याग होने पर, बिछड़ने पर हमें ग़म, पीड़ा और दुःख होता है ।
इस झूठे प्रपंच, माया और लोभ को दूर करने के लिए हर साल #बक़रीद आता है और हमें #जिहाद का असली अर्थ सीखता है ।
त्याग और बलिदान के ‘प्रतीक’ को उत्सव के रूप में मनाया जाना सम्पूर्ण मानव जाति को एक संदेश देता है कि - "हम अपने जीवन से जुड़ी बेशक़ीमती चीजों को त्याग करने और बलिदान देने के लिए कितने तैय्यार है."
"जिनसे आप शिद्दत से प्यार करते हैं, उनकी खुशियों के लिए आप किस हद तक "कुर्बान" होने का हौंसला रखते हैं - इस जज्बे को उत्सव के रुप में मनाने का नाम - "ईद उल -अज़हा" है.
बकरीद पर बकरे की हत्या नही करने का ज्ञान तो हर तरफ़ से मिलता है पर आज हम "ईद-उल-अज़हा" (बकरीद) के #सामाजिक, #व्यवहारिक और #मानवीय मूल्यों को समझने की कोशिश करते हैं -
#दार्शिनिक_संदेश
मिट्टी और मांस से बने शरीर से हम इतनी मोहब्बत करते हैं, मगर सच तो यह है कि -- हमारी #रूह एक दिन इस #जिस्म को त्याग कर हमेशा के लिए अलविदा कह जाएगी. "ईद उल-अज़हा" का त्योहार हर साल याद दिलाता है कि -अलविदा कहने और त्याग करने की भावना हमें सत्य और सुकुन की तरफ ले जाता है ।
#सामाजिक_संदेश
इस दुनिया में जिसे हम बेहद मोहब्बत करते है, जिससे बेपनाह चाहता रखते हैं, जिसे पाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, जिसे हम कभी खोना नही चाहते हैं, कभी दूर होना नही चाहते ........... क्या हम उस बेशकीमती चीज़ को अपने अल्लाह के लिए, दुनिया के लिए, देश के लिए , देशवासियों के लिए, गरीबों के लिए, अपने परिवार के लिए, अभिभावक के लिए, अपने समाज के लिए और अपने मूल्यों के लिए "कुर्बान" कर सकतें है ???
एक इंसान के लिए, अपनी पसंद(प्यार) को "कुर्बान" कर देना ही तो असली प्रेम है, यही तो सच्ची मोहब्बत है और यही तो मोहब्बत की असली 'परीक्षा' है…………… और यही तो 'कुर्बानी' है.
#व्यवहारिक_संदेश - ( सबका साथ सबका विकास)
कुर्बानी का मांस बेशक अल्लाह के पास नही जाता है, बल्कि कुर्बानी के मांस को तीन भाग में बांट कर
#पहला_हिस्सा उन गरीबों तक पहुंचाया जाता है जो साल भर एक वक्त ही पेट भर पाते हैं. देश और दुनिया के करोड़ों मुसलमान कुर्बानी का मांस गरीबों तक पहुंचाते हैं ।
#दूसरा_हिस्सा :- मांस का दूसरा हिस्सा अपने परिवार, पड़ोसी, दोस्त, रिश्तदारों तक ले जाते है और इस लें देन से आपसी प्रेम मजबूत करते हैं ।
#तीसरा_हिस्सा बचा हुआ हिस्सा खुद खाते हैं और अल्लाह का शुक्र अदा करते है ।
#दुआ_ #संकल्प
इस कुर्बानी के दिन मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि - अल्लाह हमारे अंदर हर उस चीज़ को ‘कुर्बान’ करने की हिम्मत और सलाहियत दें जो हमें आगे बढ़ने से रोकता हो, जो हमें गरीबों की मदद से दूर करता हो, जो देश-के लिए कुछ करने से रोकता हो, हमें वंचितों और शोषितों के प्रति आवज़ उठाने से रोकता हो........
अल्लाह हम सबके दिल मे वो जज़्बा पैदा करे और हमें वो हौंसला अता फरमाएं कि -- हम अपने त्याग, बलिदान और कुर्बानी से देश और समाज को कुछ बेहतर दे सकें और साथ ही तमाम इंसानियत से बेशुमार मोहब्बत कर सकें .
आप तमाम देशवासियों को "ईद-उल-अज़हा" की बहुत बहुत बधाई । सेहतमंद रहें - सुरक्षित रहें - ख़ुश रहें ।
🙏🏿🙏🏿🙏🏿
#HAPPY_Eid-ul-Adha .
Dr. Mohammad Ali.


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